हिमाचल की कोई विमानन नीति नहीं

Jun 1st, 2018 12:10 am

प्रो. एनके सिंह

लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं

मैं मुख्यमंत्री से अपील करना चाहूंगा कि हमें एक ऐसी विमानन नीति बनानी चाहिए, जो राज्य के विकासपरक हितों को समुचित रूप से संबोधित करे। हमें राजनीतिक नजरिए से विमानन नीति को नहीं देखना चाहिए। उचित स्थलों के बारे में सिफारिशें देने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाना चाहिए। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जाहू एक ऐसा स्थल है जो हमीरपुर, मंडी व बिलासपुर जैसे तीन जिलों की सीमा पर स्थित है। यहां पर पर्याप्त मात्रा में उपयुक्त जमीन भी है…

हिमाचल में जब भी कोई नई सरकार शपथ लेती है तो शिमला या गगल एयरपोर्ट को आपरेशनल बनाने के लिए बहुत सी घोषणाएं होती हैं। इनमें एयर बस की लैंडिंग के योग्य रनवे बनाने तथा अन्य स्थानों पर सुविधाएं देने की घोषणाएं भी शामिल रहती हैं। ये सभी घोषणाएं जनता तथा पर्यटकों को आशान्वित करती हैं। ऐसा लगने लगता है कि व्यवसायी लोगों व जरूरतमंद पर्यटकों को जल्द ही राहत मिल जाएगी। इसके लिए हवाई अड्डों के विस्तार की अनेक तरह की गतिविधियां चलती हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्रियों तथा अधिकारियों से बैठकों का दौर खत्म होने के बाद ये गतिविधियां धीरे-धीरे ठप पड़ जाती हैं। पिछले दस सालों से मैं देख चुका हैं तथा अब भी सरकार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो यह जानता हो कि हिमाचल में कोई रह रहा है जो कई कठिन हवाई अड्डों को डिजाइन कर चुका है तथा हवाई अड्डा प्रबंधन पर बहुत सारे देशों को सलाह देने का काम कर चुका है। हमने विशेषज्ञों को विकास गतिविधियों से नहीं जोड़ा है तथा ज्यादातर प्रस्तावों पर राजनीतिक नजरिए से विचार होता है, बजाय इसके कि इन पर राज्य के हित तथा इसके विकास की जरूरत के नजरिए से विचार हो। जब नए मुख्यमंत्री ने शपथ ली थी तो उन्हें एक मुख्य कदम जो तुरंत उठाना चाहिए था, वह यह था कि वह शेष देश व विश्व से राज्य की कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए कै्रश प्रोग्राम शुरू करते। हिमाचल की सड़कों की हालत दयनीय बनी हुई, उनमें जगह-जगह गड्ढे उभर आए हैं, जिसके कारण अकसर हादसे होते रहते हैं। हमें अपनी सड़कों का ध्यान रखना चाहिए, किंतु मैंने सरकार को सुझाव दिया था कि वह विमानन पर फोकस करे जो कि एक पर्वतीय व दुरुह भौगोलिक स्थिति वाले राज्य के लिए बहुत जरूरी है।

मुख्यमंत्री को परिवहन के इस माध्यम को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि राज्य में व्यापारिक गतिविधियों व पर्यटन का विकास हो सके। विमानन ही एक ऐसा माध्यम है जो समय बचा सकता है तथा पर्यटन को आसान बना सकता है। मुझे याद है कि पांच साल पहले जब मैंने मसरूर मंदिर पर अपनी किताब प्रकाशित की तो कई उद्यमियों ने धर्मशाला-मसरूर पर्यटन सर्किट के विकास में रुचि दिखाई थी। पौंग डैम में विविध तरह के पक्षी पाए जाते हैं, इसी के साथ यहां जल क्रीड़ा की संभावनाएं भी हैं, पर्यटन का बेहतर विकास यहां संभव है, जबकि साथ लगता ज्वालामुखी क्षेत्र धार्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं रखता है। जिस दिन उन्हें पहुंचना था, गगल के लिए उनकी उड़ान रद्द हो गई तथा उन्हें यह भी बताया गया कि मसरूर मंदिर के आसपास रात को ठहरने की कोई सुविधा नहीं है। फिर वे दोबारा कभी नहीं आए तथा केरल या उत्तराखंड की ओर मुड़ गए। हमारी सुगम्यता बहुत ही बुरी है तथा हवाई सेवाएं दुरुस्त नहीं हैं।

