शहरी नक्सलवाद पर उठते सवाल

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं

ताज्जुब है जिन माओवादियों ने सोनिया कांग्रेस के विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा की नृशंस हत्या कर दी, उन्हीं षड्यंत्रों में लिप्त लोगों की जांच-पड़ताल जब जांच अभिकरण करना चाहते हैं, तो राहुल गांधी भी इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार मानते हैं। विपक्षी एकता की अद्भुत मिसाल पेश की जा रही है। एक समूह उन राजनीतिक दलों का है, जो मोदी सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से हटाना चाहते हैं और दूसरा गिरोह उन माओवादियों का है, जो मोदी को जान से मारकर हटाना चाहते हैं। पंचरत्नों की गिरफ्तारी के मामले में दोनों समूहों में कमाल की एकता है…

महाराष्ट्र की पुलिस ने 28 अगस्त को देश के विभिन्न भागों में छापेमारी कर हैदराबाद से वरवरा, जो वहां के कवि हैं, मुंबई से सामाजिक कार्यकर्ता वेरनोन गोंजालवे और अरुण फरेरा हरियाणा, फरीदाबाद से प्राध्यापिका सुधा भारद्वाज और दिल्ली से गौतम नवलखा को पकड़ा था। वैसे इन पांचों का पुलिस के शिकंजे में फंसना इनके लिए कोई नया अनुभव नहीं था। इनमें से ज्यादा जेल में आते-जाते रहे हैं और थोड़ी-बहुत सजा भी भुगतते रहे हैं। जाहिर है कि इस प्रकार के लोग अकेले नहीं होते। उनके साथ पूरी चेन होती है। जब उस चेन का एक हिस्सा कहीं फंस जाता है, तो अपने आप ही पूरी श्रृंखला सक्रिय हो जाती है। वैसे तो इस प्रकार के काम में संलिप्त कार्यकर्ता कभी भी पूरी श्रृंखला को एक्सपोज नहीं होने देते। यदि यह हो जाए, तो सारा खेल बिगड़ जाता है, लेकिन महाराष्ट्र पुलिस जब रोना बिल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग और सुधीर धावले के यहां तलाशी ले रही थी, तो इन पांचों महानुभावों के भी सुराग मिले। जैसे ही महाराष्ट्र पुलिस ने इनको पकड़ा, तुरंत श्रृंखला के दूसरे हिस्से सक्रिय हुए और कोर्ट कचहरी में भागदौड़ शुरू हुई। असली चिंता थी कि किसी तरह महाराष्ट्र की पुलिस इन्हें दिल्ली न ले जा सके। खैर, भागदौड़ काम आई और कोर्ट कचहरी ने भी कहा कि फिलहाल इन्हें अपने-अपने घरों में ही नजरबंद मान लिया जाए। किसी तरह सांस लेने का वक्त तो मिला। आसन्न संकट टल जाए, तो आगे की रणनीति सोच-समझ कर बनाई जा सकती है। इस प्रकार के संकट काल में समय बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। उसके बाद इन पांचों को लेकर श्रृंखला के दूसरे हिस्से सक्रिय हुए। उस हिस्से ने उच्चतम न्यायालय में फरियाद लगाई। जाहिर है फरियाद यही है कि ये पांचों महामानव निर्दोष ही नहीं, बल्कि देश की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं।

