डराने का काम करने लगा धर्म
पीके खुराना
लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं
स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए गर्व का विषय है, पर हमें साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि स्वतंत्रता पूर्ण हो, यह व्यक्ति को समर्थ बनाए, उसे बेडि़यों में न बांधे, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में उसकी जीत में सहायक हो, उसकी उन्नति और समृद्धि का साधन बने। स्वतंत्रता तभी सार्थक है यदि वह देश के नागरिकों को भी स्वतंत्रता का एहसास कराए। देश स्वतंत्र हो, सार्वभौम हो, शक्तिशाली हो, खुशहाल हो, यह आवश्यक है, परंतु इसकी सार्थकता इसी में है कि देश के नागरिक भी शारीरिक, मानसिक और धार्मिक दासता से मुक्त हों…
इस माह हमने देश का 72वां स्वतंत्रता दिवस मनाया, प्रधानमंत्री का बासी भाषण सुना, अटल जी का जाना देखा, केरल की बाढ़ देखी और कई लोगों को यह भी कहते सुना कि बाढ़ प्रभावित केरल के लोगों को सहायता नहीं देनी चाहिए, क्योंकि वे मुस्लिम हैं, ईसाई हैं, खाड़ी देशों में काम करते हैं, अमीर हैं आदि-आदि। राष्ट्रीय मीडिया ने शुरू में केरल की बाढ़ की ऐसे उपेक्षा की मानो यह किसी गांव की किसी एक गली का संकट हो। यहां सोशल मीडिया ने अपनी ताकत दिखाई, ऑनलाइन न्यूज पोर्टल ने जिम्मेदारी बरती और देश भर ने केरल के अपने बहनों-भाइयों का साथ देने में उदारता का परिचय दिया। केरल के बहाने फिर से भारत एक हुआ और केरलवासियों ने इसका खुले मन से स्वागत किया। ‘भारत उदय’ और ‘जय हो’ का इससे बढि़या उदाहरण कोई और नहीं हो सकता। केरल के मलयाली भाषी खुद को खुशी से मल्लू बोलते हैं और अपनी खुशमिजाजी के लिए प्रसिद्ध हैं। केरल के बहुत से लोग रोजगार के लिए खाड़ी देशों में जाते हैं और उन्होंने वहां रहकर समृद्धि पाई है। इससे केरल में खुशहाली आई है। मैं इस बात का जिक्र विशेष रूप से इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि जब हम स्वतंत्रता की बात करते हैं, तो यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि आर्थिक स्वतंत्रतता के बिना वास्तविक स्वतंत्रता संभव नहीं है।
स्वतंत्रता सिर्फ देश की नहीं होती, नागरिकों की भी होती है। क्या हम नागरिक के रूप में स्वतंत्र हैं? इसे समझाने के लिए इतना ही कहना काफी है कि एक गरीब व्यक्ति अपनी गरीबी के कारण दिन भर में कई बार मन मसोस कर रह जाता है। गरीब व्यक्ति अपनी गरीबी के कारण अपमान बर्दाश्त करता है और चुप रह जाता है। क्या वह स्वतंत्र है? भविष्य की असुरक्षा का डर गरीब आदमी को ही नहीं, अमीरों को भी सताता है। बेईमानी, जमाखोरी, भ्रष्टाचार का एक कारण लालच तो है ही, इसका एक बड़ा कारण भविष्य की असुरक्षा का डर भी है। यह डर, यह भय कि ‘कल क्या होगा?’ हमें गुलाम बनाता है। गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास आदि गुलामी के मूल कारण हैं। स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए गर्व का विषय है, पर हमें साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि स्वतंत्रता पूर्ण हो, यह व्यक्ति को समर्थ बनाए, उसे बेडि़यों में न बांधे, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में उसकी जीत में सहायक हो, उसकी उन्नति और समृद्धि का साधन बने। स्वतंत्रता तभी सार्थक है यदि वह देश के नागरिकों को भी स्वतंत्रता का एहसास कराए। देश स्वतंत्र हो, सार्वभौम हो, शक्तिशाली हो, खुशहाल हो, यह आवश्यक है, परंतु इसकी सार्थकता इसी में है कि देश के नागरिक भी शारीरिक, मानसिक और धार्मिक दासता से मुक्त हों। दुनिया भर में बहुत से लोग ‘डर की दुकान’ चला रहे हैं, वे लोगों को डरा-डरा कर उन्हें लूट रहे हैं।
अनिष्ट की आशंका से डरे हुए लोग गहरे दुष्चक्र का शिकार बनते हैं और फिर दासता से बाहर नहीं आ पाते। यह दासता कैसी भी हो सकती है। दासता शारीरिक हो, मानसिक हो या धार्मिक हो, हम चाहे समझें या न समझें पर यह समान रूप से दुखदायी है। आज हर धर्म ‘डर की दुकान’ चला रहा है। चर्च के पास अकूत पैसा है, बडे़ साधन हैं, शिक्षा की प्रचुरता है, कल्पनाशीलता है और ऐसे ढके-छुपे दसियों मंच हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ईसाइयत के प्रचार में जुटे हैं और धर्म परिवर्तन की सतत मुहिम चलाए हुए हैं। मदरसे अज्ञानता का लाभ उठाकर और अज्ञानता परोसकर फलते-फूलते रहे हैं और इनमें से कई तो आतंकवाद के प्रसार का मंच भी बने। देश की कथित राष्ट्रवादी सरकार ने संघ को मुखर बनाया है और वह देश को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए अब खुलकर मैदान में है। अधिकांश धर्मों द्वारा चलाई जा रही डर की दुकान इसलिए भी कामयाब है, क्योंकि प्रतियोगी धर्म भी वैसा ही कर रहा है। राजनीति से दूर हो चुके, वाणी गंवा चुके अटल जी, अपने स्वर्गवास के कारण एक बार फिर चर्चा में आए। सारे देश ने उनके गुणों को याद किया और उनकी महानता के चर्चे सुनाए। पर इसी बीच मीडिया ने संघ के ‘हिंदू राष्ट्र’ के एजेंडे में वाजपेयी की भूमिका की भी चर्चा की। अटल बिहारी वाजपेयी और जनसत्ता के संपादक रहे स्वर्गीय पत्रकार प्रभाष जोशी, अटल जी को हमेशा ‘संघ का मुखौटा’ कहते थे।
वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तो ऐसा लगता था कि भाजपा में दो गुट हैं, एक गुट के मुखिया खुद प्रधानमंत्री वाजपेयी हैं तो दूसरे गुट के मुखिया, जिसे तब ‘गर्म गुट’ माना जाता था, के मुखिया लालकृष्ण आडवाणी थे। वाजपेयी तब भाजपा का ‘लोकप्रिय उदारवादी चेहरा’ थे और वे राजधर्म निभाते नजर आते थे, जबकि आडवाणी को तब संघ की आवाज माना जाता था। जबकि असलियत यह है कि दोनों का एक ही एजेंडा था और गर्म दल व नर्म दल का अंतर रखना इसलिए जरूरी था कि भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था और शेष सहयोगी दल संघ के एजेंडे पर काम करने को तैयार नहीं थे। वाजपेयी का नर्म रुख समय की आवश्यकता थी, असलियत नहीं थी। इस बात का जिक्र सिर्फ इस संदर्भ में है कि हर धर्म दूसरे धर्म से डरा हुआ है। धर्म आज हमें शक्ति देने के बजाय डराने का काम कर रहा है, और यह सिर्फ किसी एक धर्म तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सार्वभौम सत्य बन गया है। भारतीयता में रंगा हिंदू धर्म आततायी नहीं था, आक्रामक भी नहीं था, उसमें अन्य धर्मों को स्वीकार करने और उनका सम्मान करने की सहज वृत्ति थी, संघ के हिंदुत्व में ऐसा नहीं है। आज हम धर्मों में ही नहीं, जातियों तक में बंटे हुए हैं। धर्म और राजनीति के घालमेल के कारण यह क्षरण हुआ है। समाज का हर वर्ग अंदर ही अंदर और भी बंटा हुआ है। इससे डर और बढ़ रहा है, संकुचन और बढ़ रहा है और वर्गों के अंदर के वर्गों में एकता के नाम पर उग्रता बढ़ती जा रही है।
मोदी के उद्भव से भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला। उनके बारह साल के मुख्यमंत्रित्व काल में संघ के हिंदू एजेंडे का करिश्मा देखने को मिला और वे हर चुनाव जीतते रहे। कांग्रेस और उदारवादी कहे जाने वाले दलों ने जहां बेशर्मी से हिंदुओं को दबाया, वहीं अब भाजपा के शासनकाल में गैर-हिंदुओं को उनकी औकात बताने की प्रथा चल निकली है। दोनों पक्षों के व्यवहार की इस अतिवादिता से समाज में बिखराव बढ़ेगा, डर बढ़ेगा और उसका देश को नुकसान होगा। हम एक ऐसी खाई खोद रहे हैं, जिसको पाटना पीढि़यों तक संभव नहीं हो पाएगा। आज हमें यह सोचना है कि स्वतंत्रता का हमारे देश के लिए और हम भारतीयों के लिए क्या अर्थ है? क्या हम एक समग्र, संपूर्ण, स्वतंत्र जीवन जी रहे हैं, क्या हमारी आर्थिक प्रगति की दिशा सही है, क्या हम धार्मिक रूप से सहिष्णु हैं, क्या हम सब आपस में मिल-जुल कर रह सकते हैं, क्या दंगों से बचा जा सकता है, क्या बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के समय हम निःसंकोच होकर एक-दूसरे की सहायता के लिए तत्पर हो सकते हैं? गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर के शब्दों में कहें तो क्या हमारा चित हर प्रकार के भय से शून्य है? यह एक बड़ा सवाल है और इसके उत्तर में ही हमारी आजादी की सार्थकता छिपी है। आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम सच्चे भारतीय बनें, किसी एक धर्म की बात करने के बजाय, हम इनसानियत की बात करें और जम्हूरियत को मजबूती दें।
ईमेलः indiatotal.features@gmail.com
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स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए गर्व का विषय है, पर हमें साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि स्वतंत्रता पूर्ण हो, यह व्यक्ति को समर्थ बनाए, उसे बेडि़यों में न बांधे, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में उसकी जीत में सहायक हो, उसकी उन्नति और समृद्धि का साधन बने। स्वतंत्रता तभी सार्थक है यदि वह देश के नागरिकों को भी स्वतंत्रता का एहसास कराए। देश स्वतंत्र हो, सार्वभौम हो, शक्तिशाली हो, खुशहाल हो, यह आवश्यक है, परंतु इसकी सार्थकता इसी में है कि देश के नागरिक भी शारीरिक, मानसिक और धार्मिक दासता से मुक्त हों…