हाल में प्रवर्त्तन के पूर्व प्रमुख हमारे घर आए। वह मसरूर मंदिर पर मेरी किताब पढ़कर मसरूर घूम कर आए थे। स्मारक के आसपास मूल सुविधाएं न होने की उन्होंने शिकायत की। इससे वह बहुत परेशान नजर आए। मैंने काफी पहले यहां पर एक औसत कैफेटेरिया व स्वागत कक्ष बनाने का सुझाव दिया था। केवल विप्लव ठाकुर ही हैं जिन्होंने यहां के विकास में योगदान देते हुए हाल में यहां एक सड़क का नींव पत्थर रखा। अब हमें मीडिया से जानकारी मिल रही है कि मंडी और कुछ अन्य स्थानों पर हवाई अड्डों के निर्माण पर विचार हो रहा है। एक प्रगतिशील उपायुक्त ने जाहू के सेंट्रल प्वाइंट होने का विचार दिया है तथा इसे उपयुक्त स्थान बताया है। लेकिन उन्हें अन्य स्थान पर बदल दिया गया तथा अन्य बेहतर प्रोफेशनल्स इस तरह की गतिविधियों में रुचि नहीं रखते हैं क्योंकि राजनेता अकसर हवाई अड्डों को अपनी शक्ति के प्रतीक के रूप में अपने-अपने क्षेत्रों में स्थापित करना चाहते हैं।

मैं मुख्यमंत्री से अपील करना चाहूंगा कि हमें एक ऐसी विमानन नीति बनानी चाहिए जो राज्य के विकासपरक हितों को समुचित रूप से संबोधित करे। हमें राजनीतिक नजरिए से विमानन नीति को नहीं देखना चाहिए। उचित स्थलों के बारे में सिफारिशें देने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाना चाहिए। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जाहू एक ऐसा स्थल है जो हमीरपुर, मंडी व बिलासपुर जैसे तीन जिलों की सीमा पर स्थित है। यहां पर पर्याप्त मात्रा में उपयुक्त जमीन भी है। वास्तव में मेरे मित्र स्वर्गीय ठाकुर रणजीत सिंह चाहते थे कि जाहू को हिमाचल की राजधानी घोषित करना चाहिए तथा शिमला को एक पर्यटक स्थल के रूप में उभरने का मौका दिया जाना चाहिए। जाहू का विचार वास्तव में आदर्श के अनुकूल है क्योंकि यह स्थान शिमला की अपेक्षा ज्यादा रूप में राज्य के मध्य में स्थित है। जहां तक बढ़ते पर्यावरण नुकसान का प्रश्न है, इससे निपटने के लिए सरकारी कार्यालयों को कहीं अन्य जगह भेजा जा सकता है। गांधीवाद का अनुसरण करने से कुछ हासिल नहीं हुआ और हम मसले पर चर्चा जारी रखे हुए हैं। पिछली एक अवधि में जब प्रेम कुमार धूमल मुख्यमंत्री थे तो मैंने उनसे अंब हवाई अड्डा प्रोजेक्ट पर चर्चा की थी। यहां पर जब इसका जनविरोध हुआ क्योंकि जनता अपनी जमीन नहीं देना चाहती थी, तो मैंने सुझाव दिया था कि निजी जमीन के बजाय सरकारी जमीन का उपयोग किया जाना चाहिए क्योंकि हमारे पास पर्याप्त मात्रा में सरकारी जमीन है। कोई भी एयरपोर्ट तब तक औचित्य सिद्ध नहीं कर सकता, जब तक कि वहां पर्यटन तथा अन्य गतिविधियों के विस्तार की संभावनाएं न हों। अंब प्रोजेक्ट में विमान मरम्मत की सुविधा भी थी तथा चूंकि दिल्ली इसे परिपूर्ण कर सकती है, दिल्ली के विमानों के लिए यह पार्किंग के रूप में भी काम कर सकता है। इससे जहां राज्य में समृद्धि आएगी, वहीं रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे। किंतु दुख की बात है कि इस प्रोजेक्ट पर आगे काम नहीं हो रहा है। हमें नीति व योजना जैसे पहलुओं पर फैसले करने होंगे।

हम क्या यात्रा अथवा उद्योग अथवा बहुविध लक्ष्य के लिए हवाई अड्डे चाहते हैं? क्या हम केवल ख्याति के लिए कुछ बड़े हवाई अड्डे चाहते हैं अथवा पूरे प्रदेश को परिवहन सुविधा से जोड़ने के लिए? हमें बड़े हवाई अड्डों की जरूरत नहीं है, नेपाल की तरह हमें ज्यादा हवाई पट्टियां बनानी चाहिए। बड़े हवाई अड्डों के लिए बड़े व महंगे उपकरण चाहिए। पर्यटन व उद्योग के विकास के लिए नेपाल ने हवाई पट्टियों को आपस में जोड़ रखा है। हम भी इसका अनुसरण कर सकते हैं। कच्चा एयरपोर्ट की अवधारणा भी है, जिसकी प्रेजेंटेशन मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री के सामने दी थी। यह पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। यह हिमाचल के लिए उपयोगी साबित हो सकती है, किंतु हम बड़े-बड़े हवाई अड्डों के निर्माण की सोच रहे हैं। हम यह नहीं सोच पा रहे हैं कि हमारी जरूरत क्या है तथा हम किस तरह के हवाई अड्डे वहन करने की क्षमता रखते हैं। अब समय आ गया है जब हमें राजनीतिक नजरिए छोड़ विशेषज्ञों की सलाह पर काम करना चाहिए।

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