अर्थतंत्र में विश्वास जगाए सरकार

By: Jun 6th, 2017 12:07 am

newsडा. भरत झुनझुनवाला

लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

कर्मठ एवं ईमानदार होने के बावजूद नोटबंदी से उद्यमी और उपभोक्ता दोनों ही सहम गए हैं। वे कछुए की तरह दुबक गए है। उन्हें पुनः विश्वास में लेना चाहिए। मूल चोर व्यापारी नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र है जो चोरी पर नियंत्रण करने के स्थान पर इस दुष्कृत्य को बढ़ावा देता है। इन पर सरकार को तत्काल नियंत्रण करना चाहिए। साथ-साथ सरकार को बदलती वैश्विक परिस्थितियों में वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने की नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। विदेशों से ऋण लेकर विदेशी माल का आयात करके निवेश बढ़ाना चाहिए…

बीते वर्ष 2016-17 मे हमारी आर्थिक विकास दर 7.1 प्रतिशत रही है, जो कि इससे पूर्व के वर्ष 2015-16 की 8.0 प्रतिशत से काफी कम है। विकास दर में गिरावट का यह क्रम नोटबंदी से पूर्व शुरू हो गया था। वर्ष 2016-17 की चार तिमाहियों में विकास दर क्रमशः 7.9, 7.5, 7.0 एवं 6.1 प्रतिशत रही है। स्पष्ट है कि गिरावट दूसरी तिमाही में ही शुरू हो गई थी। नोटबंदी ने आग में घी का काम किया है। समस्या से निपटने के लिए पहले आग मे घी डालना बंद करना होगा। इसके बाद आग पर पानी डाला जाए, तो लाभ होगा। अतः पहले नोटबंदी के दुष्प्रभावों से निपटना चाहिए।

नोटबंदी के कारण देश में उद्यमियों की दृष्टि बदल गई है, विशेषकर छोटे उद्यमियों की। पूर्व में ये सुबह उठते थे तो सोचते थे कि आज कहां माल सप्लाई करना है। अब ये सोचते हैं कि आज किस चार्टर्ड अकाउंटेंट के पास जाऊं कि इन्कम टैक्स के नोटिस का जवाब लिखा सकूं। इसी प्रकार उपभोक्ता सहम गए हैं। गृहिणियां कुछ नकद छुपा कर रखती हैं कि जरूरत पर किसी का मुंह न देखना पड़े। उनका यह संचित नकद बैंक में जमा हो गया है। उनकी तिजोरी खाली हो गई है। अब वे तिजोरी में पुनः नकद को जमा करने में लगी हुई हैं। वे खपत में कटौती कर रही हैं। उन्हें यह भी डर है कि सरकार द्वारा 2,000 के नए नोट अथवा 100 रुपए के पुराने नोटों को पुनः बंद किया जा सकता है। इसलिए बचत को सोना खरीद कर संग्रह करने की रुचि बढ़ी है। प्रमाण है कि पिछले वर्ष अप्रैल की तुलना मे 2017 के अप्रैल में देश में सोने की बिक्री दोगुनी हुई है। सोने की खरीद से देश की आय बाहर चली जाती है और हमारी अर्थव्यवस्था मंद पड़ रही है। जैसे गुब्बारे से हवा निकाल ली गई हो। नोटबंदी के कारण पूरी अर्थव्यवस्था स्तब्ध सी है।

सरकार को चाहिए कि जनता में पुनः विश्वास पैदा करे। सर्वश्रेष्ठ रहेगा कि सरकार नोटबंदी की असफलता को स्वीकार कर ले और इन्कम टैक्स अधिकारियों के आंतक से जनता को मुक्त कर दे। ऐसा करना यदि राजनीतिक दृष्टि से कठिन हो, तो इन्कम टैक्स अधिकारियों पर नियंत्रण करना चाहिए। इन अधिकारियों की मिलीभगत से ही काला धन पैदा होता है। फैक्टरियों द्वारा हफ्ता बांध दिया जाता है और बेरोकटोक नं दो में माल का उत्पादन एवं ब्रिक्री की जाती है। यदि ये ईमानदार होते तो समस्या पैदा ही नही होती। इन्ही अधिकारियों को जमा नकद की जांच सौंपना चोर को थानेदार बनाने जैसा है। अतः टैक्स अधिकारियों के कृत्यों पर नजर रखने को स्वतंत्र नागरिकों की देखरेख में एक जासूसी व्यवस्था बनानी चाहिए। इन्कम टैक्स अधिकारियों से पीडि़त लोगों को राहत देने का स्वतंत्र रास्ता खोलना चाहिए। प्रधानमंत्री को देश को अश्वासन देना चाहिए कि नोटबंदी दोबारा नही की जाएगी, जिससे सोना संग्रह करने की प्रवृत्ति पर रोक लगे।

