
राज्य और स्थानीय सरकारें भी ट्रंप की कार्यवाही रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। 20 से अधिक राज्यों ने ट्रंप के संघीय फंडिंग को फ्रीज करने के प्रयास को सफलतापूर्वक चुनौती दी है। शिक्षा के क्षेत्र में, अदालतों ने डीईआई यानी डायवर्सिटी, इक्विटी एंड इनक्लूजन (विविधता, समानता और समावेश) पहलों को सीमित करने के लिए कई प्रयासों को खारिज कर दिया है, यह मानते हुए कि ऐसे उपाय संघीय अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। साथ ही, राजनीतिक समर्थन में कमजोरी के संकेत यह बताते हैं कि ट्रंप को आगे और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। पिछले 14 महीनों में, डेमोक्रेट्स ने राज्य विधानसभाओं में 28 रिपब्लिकन सीटों को पलट दिया है, जो यह संकेत देता है कि चुनावी गतिशीलता बदल रही है, जो प्रशासन के एजेंडे को सीमित कर सकती है...
जब तक विपक्षी दल केवल संविधान की रक्षा करने से आगे बढक़र उसके केंद्रीकरण की प्रवृत्तियों को सीमित करने के लिए सुधारों की वकालत नहीं करते, तब तक उन्हें खतरा रहेगा...
चूंकि भारत इस तरह के व्यापक परिवर्तन के लिए तैयार नहीं है, जिसका मुख्य कारण यह है कि अमरीकन प्रणाली अपरिचित है और स्वदेशी नहीं है, इसलिए हमें अन्य सुधारों पर विचार करना चाहिए। जैसे कि, राष्ट्रपति का सीधे चुनाव करना और उनको अधिक विवेकाधीन अधिकार देना, प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व देने के लिए राज्यसभा का पुनर्गठन, या सांप्रदायिक मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए एक अखिल समुदाय परिषद की स्थापना करना, इत्यादि...
कई भारतीय विचारकों का मानना है कि भारत की धर्मनिरपेक्षता तभी बची रह सकती है, जब सरकारें सभी धर्मों से सैद्धांतिक दूरी बनाए रखें, या उन्हें समान रूप से बढ़ावा दें। परंतु वे राजनेताओं से कुछ ज्यादा ही उम्मीद कर रहे हैं। जैसा कि हाल ही में, असम के मुख्यमंत्री (और हिंदुत्व अनुयायी) ने पूछा : ‘‘हिमंत बिस्वा सरमा धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकते हैं? मैं एक कट्टर हिंदू हूं। इसी तरह, एक मुसलमान व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकता है? वह एक कट्टर मुसलमान है।’’ आज, एक और स्वतंत्रता दिवस के बाद, आइए हम विचार करें क्या वास्तव में हम अपनी धर्मनिरपेक्ष विरासत को समाप्त करना चाहते हैं....
भारत की परेशानी यह है कि इसकी गुटनिरपेक्षता की नीति अवसरवाद का शॉर्टहैंड बन गई है। एक सुपरपावर के खिलाफ दूसरी का खेल खेलने ने देश को कुछ सामरिक लाभ दिए होंगे, पर इससे हमने कोई भी मजबूत मित्र नहीं बनाए हैं। हमारे ताजातरीन सैन्य संघर्ष के दौरान जब चीन ने सरेआम पाकिस्तान का साथ दिया तो रूस कहां था? परंतु प्रधानमंत्री मोदी इसी अवसरवाद की नीति पर चल रहे हैं। एकमात्र अंतर यह है कि उनके विदेश मंत्री एस. जयशंकर इसे ‘बहु-गठबंधन’ नाम देना चाहते हैं। इस नीति की असफलता वर्ष 1962 में ही स्पष्ट थी, जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया। नेहरू ने सैन्य सहायता की चाह में रूस नहीं, बल्कि अमरीका से संपर्क साधा। तत्कालीन राष्ट्रपति कैनेडी ने सैन्य और अन्य संबंधित मदद उपलब्ध भी करवाई...
आज भारत की एकता एक नई चुनौती का सामना कर रही है। कई छोटे राज्य, विशेष रूप से दक्षिण भारत के, केंद्रीय सरकार के योजनाबद्ध परिसीमन, जो कि जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्रों को पुनर्निर्धारित करने के लिए संवैधानिक रूप से एक अनिवार्य प्रक्रिया है, का विरोध करने के लिए एकजुट हो गए हैं। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और अन्य छोटे राज्यों को डर है कि आगामी जनगणना के कारण उन्हें उत्तर के बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार के हाथों अपनी संसदीय सीटें खोनी पड़ सकती हैं। उनका तर्क है कि जनसंख्या वृद्धि को रोकने की उनकी सफलता का फल उन्हें प्रतिनिधित्व खोने के रूप में नहीं मि
बड़े राज्य जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व चाहते थे, जिससे उन्हें विधानमंडल में अधिक शक्ति मिलेगी, जबकि छोटे राज्यों को डर था कि वे पीछे छूट जाएंगे और प्रभाव खो देंगे। अमेरिकी संस्थापकों ने एक ऐसा मध्य मार्ग खोजा जो दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करे और किसी भी समूह को विधायी प्रक्रिया पर हावी होने से रोके...
अंबेडकर के दोनों आकलन ... शक्तियों का केंद्रीकरण और बहुसंख्यकवाद ... सही थे, जैसा भारत के इतिहास ने दिखाया। शक्तियों के केंद्रीकरण ने प्रधानमंत्रियों को मनमाने निर्णय लेने की अनुमति दी। जैसे कि मोदी का विमुद्रीकरण, और मर्जी से संविधान संशोधन, जैसे नेहरु का प्रथम संशोधन, जिसने कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए नई अनुसूची तैयार की, या इंदिरा गांधी का 42वां संशोधन, जिसने राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री का मातहत बना दिया। इंदिरा गांधी के आपातकाल को भी न भूलें। संविधान की ‘बहुसंख्यक का सब कुछ’ वाली विशेषता भारत के सामाजिक सौहार्द को कमजोर करती जा रही है...
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ट्रम्प की जीत निर्णायक है। उनको श्रेय मिलना चाहिए, लेकिन अमेरिकी मतदाता ने लोकतंत्र के लिए उनके खतरे को कैसे नजरअंदाज कर दिया? सच्चाई यह है कि ज्यादातर अमेरिकियों ने कभी नहीं माना कि ट्रम्प लोकतंत्र के लिए खतरा थे। वे दो कारण बताते हैं ... वे ट्रम्प को इस तरह से चित्रित करने के सभी प्रयासों को राजनीतिक रूप में देखते हैं, और उन्हें देश की संवैधानिक जांच और संतुलन व्यवस्था पर भरोसा है। ट्रम्प के पुनरुत्थान और जीत से पता चलता है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था मजबूत है...