असम में एनसीआर से उठे प्रश्न

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं

ममता बनर्जी तो दहाड़ रही हैं कि यदि इन अवैध बांग्लादेशियों को बाहर निकाला, तो देश में गृहयुद्ध छिड़ जाएगा। खून की नदियां बह जाएंगी। कांग्रेस नरेश राहुल गांधी कह रहे हैं कि भाजपा मुसलमान विरोधी है, इसलिए वह इस प्रकार की हरकतें कर रही है। मुलायम यादव से लेकर मायावती तक सभी हकलान हो रहे हैं। कारण स्पष्ट है, ममता से लेकर मायावती, सोनिया से लेकर आजम खान, सभी को लग रहा है कि इस समय जो भी अवैध बांग्लादेशियों के साथ खड़ा हो जाएगा, मुसलमान उनको एक मुश्त वोटें डाल देंगे। इतनी वोटें एक साथ, तो देश गया भाड़ में…

असम में बांग्लादेश से लाखों नागरिक अवैध रूप से पिछले कई दशकों से निरंतर आ रहे हैं। अब उनकी संख्या करोड़ों में पहुंच गई है। बीच-बीच में सरकार इसकी सूचना संसद में भी देती रहती है। छह मई, 1997 को तत्कालीन गृहमंत्री सीपीआई के इंद्रजीत गुप्ता ने संसद को बताया था कि अवैध बांग्लादेशियों की संख्या एक करोड़ को पार कर गई है। यह स्थिति 1997 की है, तो 2018 में क्या स्थिति होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। इन बांग्लादेशियों के कारण असम की जनसांख्यिकी का अनुपात बदलना शुरू हो गया। अनेक जिले ऐसे हो गए जहां भारतीय नागरिकों की संख्या कम होती गई और अवैध बांग्लादेशियों की संख्या बढ़ती गई। ये बांग्लादेशी इधर-उधर से राशन कार्ड बनाते हैं और बाद में मतदाता सूची में नाम लिखाते हैं। शादी, बाल-बच्चे और फिर बढ़ती जनसंख्या और भारत की राजनीति में दखलअंदाजी। अब तो कई बार यह विवाद भी उठता है कि असम या बंगाल में अमुक चुना गया विधायक भारतीय नागरिक है या बांग्लादेशी नागरिक है। जाहिर है इस स्थिति को लेकर असम में हंगामा हुआ और वहां गुवाहाटी विश्वविद्यालय के छात्रों ने प्रदेश से अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को बाहर निकालने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। उस आंदोलन के कारण ही असम में पहली बार दशकों से जमी कांग्रेस सरकार चुनावों में लुढ़क गई और असम गण परिषद की सरकार स्थापित हो गई। असम के वर्तमान मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल भी उसी आंदोलन की उपज हैं, लेकिन असम गण परिषद की सरकार भी अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को प्रदेश में से बाहर नुक्ताने की बात तो दूर, असम के अंदर भी उनका बाल तक नहीं उखाड़ सकी। केंद्र सरकार ने असम सरकार को कुछ करने नहीं दिया।

मामला उच्च न्यायालय में से होता हुआ उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा। न्यायालयों ने एक बार नहीं अनेक बार कहा कि सरकार को अवैध बांग्लादेशियों की शिनाख्त कर उन्हें देश से बाहर निकालना चाहिए, लेकिन केंद्र में कांग्रेस सरकारों ने या तो सुना नहीं या सुनकर भी अनसुना कर दिया। एक दफा तो ऐसा कि केंद्र की कांग्रेस सरकार ने बांग्लादेशियों को बाहर निकालने के लिए ऐसा कानून बना दिया, ताकि चाहकर भी कोई उन्हें बाहर न निकाल सके। यदि किसी असमी मानुष को लगता है कि यह व्यक्ति बांग्लादेश से आया अवैध नागरिक है, तो वह जाकर थाने में रपट लिखा सकता है। फिर बाकायदा कचहरी में मुकद्दमा चलेगा। पेंच केवल इतना ही है कि जो शिकायत करता है, उसे ही कचहरी में सिद्ध करना पड़ेगा कि जिसकी शिकायत की गई है, वह बांग्लादेशी है। अब जैसा कि अवैध बांग्लादेशियों ने असम में अपराध के संगठित गिरोह बना लिए हैं, तो उनके भय के चलते कोई किसी बांग्लादेशी के खिलाफ थाने और कचहरी में अकेला कैसे लड़ सकता है? अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़कर बाहर निकालने का जो काम सरकार को करना चाहिए था, सरकार ने उसका दायित्व आम नागरिक के गले में डालकर अपने दायित्व से मुक्ति ले ली।

