मीडिया विमर्श का सिमटता दायरा

By: Dec 7th, 2017 12:10 am

पीके खुराना

लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं

गुजरात के चुनाव और राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना इतनी बड़ी खबरें हैं कि लगता है देश भर की सारी समस्याएं खत्म हो गई हैं, सारे मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। राजनीतिज्ञों को तो जनता को अंट-शंट बातों से मुद्दे भुलाकर फुसलाने की आदत थी ही, अब मीडिया भी इस आदत का शिकार हो गया है। खुद मीडिया से जुड़े कई वरिष्ठ लोगों ने इस पर चिंता जाहिर की है, लेकिन इस स्थिति को बदलने के लिए मीडिया में कोई व्यवस्थित चिंतन हो रहा हो, ऐसा बिलकुल नहीं लगता…

दो दिन बाद गुजरात विधानसभा के लिए पहले चरण का मतदान संपन्न हो जाएगा। उसके दो दिन बाद यानी 11 दिसंबर को राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हो जाएंगे। 14 दिसंबर को गुजरात विधानसभा के लिए दूसरे चरण का मतदान संपन्न हो जाएगा। 18 दिसंबर को चुनाव परिणाम घोषित हो जाएंगे। बहुमत प्राप्त दल के नेता का चुनाव होगा, मंत्रिमंडल गठन होगा, विपक्ष को यदि निर्धारित न्यूनतम सीटें मिलीं, तो नेता-विपक्ष का भी चुनाव होगा। कांग्रेस अध्यक्ष बन जाने के बाद राहुल गांधी पार्टी में फेरबदल कर सकते हैं और कुछ नई नीतियों की घोषणा कर सकते हैं। अगर वह ऐसा न भी करें, तो हमारे पास अटकलें लगाने का अवसर होगा कि वह क्या करने वाले हैं। गुजरात विधानसभा चुनावों के परिणाम की समीक्षा के साथ-साथ यह भी बताया जाएगा कि इस परिणाम का देश की भावी राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है। मीडिया के पास काम ही काम है। सारा मीडिया इन दो मुद्दों पर प्रमुखता से लिखता-बताता रहेगा। जनता खुश होकर राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, अमित शाह, नए मंत्रिमंडल और विपक्ष के नेता तक सीमित रहेगी। यदि इस बीच फारूख अब्दुल्ला ने कोई उत्तेजक बयान न दिया, तो हमें कश्मीर की याद नहीं आएगी और यदि क्रिकेट मैच के दौरान श्रीलंकाई खिलाडि़यों ने मास्क न पहने होते तो हरियाणा-पंजाब में भूसा जलाने और एनसीआर दिल्ली में प्रदूषण की समस्या पर भी किसी का ध्यान न जाता।

गुजरात के चुनाव और राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना इतनी बड़ी खबरें हैं कि लगता है देश भर की सारी समस्याएं खत्म हो गई हैं, सारे मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। राजनीतिज्ञों को तो जनता को अंट-शंट बातों से मुद्दे भुलाकर फुसलाने की आदत थी ही, अब मीडिया भी इस आदत का शिकार हो गया है। जनता के पास इस मीडिया को बर्दाश्त करने के अलावा और कोई चारा भी नहीं बचा है। खुद मीडिया से जुड़े कई वरिष्ठ लोगों ने इस पर चिंता जाहिर की है, लेकिन इस स्थिति को बदलने के लिए मीडिया में कोई व्यवस्थित चिंतन हो रहा हो, ऐसा बिलकुल नहीं लगता। हम भूल गए हैं कि ट्विटर और मीडिया में काफी नाटकबाजी के बाद आखिरकार अरविंद केजरीवाल 15 नवंबर को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मिलने चंडीगढ़ आए थे। उस मुलाकात के बाद दोनों मुख्यमंत्रियों ने साझा बयान जारी करके जनता को आश्वासन दिया था कि दोनों सरकारें दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण की समस्या को लेकर गंभीर हैं और इस समस्या से निपटने के लिए सतत प्रयास भी करेंगी। बयान में यह भी कहा गया है कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अगले साल की सर्दियों में प्रदूषण की स्थिति की पुनरावृत्ति न हो। हमें नहीं मालूम कि वे ‘सतत प्रयास’ क्या होंगे, कब से शुरू होंगे, कैसे शुरू होंगे, उसमें शामिल दोनों सरकारों की भूमिका क्या होगी, किसानों द्वारा भूसा जलाने की समस्या से पार पाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे, उद्योगों और वाहनों के लिए क्या नियम बनाए जाएंगे, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण का रुख क्या होगा आदि।

