सत्ता व गौरव की प्रतीक विखंडित होती प्रतिमाएं

May 18th, 2018 12:10 am

प्रो. एनके सिंह

लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं

मोदी को, जो कि हालांकि जीते हैं, अपनी जीत पर विनम्र होना चाहिए। इस जीत का जश्न उपद्रव के साथ नहीं, बल्कि गंभीरता के साथ मनाना चाहिए। हमने पूर्वोत्तर में कई कहानियां देखी हैं। त्रिपुरा में साम्यवादी ताकतों पर भाजपा की जीत का जश्न इस विचारधारा के नायकों की प्रतिमाएं विखंडित करके मनाया गया। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह जीत एक बड़ा घटनाक्रम था, भाजपा उन ताकतों पर पहली बार विजित हुई थी जो अब तक उसके लिए अजेय मानी जाती थीं…

नरेंद्र मोदी ने अत्यंत कड़वाहट के साथ लड़ी गई राजनीतिक लड़ाई जीत ली है, जो कांग्रेस के लिए आपदा का दौर सरीखा है। मैंने पिछले हफ्ते ही इन्हीं कॉलम में इसके बारे में विश्लेषण पेश करते हुए भविष्यवाणी की थी। विभिन्न घटनाक्रमों का विश्लेषण करते हुए मैंने लिखा था कि यूपीए को इस चुनाव में 86 से अधिक सीटें मिलने वाली नहीं हैं तथा भाजपा व उसके सहयोगियों को 110 सीटें मिल सकती हैं। 222 में से बाकी सीटें मैंने जनता दल (एस) को दी थीं।  इस विश्लेषण का टाइटल था ः क्या यह भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत अभियान की शुरुआत है? कांग्रेस जब पूर्वोत्तर में हारी थी, तो मैंने कांग्रेस को सचेत किया था, किंतु उसने इसकी कोई परवाह नहीं की। वे सियासत में पीछे की ओर मात्र इसलिए लौट रहे हैं क्योंकि वे इसकी परवाह नहीं कर रहे हैं। कर्नाटक में जो कुछ हुआ है, उसकी कांग्रेस को चिंता होनी चाहिए तथा पार्टी के ग्राफ में गिरावट का उसे विश्लेषण करना चाहिए। उसे इस गिरावट के कारण ढूंढने चाहिए। दुर्भाग्य से अब वे फिर से ईवीएम को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। उन्हें लगता है कि ईवीएम के कारण वे जनता के बीच हंसी का पात्र बन गए हैं। लेकिन मोदी को, जो कि हालांकि जीते हैं, अपनी जीत पर विनम्र होना चाहिए। इस जीत का जश्न उपद्रव के साथ नहीं, बल्कि गंभीरता के साथ मनाना चाहिए। हमने पूर्वोत्तर में कई कहानियां देखी हैं। त्रिपुरा में साम्यवादी ताकतों पर भाजपा की जीत का जश्न इस विचारधारा के नायकों की प्रतिमाएं विखंडित करके मनाया गया। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह जीत एक बड़ा घटनाक्रम था, भाजपा उन ताकतों पर पहली बार विजित हुई थी जो अब तक उसके लिए अजेय मानी जाती थीं। पूर्वोत्तर में भाजपा का कोई अस्तित्व था ही नहीं।

त्रिपुरा में इस जीत के प्रतीक के रूप में केंद्रीय कस्बे में लेनिन की प्रतिमा को हटा दिया गया। छोटे राज्य त्रिपुरा में मुख्यमंत्री का आवास उस गली में था जिसका नामकरण लेनिन के नाम से किया गया है। कलकत्ता में भी इस तरह के स्थल हैं। वे आगे भी इसी सोच पर चलें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक विजेता जीत के बाद जो पहला काम करता है, वह यह है कि वह परास्त पक्ष की सत्ता व गौरव के प्रतीक चिन्हों को विखंडित कर देता है। मोहम्मद गजनवी ने बड़े स्तर पर ऐसा ही भौंडा प्रदर्शन किया था। उसने कला व सौंदर्य के अत्यंत उत्कृष्ट नमूनों को ध्वस्त कर दिया था। उसने ऐसा बाकी बचे ईंट व पत्थरों के भयंकर प्रतिबिंबों को खंडहरों में तबदील करने के लिए किया था। जिस स्तर पर उसने विध्वंस किया, उसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती, हालांकि उसके बाद के मुस्लिम आक्रांताओं ने ऐसा ही किया तथा सभ्यता के खंडहरों को वे वापस अपने घरों को तोहफे के रूप में ले गए। इसमें कोई संदेह नहीं कि अंग्रेजों ने भारत का विध्वंस किया, लेकिन एक अलग तरीके से, क्योंकि वे मयूर सिंहासन को अपने देश ले गए, लेकिन उन्होंने भी ऐसे स्थलों व किलों को विखंडित किया जो उत्कृष्ट रत्नों, कलात्मक चीजों व वास्तुकला के लिए जाने जाते थे।

हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हालांकि अंग्रेजों ने हमारे उद्योग व शिक्षा व्यवस्था को तहस-नहस किया, लेकिन जहां तक भारत की खोई हुई प्रतीकात्मक शक्ति का सवाल है, इसे वापस पाने में उन्होंने भारत की मदद की। पुरातत्त्व के क्षेत्र में उनकी खोज भारत की सांस्कृतिक संपदा को वापस पाने का मुख्य स्रोत था। न केवल प्रतिमाएं, बल्कि सत्ता के प्रतीक भी तस्वीरें व चित्रकलाएं हैं। हमने संसद के केंद्रीय कक्ष में राष्ट्र के उन नेताओं की तस्वीरें लगाई हैं जिन्होंने भारत के निर्माण में योगदान किया है। परंतु किसी का यह दुस्साहस नहीं होना चाहिए कि वह उन लोगों की तस्वीरें लगाए, जिन्होंने भारत को नुकसान पहुंचाया तथा जो देश की एकता व अखंडता के पक्ष में नहीं थे। इसलिए कोई उन लोगों को शामिल करने की नहीं सोच सकता जो भारत के विचार के खिलाफ थे, मिसाल के तौर पर हाफिज सैयद, मुहम्मद अली जिन्ना अथवा ऐसे ही अन्य लोग। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन ने संस्थान के भवन में जिन्ना की तस्वीर लगा दी। निश्चित रूप से जिन्ना भारत के राजनीतिक आंदोलन में एक बहुत ही सम्माननीय व्यक्ति व एक सही वैधानिक दिमाग थे, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की मांग की थी जिसके कारण देश का विभाजन हो गया। उच्च स्तर पर यदि कोई इरादों व समझौतों पर विचार करता है, तो कोई व्यक्ति अलग निष्कर्ष निकाल सकता है, लेकिन यह अपने आप में चर्चा है, न कि भारतीय यूनिवर्सिटी की दीवार पर उनकी तस्वीर लगाने के लिए छात्र संघ के फैसले का पर्याप्त कारण है। यूनिवर्सिटी काउंसिल इससे सहमत नहीं है, जबकि कुछ छात्रों ने इस पर जोर दिया और एक समूह ने इसका विरोध भी किया। किसी विश्वविद्यालय में इस तरह के विवाद पैदा करने का तर्क क्या है? जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में भी ऐसा ही हुआ था जहां नारे लगे थे कि भारत तेरे टुकड़े-टुकड़े होंगे। विश्वविद्यालय राजनीति सीखने के स्थान हो सकते हैं, परंतु मूलतः वे शिक्षा व बौद्धिकता के केंद्र हैं, वहां राष्ट्र विरोधी तत्त्वों को अपने निहित स्वार्थ साधने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए। राजनीतिक हठधर्मिता का ऐसा भोंडा प्रदर्शन शिक्षा संस्थानों में ठीक नहीं है। जिन्ना भारत के लिए प्यार व घृणा के पात्र रहे हैं। अगर उन्होंने कांग्रेस न छोड़ी होती तथा द्विराष्ट्र सिद्धांत के लिए वह लड़े न होते तो वे भारत के महान पुत्र कहलाए होते। जैसा कि सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पूर्वानुमानित किया था, यह देश के विभाजन की ओर ले जा सकता है।

जैसा कि अब बात होने लगी है कि भारत के तीन राष्ट्र बनेंगे, दो स्वतंत्र टुकड़े तथा एक पाकिस्तान के साथ। उन लोगों जो जिन्ना के विचारों के प्रति लालायित होते रहते हैं, उस बात को नहीं भूलना चाहिए जो जिन्ना ने अपने अंतिम दिनों में बीमारी की अवस्था में कही थी। जैसा कि वाल्टर क्रॉकर ने अपनी पुस्तक ‘नेहरू ः ए कांटेंपरेरी एस्टीमेट’ में कहा कि जिन्ना ने इलाज के दौरान अपने डाक्टर से कहा था, ‘पाकिस्तान का निर्माण एक भूल थी, सबसे बढि़या रास्ता यह था कि पाकिस्तान के निर्माण के बजाय हम कुछ देर और आजादी का इंतजार कर लेते।’ जबकि जिन्ना खुद इस गलती के लिए प्रायश्चित की मुद्रा में आ गए थे और इस गलती के कारण जबकि लाखों लोगों की जानें गईं, ऐसी स्थिति में हमारे छात्रों को क्यों उनकी तस्वीरों से विश्वविद्यालयों को सजा देना चाहिए?

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

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