कश्मीर समस्या की जड़ की खोज

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं

लद्दाख का रिंचन कश्मीर का राजा बन गया था, यहां तक तो ठीक है, लेकिन रिंचन मुसलमान बन गया और उसके पीछे-पीछे सारे कश्मीरी भेड़ों की तरह मुसलमान हो गए, इसको कश्मीर में भी दंत कथा से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता। सोज के इस रहस्योद्घाटन को पढ़कर सचमुच हैरानी होती है। अब तक कश्मीर में सैयद यही कहानियां सुनाते थे कि कश्मीर को विदेशी हमलावरों ने जोर-जबरदस्ती मुसलमान नहीं बनाया, बल्कि वे तो सूफियों के प्यार व सोहबत के चलते इस्लाम की शरण में चले गए, लेकिन इसमें सैकड़ों साल लगे, लेकिन अब सोज कहते हैं कि सूफियों की सोहबत की भी कश्मीरियों को जरूरत नहीं पड़ी…

जून के अंतिम दिनों में सोनिया कांग्रेस के एक बड़े नेता सैफुद्दीन सोज की जम्मू-कश्मीर को लेकर लिखी गई एक नई किताब ‘कश्मीर ः ग्लिंपसिज आफ हिस्ट्री एंड दि स्टोरी ऑफ स्ट्रगल’ की चर्चा अखबारों और टेलीविजन में शुरू हो गई थी। चर्चा को हवा देने के लिए सोज ने एक बयान जारी कर दिया था कि कश्मीरी भारत से आजादी चाहते हैं। इस बयान के बाद किताब की चर्चा और गहराती तब इस चर्चा में एक नया आयाम जोड़ा गया कि क्या किताब के विमोचन कार्यक्रम में मनमोहन सिंह आएंगे या नहीं? जाहिर है हल्ला और पड़ता और सोज साहब ने अपनी किताब में क्या लिखा है, इसे जानने की जिज्ञासा बढ़ती। आजकल यह किसी साधारण सी किताब की मार्केटिंग करने का व्यावसायिक तरीका है। मैं आमतौर पर किताब की मार्केटिंग के इस गोरखधंधे में आसानी से नहीं फंसता, लेकिन कश्मीर ज्वलंत विषय होने के कारण इस बार धोखा खा गया और दो दिन पहले सोज साहब की किताब छह सौ रुपए में खरीद ली।

