राजनीति में बढ़ती अराजकता

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

ममता बैनर्जी अपनी नैतिक जीत के दावे के लिए कारण खोज सकती हैं, फिर भी इस मामले में नैतिकता ने अपनी चमक खोई है। जबकि मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी संविधान के अनुपालन का दावा कर रही हैं, उन्होंने एक ऐसी बुरी मिसाल स्थापित की है जिसमें प्रत्येक राज्य सरकार भ्रष्ट लोगों को बचाने का काम शुरू कर देगी। इस मामले में ममता ने न केवल केंद्र को ललकारा है, बल्कि सीबीआई जांच पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी अपमान किया है। मैं व्यक्तिगत रूप से सोचता हूं कि कोर्ट तथा केंद्र सरकार, दोनों ने इस मामले को बहुत ही सहजता से लिया तथा ममता को वह मिसाल पेश करने का मौका दिया जब कोई राज्य अपराधियों को संरक्षण देने की नीति पर उतर आता है…

जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच लड़ाई इतनी भद्दी होती जा रही है कि जो कोई भी लोकतंत्र की बात करता है, वह देश में वास्तव में अराजकता में योगदान कर रहा है। सौभाग्य की बात यह है कि यह अराजकता लोगों में अथवा जनता बनाम सरकार में नहीं है जैसा कि सामान्यतः समझा जाता है। बंगाल में हाल में जो कुछ हुआ, वह सार्वजनिक रूप से लड़ी जा रही भद्दी लड़ाई की लज्जाजनक गाथा है जब मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने उस पुलिस आयुक्त को सम्मानित करना व संरक्षण देना शुरू कर दिया जो जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। मुख्यमंत्री के साथ ही पुलिस अधिकारी भी वर्दी पहने कई दिनों तक धरने पर रहा। यह सरकार के भीतर अराजकता है तथा अद्भुत रूप से उनके बीच जो एक तथा समान संविधान के प्रति आसक्ति का दावा करते हैं। यह संघर्षरत विचारधाराओं अथवा राजनीतिक द्विभाजन का मामला नहीं है, बल्कि सीधे-सीधे स्वहित का मामला है। अंततः केंद्र सरकार कोर्ट में गई जिसने राज्य के अवरोध के बिना जांच के अधिकार को स्पष्टतः स्थापित करने के बजाय बहुत ही लुंज-पुंज आदेश दिए। कोर्ट ने बंगाल के बजाय अन्य राज्य मेघालय में जांच जारी रखने के आदेश दिए। आदेश में स्पष्ट रूप से यह बात अंतर्निहित है कि बंगाल राज्य में जांच और अधिक कठिनाइयां पैदा कर सकती है। इस आदेश में प्रत्येक पक्ष ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया तथा विवादास्पद मसला अभी भी विशेषज्ञों को परेशान कर रहा है। आश्चर्यजनक यह भी है कि इस मामले में मीडिया तथा प्रोफेशनल्स ने चुप्पी साधते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अवरोध पैदा करने वाली ताकतों को अनदेखा कर दिया। ऐसी स्थिति में जबकि 20 लाख से अधिक गरीब लोग न्याय की गुहार लगा रहे हैं, कोर्ट का स्पष्ट निर्देश होना चाहिए था तथा जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप की जनता की ओर से निंदा पर चर्चा होनी चाहिए थी।

ममता बैनर्जी अपनी नैतिक जीत के दावे के लिए कारण खोज सकती हैं, फिर भी इस मामले में नैतिकता ने अपनी चमक खोई है। जबकि मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी संविधान के अनुपालन का दावा कर रही हैं, उन्होंने एक ऐसी बुरी मिसाल स्थापित की है जिसमें प्रत्येक राज्य सरकार भ्रष्ट लोगों को बचाने का काम शुरू कर देगी। इस मामले में ममता ने न केवल केंद्र को ललकारा है, बल्कि सीबीआई जांच पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी अपमान किया है। मैं व्यक्तिगत रूप से सोचता हूं कि कोर्ट तथा केंद्र सरकार, दोनों ने इस मामले को बहुत ही सहजता से लिया तथा ममता को वह मिसाल पेश करने का मौका दिया जब कोई राज्य अपराधियों को संरक्षण देने की नीति पर उतर आता है। गृह मंत्रालय को केंद्रीय कैडर के अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए थी। यह केवल राज्य को ऐसा करने की बात कर रहा है। इस तरह की अलगाववादी प्रवृत्ति का प्रदर्शन इससे पहले दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कर चुके हैं। जब केजरीवाल ने मुख्यमंत्री का पद संभाला था तो उनका पहला अराजकतावादी कदम पांच पुलिस अधिकारियों की बर्खास्तगी की मांग लेकर वर्ष 2015 में रेल भवन के सामने धरने पर बैठना था। अंततः पांच दिनों के बाद जब लेफ्टिनेंट गवर्नर ने दो पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने की हामी भरी, तब जाकर केजरीवाल ने धरना खत्म किया। इसके बाद उन्होंने नैतिक जीत का दावा किया था। वह दोबारा उस समय धरने में संलिप्त हो गए जब उन्होंने अपने आवासीय कार्यालय में मुख्य सचिव पर हमले के मामले में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। भारत जैसे अर्द्ध संघीय संविधान में नेताओं को इस तरह के अव्यवस्था पैदा करने वाले अलगाववादी व्यवहार की छूट देने पर मेरा विचार है कि इस पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।

यह सब कुछ स्कूल जाने वाले बच्चे भी टेलिविजन स्क्रीन पर देखते हैं तथा वे इससे क्या सबक लेंगे? जबकि वैधानिक व संवैधानिक लड़ाइयां लड़ी जा सकती हैं, मेरी ज्यादा चिंता यह है कि सामाजिक व्यवस्था के लिए बहुमूल्य रखने वाली परंपराओं व सम्मान को कैसे बरकरार रखा जाए, जो कि किसी वैधानिक सत्ता के आदेश से स्थापित नहीं किए जा सकते हैं। बिना किसी सबूत के प्रधानमंत्री को चोर कहना, चाहे ऐसा कहना कानूनी हो अथवा गैर-कानूनी, उस राष्ट्र व समाज में सही मूल्य पुष्ट नहीं कर रहा है जिसमें हम अपना जीवन व संसाधन निवेशित करते हैं। कई लोग अब राष्ट्र गान अथवा राष्ट्रगीत पर खड़े होने को अनिवार्य बनाने का भी विरोध करने लगे हैं। इस तरह के मामलों में किसी कानून की जरूरत नहीं होती, बल्कि यह हमारा नैतिक चरित्र है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति हमारे में सम्मान का भाव हो। जब सुप्रीम कोर्ट आदेश देता है और प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी जंग की शुरुआत करते हैं तो यह सभी राजनेताओं व देश के नागरिकों का नैतिक फर्ज बनता है कि इसमें हम सहयोग करें।

हमें इस बात को भी समझना होगा कि जब कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले लेता है तथा अपना कार्यभार संभाल लेता है, तो वह केवल एक पार्टी का प्रतिनिधि मात्र नहीं रह जाता है। मैंने यह कभी नहीं सोचा था, न ही कल्पना की थी कि कोई मुख्यमंत्री इस तरह संविधान के प्रति सम्मान का दावा करते हुए अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ जाएगा और अराजकता में योगदान करेगा।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

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