कीचड़ से सना मोदी का विरोध

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

इसी लेट-लतीफी के कारण गोवा कांग्रेस के हाथ से निकल गया। उत्तरप्रदेश में महागठबंधन नहीं होना कांग्रेस के लिए चिंताजनक है क्योंकि सपा-बसपा ने गठजोड़ करते हुए उसे इससे बाहर ही रखा। उधर कर्नाटक में जद (एस) से ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद वह मुख्यमंत्री पद हासिल करने में नाकाम रही। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है कि देश में एक शक्तिशाली व रचनात्मक विपक्ष होना चाहिए, अन्यथा कुलीनतंत्र का राज स्थापित हो जाएगा। इसके लिए एक शक्तिशाली विचारधारा पर आधारित तथा तार्किक विपक्ष की जरूरत है। मोदी चोर है, यह नारा देकर एक कमजोर विपक्ष इस तरह की निर्णायक भूमिका निभाने में सफल नहीं हो सकता है। वास्तव में आजकल विपक्ष का अस्तित्व इस तरह के अतार्किक नारे पर ही टिका है…

अब हम सुन रहे हैं कि मायावती, ममता बैनर्जी और प्रियंका गांधी, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर देने में सक्षम मानी जा रही थीं, की त्रिमूर्ति चुनाव की दौड़ में नहीं है। भारत के सामान्यतः अशांत क्षेत्र के आकाश में चुनाव मंडरा रहे हैं, किंतु इस बार राजनीतिक विश्लेषक  राजनीतिक नेताओं की अपने मोदी हटाओ संबंधी साझा अभियान के प्रति अजीब प्रतिक्रिया से असमंजस में  हैं। कभी भारत में राजनीतिक दलों की स्पष्ट विचारधाराएं हुआ करती थीं जिनका वे अनुसरण करते थे तथा वे अपने सिद्धांतों के लिए लड़ते भी थे। इंदिरा गांधी ने भी जोर देकर कहा कि वह गरीबी को हटाना चाहती हैं, किंतु अन्यों को इसे करने की बात कहकर उपहास का पात्र बनीं। मिसाल के तौर पर कम्युनिस्टों तथा वाम दलों को लेते हैं। इन दलों के स्पष्ट लक्ष्य थे जिसे श्रमिकों की तानाशाही कहा जाता है। कांग्रेस ने इस मामले में मध्य मार्ग का प्रतिनिधित्व किया तथा सार्वजनिक क्षेत्र व नियोजित आर्थिकी के समाजवाद का अनुसरण किया। दक्षिणपंथियों का लक्ष्य स्वतंत्र व्यापार का अनुसरण था तथा भाजपा इसमें भारतीय देशभक्ति ले आई। किंतु दलों का मिशन मोदी हटाओ कैसे हो सकता है।

यह न केवल विचारधारा की अनुपस्थिति को दर्शाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किसी भी कीमत पर सत्ता हथियाने के लिए गंभीर और प्रतिबद्ध चिंता की होड़ लगी हुई है। किंतु राजनीति शक्ति का खेल है तथा राजनीतिक शक्ति हथियाने के उनके लक्ष्य में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि शक्ति का खेल कुछ सिद्धांतों व विचारधाराओं पर आधारित होता है, इसलिए राजनीति का मुख्य लक्ष्य मात्र सत्ता हथियाना कभी नहीं हो सकता। किंतु अब कुछ और नहीं है, सिवाय इसके कि दौलत और सत्ता को सुरक्षित किया जाए। कोई इसे विकास के लिए संसाधन उपलब्ध करवाने का माध्यम मान सकता है, किंतु अब यह अपने आप में एक साध्य बन गया है, संभवतः अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए। भारत की केंद्रीय राजनीति में मोदी के उभार से पहले हुए शृंखलाबद्ध घोटालों से यह साफ जाहिर है तथा शायद मूल उद्देश्य बदलावकारी अभिकर्ता में परिवर्तित हो गया है। आजकल बहुधा पूछा जाने वाला प्रश्न यह है कि आजादी से पहले राजनेता क्यों ईमानदार थे तथा स्वतंत्रता के आदर्श के प्रति वे इतने प्रतिबद्ध क्यों थे।

