मोदी को जनता के सवाल बूझने होंगे

By: May 31st, 2018 12:10 am

पीके खुराना

लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं

जो लोग पहले कहते थे कि मोदी ही अकेले विकल्प हैं और मोदी ये कर देंगे वो कर देंगे, बाद में कहने लग गए कि मोदी अकेला क्या कर लेगा, कुछ और पूछो तो जवाब मिलता है कि कांग्रेस ने क्या किया? बहाना तो यहां तक है कि यदि कुछ अच्छा नहीं किया, तो कुछ गलत भी नहीं किया और अंततः यह कि अगर मोदी ने कुछ अच्छा नहीं किया तो भी विकल्प क्या है? भाजपा को अपनी कारगुजारी का जवाब देना है, जनता ने भाजपा को वोट इसलिए नहीं दिए थे कि वे कांग्रेस की कमियां गिनवाएं, बल्कि इसलिए वोट दिए थे कि वे कुछ काम करें…

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने चार साल पूरे हो चुके हैं। उनके प्रधानमंत्रित्व काल का यह आखिरी साल है। सन् 2019 के लोकसभा चुनावों में अब कुछ ही महीने बाकी हैं। अतः वर्तमान सरकार के कामकाज के विश्लेषण का यह उपयुक्त समय है। इन चार सालों में प्रधानमंत्री मोदी ने कई योजनाओं की घोषणा की, कई नारे दिए, बहुत से काम किए, बहुत से राज्यों के विधानसभा चुनाव जीते। हालांकि कुछ जगह हार भी हुई, लेकिन राजनीतिक पटल पर मोदी छाए रहे। देश में आज पूरी राजनीति मोदी के बिना शून्य ही है। मोदी इस कदर छाए हैं कि भाजपा ही नहीं, संघ भी मोदी के आभामंडल से चकाचौंध है। एक तरफ मोदी के प्रशंसकों की बड़ी संख्या है, तो दूसरी तरफ आलोचना करने वालों की भी कमी नहीं है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जहां मोदी की असफलता स्पष्ट है, लेकिन शब्दजाल का सहारा लेकर उन पर पर्दा डाला जा रहा है। मसलन, आजादी केसमय भारत की कुल आबादी 32 करोड़ थी, आज देश में इतने ही लोग अत्यधिक गरीबी का जीवन जीने के लिए विवश हैं। हमारे देश में इस समय 30 करोड़ के आसपास युवा हैं और रोजगार सृजन की अवस्था अत्यंत शोचनीय है। जनता का मुद्दा है कि देश से गरीबी दूर हो, हर हाथ में रोजगार हो, ताकि हमारे देशवासी समृद्धि का जीवन जी सकें। गरीबी दूर करने और रोजगार के अवसर सृजन करने के बजाय यह सरकार गाल बजाते हुए अपने ही गुणगान में व्यस्त है। जीएसटी, नोटबंदी, रोजगार जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर भी सरकार के बयान प्रचार मात्र साबित हुए हैं। नोटबंदी से काला धन तो बाहर नहीं निकला, लेकिन छोटे व्यापारियों का गला अवश्य घुट गया। जीडीपी 7.93 प्रतिशत से गिरकर 6.50 प्रतिशत पर आ गई। नए नोट छापने में सरकार ने 21,000 करोड़ खर्च कर दिए, जबकि रिजर्व बैंक के पास सिर्फ 16,000 करोड़ ही आए। नोटबंदी से आतंकवाद पर भी कोई अंकुश नहीं लगा।

हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री ने मात्र दो लाख से कुछ ही ज्यादा युवाओं को रोजगार दिया। मोदी ने तो पकौड़े बेचने वाले लोगों की मेहनत का श्रेय भी खुद को दे दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम घटने के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते जा रहे हैं। सन् 2014 में मुंबई में पेट्रोल की कीमत 68.86 रुपए प्रति लीटर थी, जो अप्रैल 2018 में बढक़र 81.92 रुपए हो गई। देश के सत्रह राज्यों में किसानों की मासिक आय सिर्फ 1666 रुपए है, ऐसे में कर्ज के बोझ तले दबे किसान आत्महत्या के लिए विवश हैं। कर्ज माफी के नाम पर किसानों को 10 रुपए, जी हां, सिर्फ 10 रुपए या इससे भी कम की राशि के चेक थमा दिए गए। सरकार ने दो लाख के लगभग सरकारी स्कूल बंद कर दिए हैं जिससे ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, तेलंगाना और गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों की बच्चियों का स्कूल जाना बंद हो गया है। बीते चार सालों में एजुकेशन सेस के नाम पर मोदी सरकार ने 1 लाख 60 हजार 786 करोड़ रुपए वसूले हैं, मगर यह पैसा शिक्षा के किस क्षेत्र में खर्च किया गया, इसका हिसाब नहीं है, यूजीसी का बजट 67.5 प्रतिशत कम कर दिया गया है, सो अलग। यही नहीं, बीते चार सालों में शिक्षा नीति का निर्धारण तक नहीं किया गया। ‘पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक’ पर कुल 180 देशों में हम 177वें पायदान पर हैं।

