गणतंत्र दिवस के नए संकल्प

Feb 1st, 2019 12:08 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

गणतंत्र दिवस मनाने का मूल लक्ष्य उन सभी राज्यों को एक साथ लाना था जो अपनी व्यापक विविधताओं के कारण पूरे वर्ष एक मंच पर नहीं आ पाते हैं। नेहरू ने इस समारोह में राज्यों की सामूहिकता तथा उनकी संस्कृति उपलब्ध करवाई। यह बमुश्किल राजनीतिक वक्तव्य था क्योंकि केंद्र के समारोह के अलावा राज्यों के अपने अलग समारोह होते हैं। गणतंत्र दिवस मनाने का उद्देश्य   देश की संस्कृति व रक्षा शक्ति को आगे लाना तथा विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभा को पहचान देना है। यह अवसर हमारी संघीय सद्भावना को पल्लवित करने का भी माध्यम है…

स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा परिकल्पित भारतीय संविधान के लागू होने के उपलक्ष्य में भारत ने एक बार फिर हाल में धूमधाम से गणतंत्र दिवस मनाया। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसमें एक नया परिशिष्ट जोड़ते हुए इस दिवस पर आयोजित परेड में सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी के योद्धाओं को भी शामिल किया। यह काम करना नेहरू भूल गए थे। मोदी ने ऐसा करके बोस की इस आर्मी को सम्मान बख्शा है। मोदी के शासनकाल में हर उस संस्था व व्यक्ति को पहचान मिली है जिनकी अपनी एक महिमा रही है और जिनकी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से उपेक्षा की गई। किंतु प्रधानमंत्री खुद संविधान के अधीन हैं तथा उनकी पार्टी के सभी सदस्यों ने इसी संविधान की शपथ ले रखी है। हमारा संविधान न तो पूर्णतः संघात्मक है और न ही एकात्मक। यह नेहरू के नजरिए से सृजित किया गया मिश्रण है। यह बीआर अंबेडकर का दस्तावेज नहीं है,  बल्कि ज्यादातर ऐसा संविधान है जो नेहरू के विचारों पर आधारित है। कोई व्यक्ति इस तथ्य की प्रशंसा कर सकता है कि यह राजवंशीय दस्तावेज है क्योंकि इसे मोती लाल नेहरू द्वारा 1928 में तैयार की गई नेहरू रिपोर्ट से आंशिक रूप से लिया गया है। मोती लाल नेहरू ने तब लिखा था, ‘हमारे राज्यों में बहनों सा संबंध है जो स्थानीय व प्रांतीय हितों के सभी मसलों में स्वशासित हैं।’ भारतीय जनता पार्टी, जो राजवंशीय अवधारणा का विरोध करती है, भी इसका समर्थन करती है। राजसी विचारों वाले पिता-पुत्र के रुआब को देखते हुए संविधान ने भी ब्रिटिश किस्म की संसदीय प्रणाली की नकल करते हुए इस माडल को अपना लिया। यह सर्वविदित है कि डा. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल तथा अन्य नेता संघात्मक शासन प्रणाली के पक्ष में थे तथा इस संबंध में उन्होंने मसौदा भी तैयार किया था। लेकिन अचानक एक सुबह ऐसी आई जब उन्हें संसदीय प्रणाली के समर्थन का एक प्रस्ताव मिला। आश्चर्यजनक रूप से किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया तथा इसे रिपोर्ट में स्वीकार कर लिया गया। सच्चे संघात्मक संविधान अमरीका, आस्ट्रेलिया व कैनेडा के हैं जहां केंद्र व राज्यों में शक्तियों का विभाजन किया गया है। भारत में भी केंद्र व राज्यों में शक्तियों का बंटवारा किया गया है, किंतु यहां शक्तियों का बंटवारा ज्यादातर केंद्र के पक्ष में है। यहां संघ सूची व राज्य सूची बनाते हुए केंद्र शासित राज्य भी बनाए गए हैं जो कि प्रत्यक्ष रूप से केंद्र द्वारा शासित होते हैं। कुछ हद तक इसे संघीय संविधान माना गया है, किंतु बहुत ही महत्त्वपूर्ण शक्तियों में जिस तरह वित्तीय, विदेश मामले व रक्षा संबंधी शक्तियां केंद्र को सौंपी गई हैं, उससे भारत एक एकात्मक शासन वाला देश ज्यादा लगता है।  भानु धमीजा जैसे कई विशेषज्ञ हैं जो भारत द्वारा अपनाई गई संसदीय प्रणाली के बजाय संघीय राष्ट्रपति प्रणाली की पैरवी कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस मनाने का मूल लक्ष्य उन सभी राज्यों को एक साथ लाना था जो अपनी व्यापक विविधताओं के कारण पूरे वर्ष एक मंच पर नहीं आ पाते हैं। नेहरू ने इस समारोह में राज्यों की सामूहिकता तथा उनकी संस्कृति उपलब्ध करवाई। यह बमुश्किल राजनीतिक वक्तव्य था क्योंकि केंद्र के समारोह के अलावा राज्यों के अपने अलग समारोह होते हैं। गणतंत्र दिवस मनाने का उद्देश्य   देश की संस्कृति व रक्षा शक्ति को आगे लाना तथा विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभा को पहचान देना है। यह अवसर हमारी संघीय सद्भावना को पल्लवित करने का भी माध्यम है। शायद नेहरू ने सोचा कि यह संघीय प्रणाली की प्रतीकात्मक एकता है जिसमें व्यापक स्तर पर विविधता है। इस बार लगता है कि भारत की थल सेना, वायु सेना व नौसेना के मांसल प्रदर्शन पर ज्यादा फोकस किया गया। आश्चर्यजनक रूप से इस बार समारोह के मुख्य अतिथि तय करने में भी काफी कसरत हुई क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पेशकश को ठुकरा दिया था। साम्राज्यवादी युग के बाद भारत के निर्माण में नेहरू के योगदान के बावजूद वह महान पुनरुद्धार के लिए नहीं जाने जाएंगे, बल्कि उस विरासत के लिए जाने जाएंगे जिसमें गरीबी का उन्मूलन नहीं हो सका तथा आर्थिक बदलाव भी नहीं हुआ। उन्होंने गरीबी हटाने के लिए रोना-धोना जरूर किया, किंतु इस दिशा में वह कोई ठोस प्रयास नहीं कर पाए।

