हाईब्रिड मॉडल के राज्य खत्म करो

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

मेरा मानना है कि यह उचित समय है जब इस तरह की भ्रांतियों को एकदम खत्म करना होगा। राज्यों की व्यवस्था का जहां तक सवाल है, या तो केंद्र द्वारा शासित केंद्र शासित प्रदेश होने चाहिएं अथवा संपूर्ण अधिकारों व व्यवस्थाओं वाले संपूर्ण राज्य होने चाहिए। ऐसे मामलों में रचित किए गए हाईब्रिड प्रकार के राज्य खत्म कर देने चाहिए। कोलकाता के मामले में ममता बैनर्जी के धरने के अनुभव को देखते यह भी लगता है कि राष्ट्रीय राजधानी के क्षेत्र में पूर्ण राज्य का माडल भी फिट नहीं बैठता है…

भारत में केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री शक्तियों व अधिकारों के प्रश्न पर उप राज्यपालों से तीखी लड़ाई में मशगूल हैं। इससे संबंधित दिल्ली का मसला पहले से ही निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है तथा अब केंद्र शासित प्रदेश पांडिचेरी में भी विवाद खड़ा हो गया है। वहां की उप राज्यपाल किरण बेदी के कारण वहां के मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ गवर्नर हाउस के सामने धरने पर बैठने को विवश हो गए हैं। इस धारावाहिक का सबसे मजाकिया भाग यह है कि जब उप राज्यपाल किरण बेदी ने बाइक सवारों के लिए हेलमेट को जरूरी करने के आदेश दिए तो मुख्यमंत्री इसके खिलाफ उतर आए। दिल्ली की समस्या तथा इसी तरह की अन्य अलगाववादी स्थितियों के बाद यह समस्या उभरी है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली सरकार बेहतर प्रदर्शन के लिए स्पष्ट निर्देश उपलब्ध करवाने के लिए संवैधानिक विफलता के प्रश्न पर लगातार परेशानी में रही है। अरविंद केजरीवाल शक्तियों के प्रश्न पर उप राज्यपाल के साथ निरंतर संघर्षरत रहे हैं। उनका मानना है कि वैधानिक रूप से यह शक्तियां उनके अधिकार क्षेत्र में आती हैं, किंतु वास्तव में ये केंद्र सरकार से भी संबंधित हैं। ऐसा नहीं है कि केजरीवाल इस बात को नहीं जानते हैं कि वह एक संपूर्ण मुख्यमंत्री नहीं हैं क्योंकि उनका राज्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है। वर्ष 1991 में केंद्र शासित प्रदेश को शासित करने वाले कानून में संशोधन के अनुसार यह व्यवस्था है जिसने मूल प्रयोजन को बदला है तथा यह एक ऐसा संस्थान बना है जिसमें स्पष्ट परिभाषा का अभाव है।

दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में शासित रही है तथा इसमें कोई समस्या नहीं थी क्योंकि यह स्पष्ट था कि इस महानगर के दायित्व किसको नगर निकायों के साथ शेयर करने हैं। उस समय निर्वाचित सदस्यों का वैधानिक निकाय यहां मौजूद नहीं था। वर्ष 1991 में दिल्ली को विधानसभा उपलब्ध करवाने के लिए संविधान में संशोधन किया गया जिसके अंतर्गत यहां निर्वाचित प्रतिनिधियों व मुख्यमंत्री पद की व्यवस्था की गई। इसने पहचान को लेकर एक भ्रम पैदा कर दिया क्योंकि ऐसे राज्य पहले से अस्तित्व में थे जिनके नियंत्रण में कानून, व्यवस्था तथा जमीनी अधिकार थे, किंतु इस कानून के अंतर्गत यह शक्तियां दिल्ली को नहीं दी गई हैं। इस संशोधन के जरिए केंद्र शासित प्रदेश को दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में तबदील कर दिया गया। राज्यपाल को लेफ्टिनेंट ही रखा गया, किंतु मुख्यमंत्री को वरिष्ठ मंत्री या कुछ अन्य के रूप में तबदील नहीं किया गया। अब मुख्यमंत्री सोचते हैं कि वह अन्य राज्यों की तरह मुख्यमंत्री ही हैं। जब तक दिल्ली में तालमेल करने वाले नेता पदासीन थे, उन्होंने केंद्र में विपक्षी दल के साथ सामंजस्य बिठाया। मिसाल के तौर पर भाजपा के राज में तथा शीला दीक्षित के रूप में मुख्यमंत्री ने सामंजस्य बनाए रखा। लेकिन केजरीवाल, जो विवादों व संघर्ष की संतान माने जाते हैं, ने सोचा कि वह अपनी भूमिका व कानून को परिभाषित कर सकते हैं। इसके कारण निरंतर कहासुनी व झगड़े होते रहे हैं तथा राज्य को कानून निर्माताओं द्वारा पैदा की गई भ्रांतियों के कारण अनावश्यक रूप से नुकसान उठाना पड़ा है। अंततः दिल्ली का मसला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा जिसने हाल में फैसला भी दिया है, इसके बावजूद अभी ऐसे मसले लंबित हैं जिन पर बड़ी पीठ को विचार करना है। मुख्यमंत्री व उप राज्यपाल के मध्य विचारों में भिन्नता की स्थिति पर अगर कोर्ट यह निष्कर्ष दे दे कि उप राज्यपाल की बात मान्य होगी तो फैसला लेने के लिए बाकी कुछ नहीं बचता है तथा उप राज्यपाल अपनी आगे की भूमिका तय कर सकते हैं। किंतु समस्या यह है कि सेवाओं के प्रबंधन के विषय पर बड़ी पीठ को अभी विचार करना है। यह फैसला उस पर छोड़ दिया गया है। यह उप राज्यपाल पर छोड़ा जा सकता था, किंतु इसे बड़ी पीठ पर छोड़ दिया गया है। अब मुख्यमंत्री असंतुष्ट चल रहे हैं क्योंकि वह सोचते हैं कि अधिकारियों के तबादले की शक्ति के बिना वह शासन चलाने में सक्षम नहीं हैं। जबकि संविधान और संशोधन के प्रश्न पर आम सोच को अलग से और अनिवार्य रूप से निपटाने की जरूरत है, केंद्र शासित प्रदेशों, विशेषकर हाईब्रिड केटेगरी में, के प्रश्न का अनिवार्य उपचार करने की जरूरत है। अगर यह प्रश्न पूछा जाए कि दिल्ली क्या है तो जवाब होगा कि न तो केंद्र शासित प्रदेश और न ही राज्य। यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है।

इसे कम जाना व समझा जाता है। यह अद्भुत है कि इसका एक मुख्यमंत्री है जो संपूर्ण मुख्यमंत्री नहीं है तथा यह एक राज्य है जो पूर्णतः एक राज्य नहीं है। मेरा मानना है कि यह उचित समय है जब इस तरह की भ्रांतियों को एकदम खत्म करना होगा। राज्यों की व्यवस्था का जहां तक सवाल है, या तो केंद्र द्वारा शासित केंद्र शासित प्रदेश होने चाहिएं अथवा संपूर्ण अधिकारों व व्यवस्थाओं वाले संपूर्ण राज्य होने चाहिए। ऐसे मामलों में रचित किए गए हाईब्रिड प्रकार के राज्य खत्म कर देने चाहिए। कोलकाता के मामले में ममता बैनर्जी के धरने के अनुभव को देखते यह भी लगता है कि राष्ट्रीय राजधानी के क्षेत्र में पूर्ण राज्य का माडल भी फिट नहीं बैठता है। यह स्पष्ट है कि राजधानी में संपूर्ण राज्य माडल उपयोगी नहीं है।

यहां पर नगर निकायों को मजबूत किया जाना चाहिए तथा अन्य देशों की तरह जैसा कि प्रचलित है, मेयर की भूमिका को केंद्रीय स्थिति में रखना होगा। वास्तव में मैंने प्रधानमंत्री को दी गई एक रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि नगर प्रबंधन को पूर्णतः स्ट्रीम लाइन करने की जरूरत है। ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि बहुत अधिक एजेंसियां बिना स्पष्ट जवाबदेही के नगरों के प्रबंधन की अपेक्षा कर रही हैं। हमारे शहरों अथवा नगर राज्यों के प्रबंधन के लिए नगरों का नया प्रबंधन प्रभावशाली व सहज मशीनरी के सृजन के लिए कैबिनेट से और ज्यादा ध्यान की अपेक्षा करता है।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

You might also like