दिशा न भटकें जनहित की नीतियां

By: May 2nd, 2017 12:07 am

डा. भरत झुनझुनवालाडा. भरत झुनझुनवाला

डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

फसल बीमा एक सही योजना है, परंतु इसका लाभ उन परिस्थितियों में है, जब फसल पर प्राकृतिक आपदा आ जाए। किसान की मुख्य समस्या दामों के गिरने की है। सरकार की नीतियों में इस समस्या का समाधान नहीं है। मेरे अनुसार सरकार द्वारा लागू की जा रही कथित जनहितकारी नीतियां निष्प्रभावी हैं। बल्कि इनका आम आदमी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। जैसे प्रत्येक कैशलेस लेन-देन में तीन से चार रुपए का बोझ उस पर पड़ता है। परंतु वर्तमान में जनता इस कष्ट को अनदेखा कर रही है, चूंकि साफ-सुथरे शासन से वह उत्साहित है। यह उत्साह तभी टिकाऊ होगा, जब जनता को साथ-साथ सच्ची राहत मिलेगी…

हाल ही में संपन्न हुए दिल्ली के नगर पालिका चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बड़ी जीत हासिल हुई है। इसके पूर्व पांच राज्यों के चुनावों में भी भाजपा को भारी जीत मिली थी। ये जीतें निवर्तमान सरकारों के विरुद्ध नेगेटिव वोटों के कारण हैं। पंजाब में कांग्रेस की विजय से प्रमाणित होता है कि जनता ने भाजपा की नीतियों के पक्ष में वोट नहीं दिया था। वास्तव में जनता उत्तर प्रदेश में यादवों की उद्दंडता और उत्तराखंड में कांग्रेस के भ्रष्टाचार से कराह उठी थी। फलस्वरूप इन राज्यों में भाजपा को वोट मिले। पंजाब में जनता अकाली सरकार के परिवारवाद से त्रस्त हो गई थी, इसलिए यहां कांग्रेस को वोट मिले। दिल्ली के नगरपालिका चुनावों में आम आदमी पार्टी के विधायकों के भ्रष्टाचार तथा अरविंद केजरीवाल की अकड़ से जनता त्रस्त थी। नतीजा यह हुआ कि यहां भाजपा की विजय हुई। गोवा और मणिपुर में इस प्रकार का नेगेटिव वोट नहीं था। इन राज्यों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत भी नहीं मिला। यदि जनता ने भाजपा की नीतियों के पक्ष में वोट दिया होता, तो निश्चय ही पंजाब, गोवा और मणिपुर में भी भाजपा को बहुमत मिलना चाहिए था। भाजपा ने देश को साफ-सुथरा एवं कारगर शासन उपलब्ध कराया है। इससे जनता का प्रसन्न होना स्वाभाविक है। परंतु मात्र सुशासन ही पर्याप्त नहीं होता है। शासन की दिशा भी सही होनी चाहिए। गलत दिशा में गाड़ी को ईमानदारी से चलाने की क्या सार्थकता है? बीते तीन वर्षों में सरकार द्वारा लागू नीतियों से जनता को राहत कम ही मिली है। भाजपा को चाहिए कि अपनी कथित जनहितकारी नीतियों का मौलिक पुनर्मूल्यांकन करे, ताकि साफ-सुथरे शासन के साथ-साथ जनता को सही नीतियों का लाभ भी मिल सके।

भाजपा द्वारा लागू पहली जनहितकारी नीति जन-धन योजना की थी। उस समय कहा गया था कि इस योजना के माध्यम से आम आदमी को बैंकों से ऋण मिल सकेगा। वह सूदखोरों से मुक्त हो जाएगा। परंतु जन-धन योजना का परिणाम कुछ और ही सामने आया है। बैंकों ने जन-धन खातेदारों को ऋण कम ही दिए हैं, बल्कि इस योजना के दो दुष्परिणाम सामने आए हैं। बैंकों ने जन-धन खातों के संचालन में हो रहे खर्च को भरपाई करने के लिए सामान्य खाता धारकों से अधिक चार्ज वसूलना चालू कर दिया है। दूसरा दुष्परिणाम यह हुआ है कि गरीब ने अपनी रकम बैंक में जमा कराया है। इस रकम के उपलब्ध होने से बैंक के पास तरलता बढ़ी है, जिसके कारण ब्याज दरें घट रही हैं। ब्याज दरों में इस कमी का लाभ उन उद्यमियों को हो रहा है, जिन्होंने बड़े पैमाने पर बैंकों से ऋण ले रखे हैं। जन-धन योजना को जनहितकारी बताकर लागू किया गया था, परंतु इसका परिणाम आम आदमी पर बैंक के चार्ज का बोझ डालने एवं अमीर को लाभ पहुंचाने में हुआ है।भाजपा सरकार द्वारा लागू दूसरा कदम कम नकदी अर्थव्यवस्था का है। सोच है कि कम नकदी अर्थव्यवस्था में टैक्स की चोरी कम होगी। अर्थव्यवस्था पर नोट छापने का बोझ घटेगा। इन बचत से अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी, जिससे आम आदमी को रोजगार मिलेंगे। इस सोच की वास्तविकता को समझने के लिए समाज के तीन वर्गों पर कम नकदी अर्थव्यवस्था के अलग-अलग प्रभाव को समझना होगा। पहला वर्ग आम आदमी का है। आम आदमी को नकदी रहित लेन-देन के लिए स्मार्टफोन खरीदना होता है। इसमें डाटा पैक डालना होता है। नकद रहित लेन-देन में समय अधिक लगता है। जैसे आप पहले अपने फोन से दुकानदार को पैसा ट्रांस्फर करेंगे। फिर दुकानदार से पूछेंगे कि उसे रकम मिली या नहीं।