जाहिर है सरकार बांग्लादेशियों को भारत से बाहर निकालने के सारे रास्ते बंद करना चाहती थी। इधर अवैध बांग्लादेशी नागरिक भी केवल असम में ही नहीं टिके रहे, वे भी बढ़ता खतरा देखकर देश के हर हिस्से की ओर चल पड़े। सबसे सस्ती, टिकाऊ और सुरक्षित पनाहगाह तो पश्चिम बंगाल ही हो सकती थी। इसलिए बहुत बड़ी संख्या में इन लोगों ने उसी राज्य की ओर कूच किया। शेष बचे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैल गए। अब असम सरकार ने रजिस्टर तैयार किया है, जिसमें असम के उन तमाम लोगों के नाम दर्ज हैं, जो भारतीय नागरिक नहीं हैं। इस रजिस्टर में चालीस लाख लोगों के नाम नहीं हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि कितने भारतीय नागरिक हैं। अब वे हल्ला मचा रहे हैं कि उनका नाम केवल इसलिए रजिस्टर में नहीं शामिल किया गया, क्योंकि उनका मजहब इस्लाम है।

2019 में चुनाव की घंटी बज चुकी है। सभी राजनीतिक दलों के मुंह में से लार टपकनी शुरू हो गई। उनको लगता है यदि वे भी कहना शुरू कर दें कि यह तो भाजपा की मुसलमानों के साथ सरासर नाइंसाफी है तो लाभ होगा। किसी को यह चिंता नहीं हुई कि खोजबीन से केवल चालीस लाख अवैध बांग्लादेशी पकड़ में आ सके। आखिर बाकी के कहां गुम हो गए, लेकिन कुछ राजनीतिक दलों में इसके विपरीत प्रतिक्रिया हो रही है। तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी तो दहाड़ रही हैं कि यदि इन अवैध बांग्लादेशियों को बाहर निकाला, तो देश में गृहयुद्ध छिड़ जाएगा। खून की नदियां बह जाएंगी। कांग्रेस नरेश राहुल गांधी कह रहे हैं कि भाजपा मुसलमान विरोधी है, इसलिए वह इस प्रकार की हरकतें कर रही है। मुलायम यादव से लेकर मायावती तक सभी हकलान हो रहे हैं।

कारण स्पष्ट है, ममता से लेकर मायावती, सोनिया से लेकर आजम खान, सभी को लग रहा है कि इस समय जो भी अवैध बांग्लादेशियों के साथ खड़ा हो जाएगा, मुसलमान उनको एकमुश्त वोटें डाल देंगे। इतनी वोटें एक साथ, तो देश गया भाड़ में। ममता बनर्जी का तो राजनीतिक कैरियर ही दांव पर है। पश्चिम बंगाल में यदि अवैध बांग्लादेशियों की संख्या भी जोड़ दी जाए, तो मुसलमानों की संख्या तीस प्रतिशत हो जाती है। वोट की राजनीति में तीस प्रतिशत संख्या कम नहीं होती। इसलिए वे दहाड़ रही हैं। यदि बांग्लादेशियों को निकाला, तो गृहयुद्ध हो जाएगा। यही जुमला जिन्ना ने प्रयोग किया था कि यदि हिंदुस्तान के लोग पाकिस्तान बनाने की बात स्वीकार नहीं करते, तो गृहयुद्ध छिड़ जाएगा। अब केवल एक ही प्रश्न बचता है, यदि गृहयुद्ध शुरू होता है, तो दो पक्ष कौन होंगे। जाहिर है एक ओर हिंदुस्तानी और दूसरी ओर अवैध बांग्लादेशी होंगे। तब ममता बनर्जी किस पक्ष में रहेंगी?

ई-मेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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