दोनों सरकारें इन सभी मुद्दों पर फिलहाल खामोश हैं, पंजाब के मुख्यमंत्री ने तो खैर बैठक में शामिल होने से ही इनकार कर दिया था। इसलिए पंजाब सरकार की ओर से इस समस्या के समाधान के लिए फौरी तौर पर किसी कदम की अपेक्षा तो की ही नहीं जा सकती। मजेदार बात यह है कि मीडिया भी इस मामले पर खामोश है। नहीं, नहीं, मीडिया खामोश नहीं है, वह चीख-चीख कर हमें गुजरात और राजधानी नई दिल्ली के अकबर रोड की खबरें बता रहा है। भारतीय मौसम विभाग तथा अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (स्पेस एप्लीकेशन सेंटर) के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि तमाम तरह के प्रदूषण के कारण सूर्य की रोशनी के पृथ्वी तक सीधे पहुंचने का समय लगातार घटता जाना है, जिसके कारण धूप और रोशनी का तीखापन प्रभावित हो रहा है जिससे दिन की लंबाई का समय घट जाता है। इससे शाम जल्दी ढलती है और हमें सूर्य की ऊर्जा का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है, बल्कि इससे स्वास्थ्य संबंधी कई नई परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं।

आधुनिक जीवन शैली ने हमसे कई और सुविधाएं भी छीन ली हैं। शहरी जीवन में ऊंची अट्टालिकाओं में बने कार्यालय, एक ही मंजिल पर कई-कई कार्यालयों के होने से हर कार्यालय में सूर्य के प्रकाश की सीधी पहुंच की सुविधा नहीं है। यही नहीं, जहां यह सुविधा है, वहां भी बहुत से लोग भारी परदों की सहायता से सूर्य के प्रकाश को बाहर रोक देते हैं और ट्यूबलाइट तथा एयर कंडीशनर में काम करना पसंद करते हैं। घर से कार्यालय के लिए सुबह जल्दी निकलना होता है। हम बस पर जाएं, ट्रेन पर जाएं या अपनी कार से जाएं, गाड़ी में बैठे रहने पर सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होता। अधिकांश कार्यालयों में सूर्य का प्रकाश नहीं होता और शाम को दफ्तर से छुट्टी के समय भी फिर गाड़ी का लंबा सफर हमें सूर्य के प्रकाश से वंचित कर देता है। घर आकर हम परिवार अथवा टीवी में यूं गुम हो जाते हैं कि सूर्य के प्रकाश की परवाह नहीं रहती। इस प्रकार हम प्रकृति के एक अनमोल उपहार से स्वयं को वंचित रख रहे हैं और अपने स्वास्थ्य का नुकसान कर रहे हैं। अब वैज्ञानिकों ने एक और चेतावनी दे डाली है। ‘साइंस अडवांसेज’ नामक पत्रिका में प्रकाशित एक शोध में कहा गया है कि धरती के सबसे ज्यादा आबादी वाले इलाकों में रातें खत्म होती जा रही हैं। मतलब यह कि रात तो हो रही है, लेकिन अंधेरे में कमी आई है, कालिमा घट रही है। इसका कारण है आर्टिफिशिल रोशनी में हो रही बढ़ोतरी। इसका इनसान की सेहत और पर्यावरण पर खतरनाक असर पड़ सकता है।

जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेज के क्रिस्टोफर काएबा और उनकी टीम ने सेटेलाइट की मदद से रात के वक्त धरती पर बल्ब, ट्यूबलाइट जैसी चीजों से विभिन्न इलाकों में होने वाली रोशनी को मापा और पाया कि धरती के एक बड़े हिस्से में रात के समय कुछ ज्यादा रोशनी रहने लगी है। वैज्ञानिक हमें याद दिला रहे हैं कि रात और दिन का बंटवारा यूं ही नहीं है बल्कि इसके पीछे प्रकृति का एक निश्चित प्रयोजन है। चुनावों के इस दौर में शोर ही शोर है। हमें इस शोर से उबर कर सोचना होगा कि जीवन में और क्या आवश्यकताएं हैं? सुविधा और विकास के नाम पर हम अपने ही साथ क्या खिलवाड़ कर रहे हैं? हमारे नेताओं का, बुद्धिजीवी वर्ग का और मीडिया का ध्यान इन मुद्दों से क्यों भटक जाता है? क्यों हम सिर्फ उथली राजनीति और पेज-3 के समाचारों तक सीमित हो जाते हैं? विकास की इस दौड़ में हम अंधेरा और उजाला दोनों खोते जा रहे हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश विकसित देशों की श्रेणी में आ जाए, तो हमें विकास की योजनाएं बनाते समय नागरिकों के स्वास्थ्य को भी केंद्र में रखना होगा और यह हम सब की जिम्मेदारी है कि हम किसी को भी यह सच भूलने न दें। आशा की जानी चाहिए कि नेतागण, बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया सभी मिलकर इस दिशा में सार्थक प्रयत्न करेंगे।

ई-मेल : features@indiatotal.com


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