अधर में लटका शिलारू खेल परिसर

By: Mar 24th, 2017 12:07 am

newsभूपिंदर सिंह

(लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं)

सरकार बजट में खेलों के लिए करोड़ों के बजट का प्रावधान करती है और अगर उस पैसे का सही इस्तेमाल हो, तो इस तरह के प्रशिक्षण केंद्र इतने वर्षों तक पूर्ण होने के लिए अधर में न लटके रहते और अब तक विदेशों में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए खर्च होने वाले करोड़ों रुपए भी बचते…

तीन दशक पूर्व राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान पटियाला ने भारत में अपने उत्कृष्ट अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों के प्रशिक्षण के लिए ऊंचाई पर एक आदर्श केंद्र के लिए शिमला के आसपास जमीन की तलाश शुरू कर दी थी। शिमला हिल्स की ऊंचाई समुद्र तल से दो हजार मीटर के आसपास होने के कारण यह आक्सीजन दबाव पर प्रशिक्षण के लिए अति उत्तम जगह होती है। समरहिल के पास पोटर हिल पर इस केंद्र को बनाने के लिए जब बात चल रही थी, तो राजनीतिक कारणों से इस प्रशिक्षण केंद्र को शिमला से 55 किलोमीटर दूर तिब्बत सीमा मार्ग पर नारकंडा से पीछे तथा मत्याणा से आगे शिलारू नामक स्थान पर ले जाकर बनाना शुरू किया। राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान का भारतीय खेल प्राधिकरण में विलय हो जाने के बाद इस केंद्र पर विशेष खेल क्षेत्र के अंतर्गत एक मध्य व लंबी दूरी की दौड़ों के लिए खेल छात्रावास की शुरुआत की। हिमाचल या जम्मू-कश्मीर के किशोर-किशोरियों को प्रतिभा खोज के बाद इस केंद्र पर इसे भर्ती किया गया और कनिष्ठ राष्ट्रीय खेलों में अच्छे परिणाम भी रहे। मगर देश में खिलाड़ी अधिकतर गरीब परिवारों से आते हैं। नौकरी के आर्थिक आकर्षण में यह खेल छात्रावास धीरे-धीरे खाली हो गया और फिर भारतीय खेल प्राधिकरण ने अपनी इस विशेष खेल क्षेत्र योजना को भी खत्म कर दिया। बाद में दमखम बढ़ाने के लिए मध्य व लंबी दूरी की दौड़ों, कुश्ती, मुक्केबाजी तथा भारोत्तोलन के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर अंतरराष्ट्रीय खेलों से पूर्व इस स्थान पर लगने शुरू हो गए, जो आज भी लगते रहते हैं। कुछ वर्ष पूर्व यहां पर हाकी के लिए एस्ट्रो टर्फ बिछा दी गई और एथलेटिक्स के लिए 400 मीटर की एक लेन तथा उसके बीच 200 मीटर के सिंथेटिक ट्रैक बिछाने का कार्य चल रहा है। इस मैदान को पिछले वर्ष और चौड़ा करने के लिए खुदाई की है, उसके बाद यहां पर कम से कम चार लेन बिछाने के लिए जगह हो गई है। शिलारू में अगर चार लेन का ट्रैक 400 मीटर के लिए बिछ जाता है, तो जो करोड़ों रुपए विदेशी धरती पर जाकर प्रशिक्षण के लिए खर्च किए जाते हैं, उससे राहत मिल सकती है।

अभी तक ट्रैक बिछाने के लिए कोई ठेका भी नहीं हुआ है। इस विषय को राज्य खेल विभाग को भारतीय खेल प्राधिकरण के उच्च अधिकारियों के ध्यान में लाना होगा, ताकि इस मैदान पर चार सौ मीटर के ट्रैक पर काम किया जाए और 200 मीटर के बारे में सोच छोड़ दी जाए। शिलारू में जब-जब भी राष्ट्रीय स्तर के कैंप लगे हैं, तो वहां पर दौड़ने के लिए हमेशा ही दिक्कत रही है। रोड ऊंचा-नीचा होने के कारण वहां घुटने व टखने की चोट का भय भी सदा ही बना रहता है। दमखम के लिए दौड़ तो हर खेल के खिलाड़ी को लगानी ही पड़ती है। कुश्ती व मुक्केबाजी में तो बहुत ही ज्यादा जरूरत होती है। अगर हमारे पास चार सौ मीटर का ट्रैक होगा तो अंदर भी अभ्यास के लिए काफी जगह बच जाएगी। अगर वहां पर अंदर दो सौ मीटर का ट्रैक बना दिया तो फिर न अंदर जगह होगी और न ही बाहर। इसलिए इस विषय पर मिल-बैठकर समय रहते विचार किया जा सकता है। शिलारू में खेल छात्रावास के पास ज्यादा खिलाडि़यों के ठहरने का भी प्रबंधन नहीं है। अच्छा होगा वहां पर और भवन बनाए जाएं। भारोत्तोलन कक्ष तथा उच्च स्तरीय जिम भी यहां पर स्थापित किए जाएं, ताकि खिलाडि़यों को असुविधा न हो। सोना बाथ व स्टीम बाथ जैसी सुविधा भी शिलारू में रखी जाए। गर्मियों में जब पूरे देश में गर्मी प्रचंड रूप धारण करती है, तो खेल प्रशिक्षण के लिए साई के पास केवल यही एक प्रशिक्षण केंद्र दिखाई देता है और यह तीन दशक बाद भी अधूरा है। शिलारू की समुद्र तल से ऊंचाई 2400 मीटर है और यह ऊंचाई दमखम को बढ़ाने तथा लाल रक्त कणों की बढ़ोतरी के लिए रामबाण है। इस अनुकूल वातावरण का उपयोग करने के लिए यहां पर सुविधाएं विकसित करना जरूरी हैं। प्रदेश को एक बार इस प्रशिक्षण केंद्र पर पैसा खर्च करना होगा। इसके बाद तो हर बार विदेशों में प्रशिक्षण पर खर्च होने वाले पैसे की बचत ही होगी। सरकार बजट में खेलों के लिए करोड़ों के बजट का प्रावधान करती है और अगर उस पैसे का सही इस्तेमाल हो, तो इस तरह के प्रशिक्षण केंद्र इतने वर्षों तक पूर्ण होने के लिए अधर में न लटके रहते और अब तक विदेशों में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए खर्च होने वाले करोड़ों रुपए भी बचते। प्रदेश खेल विभाग तथा भारतीय खेल प्राधिकरण को चाहिए कि जल्द से जल्द इस अधूरे प्रशिक्षण केंद्र को सुविधाओं से लैस कर पूर्ण प्रशिक्षण केंद्र बनाए जाएं, ताकि प्रति वर्ष करोड़ों रुपए गर्मियों में विदेश में खर्च करने से बचाए जाएं। इसी धन से यह सुविधा आसानी से एक बार यहां तैयार हो जाएगी, फिर वर्षों तक इसका उपयोग भारतीय खिलाड़ी करते रहेंगे।

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