विकास दर में गिरावट को सरकार की दूसरी आर्थिक नीतियां भी उतनी ही जिम्मेदार हैं। वित्तीय घाटे पर नियंत्रण की नीति पर सरकार चल रही है। इस नीति को विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा बढ़ाया गया था। विश्व बैंक का मानना था कि वित्तीय घाटा नियंत्रण में रहेगा तो वैश्विक निवेशक वे झुंड बनाकर भारत में निवेश करने को उद्यत होंगे। यह नीति कतिपय पिछले दशक में सफल हो सकती थी। उस समय विकसित देशों की विकास दर ऊंची थी और अपने घरेलू बाजार को माल सप्लाई करने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन में तमाम फैक्टरियां लगाई थीं। वर्तमान मे परिस्थितियां बदल गई हैं। इंग्लैंड में लोगों ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने का निर्णय लेकर साफ कर दिया है कि वे विदेशों से माल का आयात नही करना चाहते हैं। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमरीकी कंपनियों को कहा है कि वे अधिकाधिक उत्पादन देश में ही करें। एक अमरीकी व्यापारी ने बताया था कि अमरीकी सरकार अब अमरीका में बने माल की खरीद को प्राथमिकता दे रही है। वे पहले चीन से माल का आयात करके अमरीकी सरकार को सप्लाई करते थे। उनका धंधा ठंडा पड़ गया है। इस परिस्थिति में विश्व बैंक का फार्मूला फेल है। हमारी सरकार द्वारा वित्तीय घाटे पर नियंत्रण कर लिया जाए तो भी विदेशी कंपनियां झुंड बनाकर नही आएंगी चूंकि उनके लिए भारत में माल का उत्पादन करके अमरीका को निर्यात करना कठिन हो गया है। साथ-साथ वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने के फेर मे सरकारी निवेश भी कम होगा। वर्तमान मे विकास दर में आ रही गिरावट का कारण सरकार द्वारा वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने की यह पालिसी है।

इस नीति को त्यागने के पक्ष में एक और तर्क वर्तमान सरकार की ईमानदारी है। वित्तीय घाटे पर निंयत्रण के पीछे एक और विचार था कि नेता अकसर भ्रष्ट होते हैं। सरकारी खर्च का रिसाव होता है। इसलिए सरकारी निवेश में कटौती करके निजी निवेश को बढ़ाना चाहिए। देश की वर्तमान सरकार इस रोग से कम ही ग्रस्त दिखती है। अतः वर्तमान सरकार यदि ऋण लेकर निवेश करे तो संकट उपस्थित नही होता है। ऋण लेने से वित्तीय घाटा बढ़ेगा। इसे बढ़ने दें। घर का कर्ता ऋण लेकर बच्चे को अच्छे स्कूल में भेजे तो ऋण सफल होता है। वहीं कर्ता ऋण लेकर शराब पिए तो हानिकारक हो जाता है। अतः मोदी सरकार की ईमानदारी को देखते हुए वित्तीय घाटा बढ़ा कर निवेश बढ़ाना लाभप्रद रहेगा। ऋण लेकर निवेश करने में एक संकट मंहगाई का उपस्थित होता है। सरकार घरेलू बैंकों से ऋण लेती है तो बैंकों का धंधा चल पड़ता है। उनके लिए निजी उद्योगों को ऋण देकर लाभ कमाना आकर्षक नही रह जाता है। वे ब्याज दरों में वृद्धि कर देते हैं।

साथ-साथ सरकार द्वारा बाजार में खरीदे गए माल के दाम बढ़ते हैं। जैसे यदि सरकार हाई-वे बनाती है तो सीमेंट तथा स्टील की मांग बढ़ती है और इन माल के दाम बढ़ते हैं। इस समस्या का हल है कि ऋण विदेशी बैंकों से लिए जाएं और स्टील का विदेश से आयात किया जाए। तब घरेलू बैंक व्यवस्था पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा और घरेलू ब्याज दरें न्यून बनी रहेंगी। स्टील का आयात करने से घरेलू बाजार में स्टील की मांग पूर्ववत रहेगी और दाम नही बढंगे। यूं समझिए कि घर का कर्ता ऋण लेकर फ्रिज खरीद लाए, तो घरेलू बजट एवं खपत पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक नही है। कर्मठ एवं ईमानदार होने के बावजूद नोटबंदी से उद्यमी और उपभोक्ता दोनों ही सहम गए हैं। वे कछुए की तरह दुबक गए है। उन्हें पुनः विश्वास में लेना चाहिए। मूल चोर व्यापारी नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र है जो चोरी पर नियंत्रण करने के स्थान पर इस दुष्कृत्य को बढ़ावा देता है। इन पर सरकार को तत्काल नियंत्रण करना चाहिए। साथ-साथ सरकार को बदलती वैश्विक परिस्थितियों में वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने की नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। विदेशों से ऋण लेकर विदेशी माल का आयात करके निवेश बढ़ाना चाहिए। इन कदमों को नही उठाया गया, तो वर्तमान वर्ष 2017-18 में विकास दर में और गिरावट आ सकती है।

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