उत्कृष्ट प्रदर्शन की नींव बचपन

भूपिंदर सिंह

राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक

इस सबका कारण है हमारे देश में स्कूली स्तर पर आठ से 12 वर्ष के बच्चों के लिए कोई भी ऐसा कार्यक्रम नहीं है, जिससे स्पीड जैसी महत्त्वपूर्ण शारीरिक क्षमता का सही ढंग से विकास हो सके। हमारे देश में प्राथमिक स्कूलों के अच्छे घास के मैदानों का अभाव है। स्पीड जैसी शारीरिक क्षमता पर काम करने के लिए अच्छे नरम घास के मैदान चाहिए, जिस पर बच्चा तेजी से दौड़ सके। इस सबके लिए शारीरिक विज्ञान में उच्च शिक्षित शिक्षक भी प्रारंभिक विद्यालयों में अनिवार्य रूप से नियुक्त हों। गांव स्तर पर पंचायत का भी अपना खेल मैदान हो, जिस पर स्थानीय बच्चे स्कूल से आकर शाम को थोड़ी-बहुत उछल-कूद कर सकें…

आज विश्व स्तर पर अमरीका-यूरोप सहित दुनिया के विकसित देशों ने खेल क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। विभिन्न स्पर्धाओं के विश्व कीर्तिमान अब लगभग अपने चरम पर हैं। इस सबके पीछे उन्नत देशों की प्रौद्योगिकी तथा चिकित्सा विज्ञान का बहुत बड़ा योगदान है। उच्च तकनीकी से बने खेल उपकरण व आधुनिक प्ले फील्ड के साथ-साथ मानव के वृद्धि व विकास के नियमों का पूर्ण पालन करके खेलों में भौतिकी विज्ञान के नियमों का समावेश कर आज का प्रशिक्षण कार्यक्रम तय किया जाता है।

विश्व में किसी भी स्तर के विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए शिक्षा नियमों में बच्चे के वृद्धि व विकास को ध्यान में रखकर ही कोई भी कार्यक्रम बनाया जाता है। उठने-चलने के संतुलन के साथ-साथ दौड़ने, कूदने व फेंकने की एक तय उम्र सीमा होती है। इसके बाद जब बच्चा छह व आठ वर्ष के बीच में होता है, तो खेल में अग्रणी देशों में उसे खेल से अवगत करा दिया जाता है। साइना नेहवाल आठ वर्ष की उम्र में ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीतने के काबिल होती है। इसी तरह के उदाहरण खेल की दुनिया में आम देखे जा सकते हैं। जहां विश्व स्तर पर भारत का खेलों में पिछड़ापन अभी तक कायम है, उसी तरह भारत में हमारे राज्य हिमाचल का भी कई खेलों में स्तर अभी बहुत नीचे है। वैसे तो राज्य में अच्छे प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण, राज्य खेल विभाग तथा राज्य शिक्षा विभाग के खेल छात्रावास कई खेलों में पिछले कई दशकों से प्रशिक्षण दे रहे हैं, मगर अभी तक हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी उत्कृष्ट प्रदर्शन लगातार नहीं कर पाया है। इस सबके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि छह से 12 वर्ष के बीच में किसी भी प्रकार की ट्रेनिंग नहीं है, जो बच्चे की मोटर क्वालिटी को विकसित करती है। भारतवर्ष के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पीड के कारण हर खेल व स्पर्धा से पिछड़ते नजर आते हैं।

इस सबका कारण है हमारे देश में स्कूली स्तर पर आठ से 12 वर्ष के बच्चों के लिए कोई भी ऐसा कार्यक्रम नहीं है, जिससे स्पीड जैसी महत्त्वपूर्ण शारीरिक क्षमता का सही ढंग से विकास हो सके। हमारे देश में प्राथमिक स्कूलों के अच्छे घास के मैदानों का अभाव है। स्पीड जैसी शारीरिक क्षमता पर काम करने के लिए अच्छे नरम घास के मैदान चाहिए, जिस पर बच्चा तेजी से दौड़ सके। इस सबके लिए शारीरिक विज्ञान में उच्च शिक्षित शिक्षक भी प्रारंभिक विद्यालयों में अनिवार्य रूप से नियुक्त हों। गांव स्तर पर पंचायत का भी अपना खेल मैदान हो, जिस पर स्थानीय बच्चे स्कूल से आकर शाम को थोड़ी-बहुत उछल-कूद कर सकें, क्योंकि आज लगभग आधी आबादी निजी स्कूलों में पढ़ रही है और नब्बे प्रतिशत से अधिक निजी स्कूलों में खेल मैदान के नाम पर केवल पक्का फर्श ही है। स्कूल में जब खेलने-कूदने के लिए स्थान ही नहीं होगा, तो फिर बच्चे कहां पर अपना फिटनेस कार्यक्रम पूरा करेंगे। यही कारण है कि आज स्कूल के पास विद्यार्थियों की सामान्य फिटनेस के लिए मोटर क्वालिटी सुधारने का कोई भी कार्यक्रम नहीं है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तो दूर की बात है, स्कूल देश को फिट नागरिक भी नहीं दे पा रहे हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि प्रारंभ से ही स्कूली स्तर पर बच्चे की सामान्य फिटनेस का कोई न कोई कार्यक्रम कम से कम आधे से एक घंटे तक का होना चाहिए। स्कूली स्तर पर हर विद्यार्थी का फिटनेस डाटा तैयार होना चाहिए, जो देश के निन्यानवे प्रतिशत स्कूलों में तैयार नहीं किया जाता है।

हर विद्यार्थी का शिक्षण रिपोर्ट कार्ड की तरह उसका फिटनेस रिपोर्ट कार्ड हो, उसके फिटनेस टेस्ट वर्ष में कम से कम तीन बार अनिवार्य रूप से होने चाहिएं। इन टेस्टों का विशेषज्ञ प्रशिक्षक से निरीक्षण करवाना चाहिए, ताकि जहां देश को फिट नागरिक मिल सकें, वहीं पर उनमें से कुछ एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी आसानी से मिल जाएंगे। कहते हैं जब हजारों घोड़े दौड़ते हैं, तो उनमें रेस के घोड़े पारखी आंखों को नजर आ ही जाते हैं। जब देश के लाखों स्कूलों में प्राथमिक स्तर से ही सामान्य फिटनेस की मोटर क्वालिटी पर काम शुरू हो जाएगा, तो देश को उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कई खिलाड़ी स्वयं ही मिल जाएंगे।

आज अभिभावकों को सचेत मन व खुली आंखों से यह सुनिश्चित करना होगा कि स्कूल तथा वे स्वयं अपने बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में कितने जागरूक हैं। शिक्षा का अर्थ ही जब शरीर व मन दोनों का संपूर्ण विकास है तो फिर शरीर जो लगभग सौ वर्षों तक चलने के लिए दिया है, उसके लिए क्या कार्यक्रम हैं, यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है। बच्चे कल के नागरिक हैं और उनके मन व शरीर का संपूर्ण विकास स्कूल व अभिभावक दोनों की समान रूप से जिम्मेदारी है।

हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।

-संपादक

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