इस कार्य में आपका और दुकानदार दोनों का समय व्यय होगा। नकदी रहित लेन-देन के लिए पहले पेटीएम जैसे पोर्टल के पास आपको रकम जमा करानी पड़ती है। यह रकम आपके खाते में रहती, तो इस पर आपको ब्याज मिलता। कम नकदी अर्थव्यवस्था में आप इस ब्याज से वंचित रह जाते हैं। मेरे आकलन में प्रत्येक नकदी रहित लेन-देन का आम आदमी पर तीन से चार रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। समाज का दूसरा वर्ग सफेद इकोनॉमी में कार्यरत बड़े व्यापारियों का है। मेरी जानकारी में इन्होंने पहले ही नकदी रहित लेन-देन को अपना लिया था। ग्राहक से बड़ी रकम प्राप्त करने तथा सप्लायर को भुगतान से पहले ही कैशलेस तरीके से किया जा रहा था, क्योंकि इसमें समय और खर्च की भारी बचत होती है। इन पर कम नकदी अर्थव्यवस्था का प्रभाव शून्यप्राय है, चूंकि ये पहले ही उस स्थान पर पहुंच चुके हैं। समाज का तीसरा वर्ग काली इकोनॉमी में कार्यरत बड़े व्यापारियों का है। ये पूर्व में बैंकिंग व्यवस्था के बाहर लेन-देन करते थे। आज भी ये बैंकिंग व्यवस्था के बाहर ही हैं। मैंने कुछ ऐसे उद्यमियों से चर्चा की तो सभी ने एकमत होकर राय दी कि काला धंधा नोटबंदी के बाद कुछ समय के लिए मंदा पड़ा था। अब वह पूर्ववत चल पड़ा है। कुछ व्यापारियों का मानना था कि जीएसटी लागू होने के बाद काला धंधा ज्यादा आसान हो जाएगा। वर्तमान में काला धंधा करने के लिए बिक्री कर और एक्साइज ड्यूटी के दो अधिकारियों से सेटिंग करनी पड़ती है। जीएसटी लागू होने के बाद एक ही से सेटिंग करनी पड़ेगी। अतः कम नकदी अर्थव्यवस्था का इस वर्ग पर भी प्रभाव नगण्य रहेगा, चूंकि ये पहले भी बैंक से बाहर थे और आगे भी बाहर ही रहेंगे। अंतिम आकलन है कि कम नकदी अर्थव्यवस्था से आम आदमी पर बोझ पड़ेगा, जबकि बड़े व्यापारियों पर इसका प्रभाव शून्यप्राय रहेगा। सरकार की तीसरी जनहितकारी नीति किसान को सॉयल हेल्थ कार्ड एवं फसल बीमा उपलब्ध कराना है।

परंतु किसान की समस्या हेल्थ कार्ड की नहीं है, उसकी समस्या अपर्याप्त दाम की है। फसल का पर्याप्त दाम न मिले, तो उत्पादन में वृद्धि ज्यादा हानिकारक हो जाती है। सॉयल हेल्थ से मिली जानकारी से किसान नाइट्रोजन, पोटाश एवं फास्फेट के बीच सही संतुलन बनाकर फर्टिलाइजर का उपयोग करेगा। उसकी फसल अच्छी होगी, लेकिन मंडी में आवक बढ़ने से उसके दाम गिर जाएंगे। किसान उत्पादन की लागत को भी नहीं वसूल कर पाएगा। इसी प्रकार फसल बीमा एक सही योजना है, परंतु इसका लाभ उन विशेष परिस्थितियों में है, जब फसल पर प्राकृतिक आपदा आ जाए। किसान की मुख्य समस्या दामों के गिरने की है। सरकार की नीतियों में इस समस्या का समाधान नहीं है। मेरे अनुसार सरकार द्वारा लागू की जा रही कथित जनहितकारी नीतियां निष्प्रभावी हैं। बल्कि इनका आम आदमी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। जैसे प्रत्येक कैशलेस लेन-देन में तीन से चार रुपए का बोझ उस पर पड़ता है। परंतु वर्तमान में जनता इस कष्ट को अनदेखा कर रही है, चूंकि साफ-सुथरे शासन से वह उत्साहित है। यह उत्साह तब ही टिकाऊ होगा, जब जनता को साथ-साथ सच्ची राहत मिलेगी। वर्तमान में जनता ने भाजपा को वोट दिया है, क्योंकि वह दिल्ली में आप, उत्तराखंड में कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से त्रस्त थी। खतरा है कि आप, कांग्रेस और सपा के विरुद्ध दिए गए निगेटिव वोट को भाजपा अपनी नीतियों के पक्ष में दिए गए वोट के रूप में पढ़ेगी और उन्हीं गलत नीतियों को और जोर से लागू करेगी। इसका परिणाम देश और भाजपा दोनों के लिए ही कष्टप्रद होगा।

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