कम नकदी अर्थव्यवस्था की सीमाएं

By: May 16th, 2017 12:05 am

डा. भरत झुनझुनवालाडा. भरत झुनझुनवाला

लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

ब्याज दर सकारात्मक होने से रिजर्व बैंक पर बोझ बढ़ेगा। असंगठित क्षेत्र दबाव में आएगा। इसी में अधिकतर रोजगार बनते हैं। टैक्स कर्मियों का भ्रष्टाचार बढ़ेगा, जैसे बैंक कर्मियों का नोटबंदी के दौरान देखा गया। हमारे नागरिक सोने की खरीद अधिक करेंगे। यह रकम देश के बाहर चली जाएगी। अतः हमें विकसित देशों की कैशलेस चाल का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए…

सुप्रीम कोर्ट में वादों की डिजिटल दाखिले का शुभारंभ करते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि डिजिटल अर्थव्यवस्था को स्वीकार करने में लोगों की जड़ मानसिकता आड़े आ रही है। मोदी के वक्तव्य को दो स्तरों पर समझना होगा। एक स्तर है सफेद धन के लेन-देन का। जैसे किसी कंपनी द्वारा श्रमिकों को वेतन दिया जा रहा है अथवा आयकर अदा किया जा रहा है। इस प्रकार की सफेद रकम का डिजिटल लेन-देन करना निश्चित रूप से हितकारी है। इन्हें समाज सहज ही अपना भी रहा है। जैसे तमाम कंपनियों ने डिविडेंड को सीधे शेयरधारक के खाते में जमा करने का विकल्प पहले ही उपलब्ध कराया है। इस प्रकार के लेन-देन को डिजिटल प्लेटफार्म पर ले जाने से अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। मास्टरकार्ड ने अनुमान लगाया है कि कम नकदी अर्थव्यवस्था से देश की आय में 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। क्रेडिट कार्ड कंपनी वीजा ने इस लाभ का अनुमान 70,000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष लगाया है। दूसरी तरफ रिजर्व बैंक को घाटा लगेगा। जब आप 2,000 रुपए नकद में अपनी तिजौरी में रखते हैं तो इतनी ब्याज मुक्त रकम रिजर्व बैंक को उपलब्ध कराते हैं। पांच साल बाद रिजर्व बैंक आपको 2000 रुपए ही वापस करेगा। यदि आपने यह रकम रिजर्व बैंक में किसी खाते में जमा कराई होती तो रिजर्व बैंक आपको लगभग 400 रुपए ब्याज अदा करता। एक नोट छापने का खर्च 10 रुपए मान लें, तो रिजर्व बैंक के लिए कम नकदी अर्थव्यवस्था भारी घाटे का सौदा है, चूंकि कैश पर ब्याज नहीं देना होता है। डिजिटल अर्थव्यवस्था का अर्थव्यवस्था पर अंतिम प्रभाव फिलहाल स्पष्ट नहीं है।

डिजिटल लेन-देन को अपनाने के पक्ष में दूसरा तर्क अपराध का है। वर्तमान में स्वीडन कैशलेस दिशा में अग्रणी है। इसी देश ने बोफोर्स का घोटाला किया था। लगभग 15 वर्ष पूर्व वर्ल्ड टे्रड टावर पर अल कायदा के आक्रमण के बाद अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने आंतक से जुड़े तमाम संदिग्ध खातों को फ्रीज कर दिया था, परंतु इस्लामिक स्टेट ने फिर भी उससे भी अधिक सृदृढ़ वित्तीय व्यवस्था बना ली। कहावत है कि ताले शरीफों के लिए होते हैं, चोरों के लिए नहीं। तात्पर्य यह कि अपराध में लिप्त लोग कैशलेस के तमाम विकल्प ढूंढ लेंगे, जैसे सोना, हुंडी, हवाला इत्यादि। कम नकदी अर्थव्यवस्था के पक्ष में एक तर्क काले धन का दिया जा रहा है। अमरीका ने 1969 में 10,000, 5,000, 1,000 एवं 500 डालर के नोटों को निरस्त कर दिया था। इससे नकद डालर रखने का प्रचलन कम नहीं हुआ है। आज लगभग 1700 अरब डालर के 100 डालर के नोट प्रचलन में हैं। इनका बड़ा हिस्सा विदेशों मे पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए किया जा रहा है। बड़े नोटों को निरस्त करने से काले धन कम नहीं हुआ है। एक अनुमान के अनुसार भारत में केवल छह प्रतिशत कालाधन नकद में रहता है। बिल्डरों के दफ्तर में आपको नकद कम ही मिलेगा। कालाधन सोना, प्रॉपर्टी अथवा विदेशी बैकों में रखा जाता है। मैंने कोलकाता, कानपुर एवं मुंबई के चार्टर्ड अकाउंटेंटों एवं उद्यमियों से बात की। इनके अनुसार नोटबंदी के बाद नंबर-2 का धंधा नकद में पूर्ववत चालू हो गया है। उद्यमी भुगतान की रकम को कर्मियों के खाते में डलवा कर नकद निकाल कर रकम को काला बना रहे हैं। नकद में की गई बड़ी बिक्री कई छोटे-छोटे बिलों में काटी जा रही है। कम नकदी अर्थव्यवस्था के पक्ष में दिए जाने वाले ये तर्क भ्रामक हैं।