किताब साधारण है और उसमें ऐसी कोई बात नहीं है, जो कश्मीर को लेकर अब तक छुपी रही हो, लेकिन उसमें एक बात पढ़कर सचमुच हैरानी हुई। सोज लिखते हैं कि 1320 में लद्दाख का बौद्ध रिंचन कश्मीर का राजा बना और राजा बनते ही वह मुसलमान हो गया और उसके मुसलमान बनते ही सारा कश्मीर मुसलमान हो गया। लद्दाख का रिंचन कश्मीर का राजा बन गया था, यहां तक तो ठीक है, लेकिन रिंचन मुसलमान बन गया और उसके पीछे-पीछे सारे कश्मीरी भेड़ों की तरह मुसलमान हो गए, इसको कश्मीर में भी दंत कथा से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता। सोज के इस रहस्योद्घाटन को पढ़कर सचमुच हैरानी होती है। अब तक कश्मीर में सैयद यही कहानियां सुनाते थे कि कश्मीर को विदेशी हमलावरों ने जोर-जबरदस्ती मुसलमान नहीं बनाया, बल्कि वे तो सूफियों के प्यार व सोहबत के चलते इस्लाम की शरण में चले गए, लेकिन इसमें सैकड़ों साल लगे, लेकिन अब सोज कहते हैं कि सूफियों की सोहबत की भी कश्मीरियों को जरूरत नहीं पड़ी। वे तो अपने राजा के पीछे-पीछे चलते तीन साल में ही मुसलमान हो गए। रिंचन के मुसलमान बनने और उसके साथ कश्मीरियों के मुसलमान हो जाने की कथा सैयदों ने क्यों गढ़ी, इसको जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर यह सैयद कौन थे और कश्मीर में क्या कर रहे थे। सैयद अरब के रहने वाले हैं और इनकी वंश परंपरा इस्लाम के संस्थापक हजरत मोहम्मद के दामाद हजरत अली से जुड़ती है। इसलिए ये अपने आप को मुसलमानों के मसीहा मानते हैं। अरबों ने मध्य एशिया पर हमला करके वहां के तुर्कों और मंगोलों को परास्त कर मुसलमान तो बना लिया, लेकिन उसके कारण उनको एक नुकसान भी हुआ। मुसलमानों की तमाम जनसंख्या में अरब अल्पमत में रह गए और तुर्क व मंगोल बहुमत में हो गए। जाहिर है इस्लामी जगत पर तुर्कों व मंगोलों का दबदबा बढ़ता। मंगोल सरदार तैमूरलंग ने सब मुसलमान देशों पर अधिकार जमा लिया। इरान भी उसके कब्जे में आ गया। तुर्कों, मंगोलों ने अपने आप को इस्लाम का खलीफा घोषित कर दिया, लेकिन इसे अपने आप को इस्लाम का मसीहा मानने वाले अरबी सैयद कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? उन्होंने तैमूरलंग को इस्लाम का खलीफा मानने से इनकार कर दिया। उसके बाद जो होना था, वही हुआ। तैमूरलंग ने सैयदों की वह धुनाई की कि वे जान बचाने के लिए हिंदुस्तान की ओर भागे और अनेक सूफी सिलसिलों से जुड़ गए। उनमें से एक सैयद भागता हुआ 1310 के आसपास कश्मीर में भी पहुंच गया। यह सैयद शरफुद्दीन उर्फ बुलबुल शाह था। कश्मीरियों ने उसको शरण दी। उसने यहां भी कश्मीरियों में अपने सैयद होने का रौब गांठना शुरू किया। वही हजरत अली के वंश से जुड़े होने की कथा, लेकिन कश्मीरियों पर उसका क्या रौब पड़ता? इधर कश्मीरी ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपने आप को पूरे देश का सिरमौर मानते थे। वह अपने सामने सैयदों को क्यों घास डालते? रिंचन का दोष केवल इतना था कि उसने अपने महल के पास ही लद्दाख से आने वाले भोटों के लिए एक सराय, लंगरखाना और पूजा के लिए एक छोटा मठ भी बनाया। इसमें उन्होंने सैयद बुलबुल शाह को भी रहने की अनुमति दे दी। मठ में सैयद मुसलमान के रहने के कारण यह मठ लद्दाखी मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध हो गया। रिंचन की सत्ता संभालने के तीन साल बाद और उसके तीन साल बाद सैयद बुलबुल शाह की मौत हो गई। उसके सैकड़ों साल बाद कश्मीरियों को मुसलमान बनाया जाता रहा। इसमें कालांतर में आने वाले सैयदों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सिकंदर बुतशिकन ने इस्लाम के लिए हजारों कश्मीरियों को मौत के घाट उतार दिया। मोहम्मद शाह इराकी की तलवार से न जाने कितने कश्मीरी बेमौके मारे गए, लेकिन सैयदों को तो यह सिद्ध करना था कि कश्मीरी अपनी इच्छा से सूफी सैयदों के मुरीद हो गए। जो कश्मीरी सारे हिंदुस्तान को अपना मुरीद बताते हैं, वे विदेशी सैयदों के मुरीद हो गए और उनके एक बार कहने पर मुसलमान हो गए, इस पर सैयद ही विश्वास कर सकते हैं, कश्मीरी नहीं। कालांतर में सैयदों को यह सिद्ध करना था कि कश्मीरियों को अरबों, तुर्कों व मंगोलों ने बलपूर्वक मुसलमान नहीं बनाया, बल्कि वे तो अपनी इच्छा से मुसलमान बने थे। इस बात को सिद्ध करने के लिए यह कहानी गढ़ी गई कि सैयद बुलबुल शाह ने राजा रिंचन को ही मुसलमान बना लिया। रिंचन के बहुत बाद जब कश्मीर में अधिकांश प्रजा का मत परिवर्तन हो गया होगा, तब सैयदों ने यह कथा अपने एक पूर्व साथी बुलबुल शाह कलंदर का प्रभामंडल निर्माण करने के लिए रची होगी। प्रो. अब्दुल क्यूम रफीकी भी मानते हैं कि यह कथा इस्लाम को महिमामंडित करने और सैयद शरफुद्दीन की चमत्कारी शक्तियों को स्थापित करने के लिए गढ़ी गई लगती है। सैफुद्दीन सोज कश्मीर के रहने वाले हैं। अर्थशास्त्र में एमए की पढ़ाई करने के बाद कश्मीर के कुछ कालजों में अध्यापक लगे रहे। बाद में स्कूल एजूकेशन के बोर्ड में सचिव हो गए। कुछ देर तक कश्मीर विश्वविद्यालय में कुलसचिव भी रहे। बाद में राजनीति में चले गए। वहां इनका संबंध नेशनल कान्फ्रेंस और सोनिया कांग्रेस से जुड़ा रहा। अब वे प्रचार कर रहे  हैं कि ‘बुलबुल शाह’ ने रिंचन को मुसलमान बनाया और जब कश्मीर के लोगों ने अपने राजा को मुसलमान बनते देखा, तो तुरंत उसका अनुकरण करते हुए मुसलमान हो गए।

बुलबुल शाह ने रिंचन को मुसलमान बनाया, इसको लेकर तो पक्ष-विपक्ष में फिर भी मतभेद हैं, लेकिन अपने राजा को मुसलमान बनते देख सारे कश्मीरी मुसलमान बन गए, यह रहस्योद्घाटन पहली बार सोज ने ही किया है। यह अलग बात है कि इस रहस्योद्घाटन को विश्वसनीय बनाने के लिए न तो उन्होंने कोई स्रोत बताया है, न ही कोई तर्क दिया है और न ही उस समय की घटनाओं की कोई ऐसी सिलसिलेवार व्याख्या की है कि उनकी इस बात पर विश्वास किया जा सके। फिर भी वे मानते हैं कि रिंचन, जो लद्दाखी बौद्ध था, ने एक दिन पहले इस्लाम को पकड़ा और दूसरे दिन से सभी कश्मीरी भेड़ों की तरह उसका अनुसरण करते हुए मुसलमान होने लगे और उसके राज के तीन साल के अल्पकाल में सारे कश्मीरी मुसलमान हो गए। सैयदों से प्रमाण की आशा करना तो मध्यकालीन फारसी इतिहास लेखन की शैली को देखते हुए उचित नहीं होगा, लेकिन सोज तो मध्य युग के नहीं, बल्कि इक्कीसवीं शताब्दी में रहते हैं। रिंचन के मुसलमान बनने या न बनने की बहस का नतीजा चाहे जो मर्जी हो, लेकिन शासन संभालने के तीन साल बाद ही 1323 में बीमारी से उसकी मौत हो गई और सैफुद्दीन सोज आज 2018 में भी यही चाहते हैं कि कश्मीर के लोग इस बात पर विश्वास कर लें कि उनके पूर्वज लद्दाख के रिंचन को मुसलमान बनते देख तीन साल के अंदर मुसलमान हो गए। मुझे लगा मैंने अपने छह सौ रुपए जेहलम नदी में फेंक दिए हैं।

ई-मेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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