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत प्रोजेक्ट मानिटरिंग ग्रुप ने 500 करोड़ या 1000 करोड़ के एफडीआई की परियोजनाओं के लिए उद्योगपतियों को ई-सुविधा पोर्टल केमाध्यम से नीतियों में परिवर्तन करवाकर क्लीयरेंस लेने की नई नीति लागू कर दी है। देश पहले से ही प्रदूषण से परेशान है, अब इस नीति से पर्यावरण को और भी नुकसान होगा और आने वाले कुछ सालों में सांस लेना दूभर हो जाएगा। वाहवाही लूटने और रोज-रोज नया नारा देने के चक्कर में मोदी ने पहले से चली आ रही बहुत सी योजनाओं को नया नाम देकर अपनी योजना के रूप में पेश किया है, लेकिन मोदी की महंगी रैलियों और अंधाधुंध प्रचार के बावजूद ‘स्टैंड-अप इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ आदि योजनाओं में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है और हमें आज तक नहीं पता कि स्मार्ट सिटी किस देश में बन रहे हैं? इतने सारे झोल-झाल के बावजूद सरकार जनता का पैसा मूर्तियां बनाने में उड़ा रही है। सरदार पटेल की मूर्ति पर 3000 करोड़ रुपए, शिवाजी की मूर्ति पर 2500 करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान है, मानों मूर्तियां बनाने से देश की समस्याएं हल हो जाएंगी। पिछले चार सालों में सरकार ने 4343 करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च किए हैं। दरअसल, भाजपा एक सोची-समझी रणनीति पर चलते हुए अपना रास्ता बना रही है। अत्यधिक ऊंचे स्वर में मोदी का गुणगान जारी है। मोदी देश में लोकप्रिय हैं, विदेश में लोकप्रिय हैं, अप्रवासी भारतीयों में लोकप्रिय हैं, भारत की साख बढ़ी है, मोदी वैश्विक नेता हैं, आदि-आदि। शासन-प्रशासन के बजाय सिर्फ और सिर्फ चुनावी राजनीति तथा प्रधानमंत्री का हमेशा चुनाव की लय में रहना ही सबसे बड़ा मकसद बन गया है। सरकार के पास बताने को कुछ नहीं है। जो लोग पहले कहते थे कि मोदी ही अकेले विकल्प हैं और मोदी ये कर देंगे वो कर देंगे, बाद में कहने लग गए कि मोदी अकेला क्या कर लेगा, कुछ और पूछो तो जवाब मिलता है कि कांग्रेस ने क्या किया? बहाना तो यहां तक है कि यदि कुछ अच्छा नहीं किया, तो कुछ गलत भी नहीं किया और अंततः यह कि अगर मोदी ने कुछ अच्छा नहीं किया तो भी विकल्प क्या है? भाजपा को अपनी कारगुजारी का जवाब देना है, जनता ने भाजपा को वोट इसलिए नहीं दिए थे कि वे कांग्रेस की कमियां गिनवाएं, बल्कि इसलिए वोट दिए थे कि वे कुछ काम करें।

मोदी और भाजपा अपनी नाकामियों का ठीकरा कांग्रेस के सिर फोड़कर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा या तो विकास के झूठे आंकड़े दे रही है या फिर मुद्दों से हट कर मोदी को मुद्दा बना रही है। यही कारण है कि भाजपा ‘मोदी नहीं, तो कौन?’ का नारा बुलंद कर रही है। जनता का सवाल यह है कि इन चार सालों में आपने क्या किया, अगले एक साल आप क्या करने वाले हैं और सन् 2019 का चुनाव आप किन मुद्दों पर लड़ना चाह रहे हैं? सवाल आपसे हैं, क्योंकि वादे आपने किए थे। विपक्ष ने गलतियां कीं तो जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। आप भी यदि विपक्ष नहीं होना चाहते हैं, तो विपक्ष की गलतियां मत गिनवाइए। हमारे सवालों का जवाब दीजिए और याद रखिए मुद्दा आप नहीं हैं, हमसे मुद्दों की बात कीजिए वरना 130 करोड़ की जनता में हम किसी और को ढूंढ ही लेंगे।

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