सीधे जन से जुड़ें कल्याणकारी योजनाएं

By: May 9th, 2017 12:08 am

newsडा. भरत झुनझुनवाला

लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

वर्तमान में विशाल रकम जन कल्याणकारी योजनाओं पर व्यय की जा रही है, परंतु इनका लाभ आम आदमी तक कम ही पहुंच रहा है। इन योजनाओं में कार्यरत सरकारी कर्मियों को पोषित किया जा रहा है। जैसे राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से चले एक रुपए में केवल 15 पैसे ही लाभार्थी के पास पहुंचते हैं। इन तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं को बंद करके यह रकम सीधे जनता में वितरित कर दी जाए, तो प्रशासनिक खर्च न्यून पड़ेगा और एक रुपए में 99 पैसे लाभार्थी के पास पहुंचेंगे…

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि आर्थिक सुधारों के लाभ समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंच रहे हैं तथा आर्थिक विकास दर एवं कृषि उत्पादन में नोटबंदी के बाद गिरावट नहीं आई है। इसमें कोई संशय नहीं है कि वर्तमान एनडीए सरकार ने ईमानदारी का शासन लागू किया है। सरकारी धन का रिसाव कम हुआ है। सरकारी बजट के सदुपयोग से अर्थव्यवस्था को गति मिली है। इन कदमों से बड़े उद्यमियों को निश्चित रूप से लाभ हुआ है, लेकिन इन्हीं कदमों का आम आदमी पर कितना सुप्रभाव पड़ा है, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। कारण यह कि टेक्सटाइल मिल का धंधा बढ़ने से आम आदमी पर दो तरह का प्रभाव पड़ता है। हथकरघे का धंधा चौपट होता है, जबकि टेक्सटाइल मिल में कर्मियों को रोजगार मिलता है। दोनों प्रभावों का अंतिम परिणाम स्पष्ट नहीं है। इसलिए वित्त मंत्री का आकलन अभी समय से पहले लगता है। वाराणसी के एक साड़ी विक्रेता के अनुसार परेशानी बढ़ गई है। पूर्व में दुकानदार कारीगर से साड़ी खरीदकर उन्हें आगे की तारीख का बेयरर चेक दे देते थे। कारीगर इस चेक को आढ़तियों से डिस्काउंट करा लेता था। चेक पर लिखी तारीख पर आढ़तिया चेक से नकद बैंक से निकाल लेते थे। अब यह सकारात्मक चक्र बंद हो गया है। कारीगर परेशान है। दूसरी रपटों के अनुसार भी नोटबंदी एवं डिजिटल भुगतान का असंगठित क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अतः वित्त मंत्री को चाहिए कि बाजार के भरोसे आम आदमी को न छोड़ें। बाजार की गति विपरीत पड़ सकती है।

वित्त मंत्री को यूनिवर्सल बेसिक इन्कम योजना को लागू करने पर विचार करना चाहिए। देश के हर परिवार को एक रकम सीधे उपलब्ध करा देनी चाहिए, जिससे बाजार के विपरीत दिशा में चलने पर भी आम आदमी जीवनयापन कर सके। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी इंडियन पब्लिक फाइनांस स्टेटिस्टिक्स के अनुसार वर्ष 2014-2015 में केंद्र सरकार द्वारा जन कल्याण के निम्न खर्च किए गए। शिक्षा पर 81 हजार करोड़ , स्वास्थ्य पर 24 हजार करोड़, परिवार कल्याण पर 13 हजार करोड़, आवास पर 23 हजार करोड़, शहरी विकास पर 14 हजार करोड़, ग्रामीण विकास पर 119 हजार करोड़, फर्टिलाइजर सबसिडी पर 73 हजार करोड़ एवं फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर 115 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए। इनका योग 462 हजार करोड़ रुपए हुआ। महंगाई को जोड़ लें, तो वर्ष 2016-17 में यह लगभग 530 हजार करोड़ रुपए बैठेगा। इस रकम में कुछ खर्च आगे भी सरकार को करने होंगे, जैसे हाई स्कूल बोर्ड की परीक्षा का संचालन करना। उपरोक्त 530 हजार करोड़ रुपए की रकम में 50 हजार करोड़ की रकम को इस प्रकार के जरूरी कोर्स के लिए अलग रख दें, तो शेष 480 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष की रकम को सीधे देश के सभी 20 करोड़ परिवारों में वितरित किया जा सकता है। हर परिवार को 24,000 रुपए प्रति वर्ष या 2,000 रुपए प्रति माह दिए जा सकते हैं। वर्तमान मंे यह विशाल रकम तमाम जन कल्याणकारी योजनाओं पर व्यय की जा रही है, परंतु इनका लाभ आम आदमी तक कम ही पहुंच रहा है। इन योजनाओं में कार्यरत सरकारी कर्मियों को पोषित किया जा रहा है। जैसे राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से चले एक रुपए में केवल 15 पैसे ही लाभार्थी के पास पहुंचते हैं। इन तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं को बंद करके यह रकम सीधे जनता में वितरित कर दी जाए, तो प्रशासनिक खर्च न्यून पड़ेगा और एक रुपए में 99 पैसे लाभार्थी के पास पहुंचेंगे।