यह भी बहुधा पूछा जाता है कि अब राजनेता आदर्शों की परवाह क्यों नहीं करते हैं। जवाब स्पष्ट है कि आजादी मिलने के बाद ये राजनीतिक दल दौलत बनाने के धंधे में संलग्न हो गए, मतदाताओं को रिश्वत देने लगे तथा भौतिक सत्ता का आनंद लेने में मशगूल हो गए। वे देश से गरीबी हटाने तथा तुलनात्मक आर्थिक परिदृश्य में राष्ट्र के विकास संबंधी लक्ष्य से दूर हो गए तथा त्याग की कोई भावना भी अब नहीं रही। कोई भी यह नहीं जानता कि कांग्रेस निर्णय निर्माण में हीला-हवाला की शिकार क्यों हो गई है। अरविंद केजरीवाल के अकुशल प्रशासन में दिल्ली लंबे समय से झुलस रही है और उधर कांग्रेस उससे गठजोड़ की सोच रही है। उधर हिमाचल में कांग्रेस अभी तक अपने उम्मीदवार घोषित नहीं कर पाई है तथा वह उन सुखराम के इंतजार में है जिन पर पूर्व में सीबीआई छापा पड़ा था तथा उनके बिस्तर से करोड़ों की राशि भी बरामद की गई थी। बाद में सुखराम, जो कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, ने अपनी पार्टी भी बनाई, फिर कांग्रेस में शामिल हुए, बाद में भाजपा में आने के लिए कांग्रेस छोड़ दी और अब जब भाजपा ने उनके पौत्र को टिकट नहीं दिया तो फिर से कांग्रेस पार्टी, जो उनका पुराना घर है, में लौट आए हैं। राहुल का मीडिया में सुखराम व उनके परिवार के साथ एक चित्र रिलीज हुआ है जिसमें ऐसा लग रहा है जैसे उन्हें कोई चांदी का बड़ा टुकड़ा मिल गया है। किंतु अभी भी टिकट पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। कांग्रेस की स्थिति अन्य राज्यों में भी लगभग ऐसी ही है। कांग्रेस इंतजार पर इंतजार कर रही है, उधर मोदी की उपलब्धि यह है कि उन्होंने अपने सहयोगियों से गठबंधन कर लिए हैं तथा चुनाव प्रचार अभियान का कुशल आगाज भी हो गया है। राजनीतिक गठबंधन बनाने तथा त्वरित निर्णय लेने के लिहाज से तेजी से बदलती स्थितियों में मन बनाने में विपक्ष जो लेट-लतीफी दर्शा रहा है, उससे चुनाव प्रचार में मोदी विपक्ष से कहीं आगे लग रहे हैं। प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश में उतारने में भी देरी की गई।

इसी लेट-लतीफी के कारण गोवा कांग्रेस के हाथ से निकल गया। उत्तरप्रदेश में महागठबंधन नहीं होना कांग्रेस के लिए चिंताजनक है क्योंकि सपा-बसपा ने गठजोड़ करते हुए उसे इससे बाहर ही रखा। उधर कर्नाटक में जद (एस) से ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद वह मुख्यमंत्री पद हासिल करने में नाकाम रही। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है कि देश में एक शक्तिशाली व रचनात्मक विपक्ष होना चाहिए, अन्यथा कुलीनतंत्र का राज स्थापित हो जाएगा। इसके लिए एक शक्तिशाली विचारधारा पर आधारित तथा तार्किक विपक्ष की जरूरत है। मोदी चोर है, यह नारा देकर एक कमजोर विपक्ष इस तरह की निर्णायक भूमिका निभाने में सफल नहीं हो सकता है। वास्तव में आजकल विपक्ष का अस्तित्व इस तरह के अतार्किक नारे पर ही टिका है।

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