ये तथ्य विकसित देशों को ज्ञात हैं, परंतु वे फिर भी कम नकदी अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं। स्वीडन तथा डेनमार्क लगभग कैशलेस हो चुके हैं। नार्वे तथा दक्षिण कोरिया 2020 तक कैशलेस होने की तरफ बढ़ रहे हैं। इन देशों का कैशलेस की तरफ जाने का कारण नकारात्मक ब्याज दर है। जापान के केंद्रीय बैंक के पास यदि आप आज 1000 येन जमा कराएंगे तो एक वर्ष के बाद आपको 999 मिलेंगे। बैंक आपकी रकम को सुरक्षित रखने का 0.1 प्रतिशत नकारात्मक ब्याज वसूल करता है। ऐसी परिस्थिति में कैशलेस लाभप्रद हो सकता है। उस परिस्थिति में यदि आपने 2,000 रुपए रिजर्व बैंक में जमा कराए होते, तो रिजर्व बैंक को 400 रुपए ब्याज अदा नहीं करना पड़ता। नोट छापने का खर्च भी बचता। नकारात्मक ब्याज दरों की स्थिति में कम नकदी अर्थव्यवस्था लाभप्रद है। भारत में ब्याज दरें सकारात्मक हैं, इसलिए रिजर्व बैंक को जमा रकम पर ब्याज अदा करना होगा जो कि अर्थव्यवस्था पर बोझ होगा। दूसरे, अपने देश में असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ा है। अफगानिस्तान एवं सोमालिया जैसे देशों में अपराध नियंत्रण के लिए कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा दिया गया है, परंतु इससे वहां का असंगठित क्षेत्र दबाव में आया है। विकास दर गिरी है। विकास एवं रोजगार के अभाव में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ी हैं। अपने देश में ऐसा ही हो रहा है। तीसरे, अपने टैक्स कर्मी अतिभ्रष्ट हैं। यदि ये ईमानदार होते तो नंबर-2 का धंधा होता ही नहीं। उद्यमियों द्वारा नंबर-2 का धंधा अधिकतर इन कर्मियों का हिस्सा बांधने के बाद ही किया जाता है। नकद लेन-देन पर नकेल लगाने में इन कर्मियों को घूस वसूलने का एक और रास्ता उपलब्ध हो जाएगा। चौथे, भारत में सोने की ललक गहरी है। अतः नकद पर प्रतिबंध बढ़ने के साथ-साथ सोने की मांग बढ़ेगी। संपूर्ण विश्व में ऐसा ही हो रहा है। वर्ष 2006 में सोने की वैश्विक सप्लाई 3252 टन थी, जो 2015 में बढ़ कर 4306 टन हो गई है। यह सप्लाई बड़ी मात्रा में भारत और चीन को जा रही है।

ब्याज दर सकारात्मक होने से रिजर्व बैंक पर बोझ बढ़ेगा। असंगठित क्षेत्र दबाव में आएगा। इसी में अधिकतर रोजगार बनते हैं। टैक्स कर्मियों का भ्रष्टाचार बढ़ेगा, जैसे बैंक कर्मियों का नोटबंदी के दौरान देखा गया। हमारे नागरिक सोने की खरीद अधिक करेंगे। यह रकम देश के बाहर चली जाएगी। अतः हमें विकसित देशों की कैशलेस चाल का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। अपने देश में सरकारी कर्मियों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नकेल कसे बिना इन समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि एक स्वतंत्र जासूस व्यवस्था बनाए, जो भ्रष्ट कर्मियों को टै्रप करे। हर पांच वर्ष पर इनके कामकाज का जनता से गुप्त मूल्यांकन कराया जाए और अकुशलतम 10 प्रतिशत को बर्खास्त कर दिया जाए। इन भ्रष्ट कर्मियों के हाथ में कम नकदी अर्थव्यवस्था चोर को थानेदार बनाने जैसा है। प्रधानमंत्री के कम नकदी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के मंतव्य का स्वागत है। सफेद धन का लेन-देन डिजिटल प्लेटफार्म पर लाभप्रद होगा, लेकिन इस कदम के दूसरे प्रभावों के प्रति प्रधानमंत्री को सजग रहना चाहिए।

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