देश में परिवारों की संख्या लगभग 25 करोड़ है। इसमें अमीर-गरीब सभी सम्मिलित हैं। अतः ऊपर प्रस्तावित 2,000 रुपए प्रतिमाह की रकम रतन टाटा और रिक्शे वाले सभी को समान रूप से दी जाएगी। वर्तमान में कल्याणकारी योजनाओं को गरीबी रेखा से नीचे वाले अथवा बीपीएल परिवारों पर केंद्रित किया जाता है। इससे गरीबी रेखा से ऊपर वाल यानी एपीएल एवं बीपीएल के वर्गीकरण का झंझट बना रहता है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसे ‘गरीब’ का दर्जा मिल जाए। जनता की सोच गरीब बनने की बनती है, न कि अमीर बनने की। इस निकृष्ट मानसिकता से जनता को उबरने के लिए एपीएल एवं बीपीएल का विभाजन समाप्त कर देना चाहिए और सभी परिवारों को यह रकम उपलब्ध करा देनी चाहिए। एपीएल परिवारों से इस रकम को दूसरे रास्ते वापस वसूल किया जा सकता है। जैसे अपने देश में पेट्रोलियम पदार्थों की वार्षिक खपत लगभग 21 हजार करोड़ रुपए लीटर है। सभी पेट्रोलियम पदार्थों पर 25 रुपए प्रति लीटर का अतिरिक्त टैक्स लगाया जा सकता है। इससे लगभग 525 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष की रकम वसूल होगी। इस रकम को वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा खर्च किए जा रहे 480 हजार करोड़ की रकम को जोड़ दें तो 1005 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष की विशाल रकम उपलब्ध हो सकती है। इस रकम को देश के 25 करोड़ परिवारों में वितरित किया जाए तो हर परिवार को 48,000 रुपए प्रतिवर्ष अथवा 4,000 रुपए प्रतिमाह उपलब्ध कराए जा सकते हैं, जो कि परिवार की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगी। परिवार के लोगों को मनरेगा जैसी परियोजनाओं में फर्जी काम करने के लिए अपनी दिहाड़ी बर्बाद नहीं करनी होगी। राशन की दुकान की लाइन में भी खड़ा भी नहीं होना होगा।

पेट्रोलियम की अधिकाधिक खपत एपीएल परिवारों द्वारा की जाती है। यह खपत प्रत्यक्ष रूप से कार एवं स्कूटर में डीजल अथवा पेट्रोल भराने में होती है। यह खपत अप्रत्यक्ष रूप में ट्रकों द्वारा माल की ढुलाई अथवा फैक्टरियों द्वारा डीजल जेनरेटर चलाने में होती है। पेट्रोलियम पर 25 रुपए प्रति लीटर का टैक्स लगाने से बाजार में सभी माल महंगे हो जाएंगे, चूंकि जेनरेटर चलाने एवं ट्रक से ढुलाई करने का खर्च अधिक पड़ेगा। लेकिन टैक्स का यह भार कमजोर वर्ग पर न्यून पड़ेगा, चूंकि वह फैक्टरियों द्वारा उत्पादित माल को कम मात्रा में खरीदता है। उसके पास स्कूटर है ही नहीं, इसलिए उसे पेट्रोल भराने का अधिक मूल्य भी अदा नहीं करना होगा। मेरा अनुमान है कि पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स लगाने से एपीएल परिवारों से 3,600 रुपए की रकम पेट्रोलियम टैक्स के माध्यम से वापस वसूल कर ली जाएगी। अंतिम परिणाम होगा कि बीपीएल परिवार को 4,000 रुपए प्रति माह सीधे मिलेंगे और उसे 400 रुपए प्रतिमाह पेट्रोलियम टैक्स के कारण वस्तुओं के बढ़े मूल्य के रूप में अदा करना होगा। उसे शुद्ध प्राप्ति 3,600 रुपए प्रतिमाह होगी। इसके विपरीत एपीएल परिवारों को 4,000 रुपए सीधे मिलेंगे, परंतु पेट्रोलियम टैक्स के कारण उसे शुद्ध प्राप्ति मात्र 400 रुपए प्रतिमाह की होगी। वित्त मंत्री के आकलन में वर्तमान आर्थिक सुधारों का कमजोर वर्गों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इस विषय में वस्तुस्थिति फिलहाल स्पष्ट नहीं है। वित्त मंत्री को यूबीआई योजना लागू करनी चाहिए, जिससे वाजपेयी सरकार के जैसी स्थिति से बचा जा सके।

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