सरकार इन्हें पकडक़र इनके देशभक्ति के काम में बाधा डाल रही है। ये फरियाद लगाने वाले महानुभाव भी पांच ही हैं। सेवानिवृत्त प्राध्यापिका रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और देवकी जैन, समाजशास्त्री सतीश देशपांडे और मानवाधिकार कार्यकर्ता माजा दारुवाला हैं। वैसे पकड़े गए महानुभावों और फरियाद लगाने वालों की रणनीति की दाद देनी पड़ेगी। पकड़े जाने वालों में भी एक महिला और चार पुरुष हैं और फरियाद लगाने वालों में भी एक महिला और चार पुरुष ही हैं। यह संयोग भी हो सकता है, लेकिन ऐसे मामले बहुत ही संवेदनशील होते हैं। खासकर समाजशास्त्रियों को हर कदम फूंक-फूंक कर चलना पड़ता है। यह संतुलन न होता, तो कल को कोई लिंगभेद का आरोप ही लगा सकता था। प्रश्न उठता है कि ये जो पंचरत्न पकड़े गए हैं, उनका अपराध क्या है? बहुत सुरक्षित रहना हो, तो तथाकथित अपराध क्या है? महाराष्ट्र पुलिस का कहना है कि इन लोगों के जंगलों में देश के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में लगे हुए माओवादियों से संबंध हैं। माओवादी यह मानते हैं कि देश में विधि द्वारा स्थापित सरकार को लोकमत से अपदस्थ करने का संवैधानिक रास्ता उन्हें मान्य नहीं है। बाबा साहेब अंबेडकर का बनाया यह संविधान बुर्जुआ वर्ग का है और उन्हीं के हितों का पोषण करता है। इसलिए अंबेडकर के इस संविधान में उनका विश्वास नहीं है। वे इस संवैधानिक सरकार को हथियारों के बल पर उखाडऩे में विश्वास रखते हैं। इसलिए वे जंगलों में रहकर वहां के लोगों को एक प्रकार से बंधक बना कर तोड़-फोड़ और हत्याओं के काम में लगे हैं। उनका शिकार ज्यादातर सशस्त्र बलों के सैनिक ही होते हैं, क्योंकि हथियारों से लैस ऐसे गिरोहों का मुकाबला सशस्त्र बलों को ही करना होता है। प्रश्न है कि इन गिरोहों को आधुनिक हथियार कहां से मिलते हैं? उसकी व्यवस्था चीन, पाकिस्तान की सरकारें आसानी से करने को तैयार हैं, लेकिन इस पूरी श्रृंखला के एक हिस्से को स्पष्ट करना अभी भी बचता है। जंगल में जो आदमी देश को तोडऩे के लिए हथियार उठाकर मरने के लिए तैयार हो जाता है, उसे इस काम के लिए कैसे तैयार किया जाए, ये काम ऐसे शहरी माओवादी करते हैं। उनका वैचारिक लिहाज से ब्रेनवाश करते हैं। खुद मरना मुश्किल है, लेकिन गरीबों के बच्चों को तो इस काम के लिए तैयार किया ही जा सकता है। पकड़े गए इन पंचरत्नों पर इसी प्रकार के आरोप हैं, लेकिन पंचरत्न और उनके सहायक भी पहुंचे हुए खिलाड़ी हैं।

उनका कहना है कि सशस्त्र क्रांति के पक्ष में लिखना-बोलना या उसका प्रचार करना बोलने की आजादी के अंतर्गत आता है। मोदी सरकार उनकी बोलने की आजादी छीनकर देश में तानाशाही लाद रही है। इटली से पाठ सीखे कुछ बुद्धिजीवी इसे फासीवाद भी कहते हैं। ताज्जुब है जिन माओवादियों ने सोनिया कांग्रेस के विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा की नृशंस हत्या कर दी, उन्हीं षड्यंत्रों में लिप्त लोगों की जांच-पड़ताल जब जांच अभिकरण करना चाहते हैं, तो राहुल गांधी भी इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार मानते हैं। विपक्षी एकता की अद्भुत मिसाल पेश की जा रही है। एक समूह उन राजनीतिक दलों का है, जो मोदी सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से हटाना चाहते हैं और दूसरा गिरोह उन माओवादियों का है, जो मोदी को जान से मारकर हटाना चाहते हैं।

पंचरत्नों की गिरफ्तारी के मामले में दोनों समूहों में कमाल की एकता देखी जा रही है। महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था, तो अंधे धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा था कि कुरुक्षेत्र में मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या-क्या किया? पांडु के पुत्रों ने क्या किया यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन धृतराष्ट के पुत्र क्या कर रहे हैं, वह धीरे-धीरे सभी के सामने आ रहा है।

ई-मेल: kuldeepagnihotri@gmail.com

 

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