गणतंत्र दिवस हमें एक राष्ट्र के रूप में एकीकृत होने के उनके संदेश की याद जरूर दिलाता है, किंतु यह एकता नेहरू ने पैदा नहीं की। एक आस्ट्रेलियन कूटनीतिज्ञ वाल्टर क्रॉकर का निष्कर्ष है कि नेहरू ने भारत की एकता का सृजन नहीं किया। वह कहते हैं, ‘1947 में भारत की आजादी से लेकर 1963  तक नेहरू के राज तक भारत में न तो खाने के लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री थी, न लोगों के रहने के लिए पर्याप्त आवास थे, देश में भ्रष्टाचार भी बड़े पैमाने पर था, भारत की कई अन्य समस्याएं भी ज्यों की त्यों थी, भारत अपनी सुरक्षा को लेकर भी निश्चिंत नहीं था और उसकी चीन व पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ हथियारों को लेकर होड़ लगी हुई थी। विदेशी मुद्रा विनिमय को लेकर कठिनाइयां भी बनी हुई थीं तथा बेरोजगारी की समस्या भी हल नहीं हो पाई थी। एशियन या अफ्रीकी देशों में भारत का सम्मान भी नहीं बढ़ पाया।’ यह भारत में रहे एक कूटनीतिज्ञ का सख्त निष्कर्ष है। गणतंत्र दिवस हमें यह अवसर उपलब्ध करवाता है कि पिछले साढ़े चार वर्षों में मोदी की उपलब्धियां क्या रहीं? साथ ही यह आकलन भी किया जाना चाहिए कि पिछले सात दशकों में हमारे गणतंत्र को किन कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ा।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

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