छोटे राज्यों की वैयक्तिक राजनीति

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

राज्य को कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में काम करने के लिए एक्शन प्लान बनाने की जरूरत है। मिसाल के तौर पर नंबर-1. पर्यावरण संरक्षण, 2. ईको फ्रेंडली इंडस्ट्री, 3. पर्यटन, 4. जॉब्स उपलब्ध करवाने के लिए स्माल स्केल के इंटरप्राइज का विकास, 5. उद्योग की ओवर रेगुलेटिंग व राजनीतिकरण को घटाना। अच्छे उद्योग प्राप्त करने के लिए यह जरूरी है (उत्तराखंड में उद्योग का राजनीतिकरण नहीं है)। छोटे राज्यों को केंद्र में अपनी प्रभावशीलता के मामले में हानि होती है, किंतु इस कमी को संसद में सही सदस्यों का चुनाव करके दूर किया जा सकता है। ऐसा करने से इन राज्यों को ज्यादा से ज्यादा फंड केंद्र से मिलेगा तथा विकास भी सुनिश्चित हो पाएगा…

भारत एक बड़ा देश है। इसके उत्तर प्रदेश जैसे एक ही राज्य का आकार इंग्लैंड से भी बड़ा है। ऐसे बड़े राज्यों के अलावा भारत में हिमाचल, उत्तराखंड, झारखंड, गोवा व पुड्डूचेरी जैसे छोटे राज्य भी हैं। जितना कोई अध्ययन करता है, वह उतना ही पाता है कि लंबे समय तक कुछ महत्त्वपूर्ण लोगों का यहां प्रभाव अथवा शिकंजा रहा है। हिमाचल के पास मूलतः यशवंत सिंह परमार एक नेता के रूप में थे जिन्होंने राज्य के निर्माण के बाद इसे रूपाकार देने में भूमिका निभाई। जबकि बड़े राज्यों में दल प्रभावकारी शक्ति के रूप में हैं, छोटे राज्यों में मामला किचन कैबिनेट की तरह पारिवारिक है। यशवंत सिंह परमार के बाद जो भी नेता आए, उन्होंने राज्य की कार्यप्रणाली पर अपना प्रभुत्व जमाए रखा। पिछले समय में वीरभद्र सिंह एक ऐसे नेता के रूप में उभरे जो न केवल छह बार राज्य के मुख्यमंत्री बने, बल्कि हकीकत में राज्य के लिए ‘फादर फिगर’ भी रहे। सुखराम के रूप में उनका शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी रहा, लेकिन दोनों में अंतर था। पहला, सुखराम राज्य से बाहर चले गए जब उन्होंने केंद्रीय कैबिनेट को ज्वाइन किया।

इसके बाद जब वह भ्रष्टाचार के मामले में संलिप्त पाए गए तो उन्हें धक्का लगा। उन्हें बड़ी क्षति तब हुई जब सीबीआई द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद भ्रष्टाचार के केस में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इससे उनकी ख्याति तथा प्रभाव को क्षति पहुंची। यह अद्भुत है कि छोटे राज्यों में नेताओं को ज्यादा सुरक्षा व संरक्षण मिल जाता है क्योंकि लोगों के नजदीकी संबंध होते हैं तथा ख्याति को इस तरह की क्षति को आसानी से पूरित कर लिया जाता है। आज जबकि राज्य में कांग्रेस सत्ता से बाहर है तथा भाजपा राज कर रही है, हिमाचल पर वीरभद्र सिंह का प्रभाव आज भी कायम है। वास्तव में शांता कुमार ने कांग्रेस राज के निरंतर प्रभुत्व को तोड़ते हुए उन्हें हराया था तथा भाजपा को ‘लाइम लाइट’ में लाते हुए सत्ता तक पहुंचाया था। अपनी पार्टी में ही वह कुटलैहड़ के रणजीत सिंह को एक मत से हराकर जीते थे। ये शख्सियतें राज्य पर राज करती रहीं तथा उनका सिक्का तब तक चलता रहा जब तक वे सत्ता में रहे। हिमाचल की राजनीति पर आज भी वीरभद्र सिंह, सुखराम, शांता कुमार व प्रेम कुमार धूमल का प्रभाव देखा जा सकता है। उधर गोवा को छोड़कर कोई अन्य राज्य नहीं है जहां की राजनीति पर खास व्यक्तित्व का प्रभाव शक्तिशाली रूप से देखा जा सकता था। यह एक छोटा राज्य है जहां से मात्र दो सांसद चुन कर आते हैं। इस राज्य में मनोहर पार्रिकर का कोई विकल्प नहीं था तथा वे ऐसे नेता थे जिन्हें सभी स्वीकार करते थे, यहां तक कि विपक्ष भी उन्हें स्वीकार करता था। उन्हें केंद्र में रक्षा मंत्री के रूप में इस्तीफा देना पड़ा और वह इस छोटे राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। लोग उन्हें प्यार करते थे तथा उन्होंने यह प्रमाणित किया कि ईमानदार रहकर भी सफल राजनेता बना जा सकता है। एक मुख्यमंत्री की यह छाप थी तथा अन्य जगह भी ऐसा देखा गया जहां मुख्यमंत्रियों ने विशुद्ध योग्यता दिखाई। मिसाल के तौर पर हिमाचल में यशवंत सिंह परमार को आज भी याद किया जाता है क्योंकि वह हकीकत में राज्य के धर्म पिता थे।  व्यक्तित्व का ऐसा प्रभाव है कि उसे उत्तराखंड व हिमाचल के नेतृत्व में देखा जा सकता है। रेलवे स्टेशन पर लोगों ने मुझसे पूछा कि हिमाचल में ब्रॉड गेज की एक ही रेल क्यों है, जबकि उत्तराखंड में आधा दर्जन से अधिक हैं। एयरपोर्ट एयर बस को क्यों हैंडल नहीं कर रहे हैं या हिमाचल के पास प्रतिरक्षा प्रशिक्षण में आईएनडीए जैसे राष्ट्रीय संस्थान क्यों नहीं हैं अथवा वन अनुसंधान व केंद्रीय विश्वविद्यालय क्यों नहीं हैं? इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं है। इसके अलावा जब मैं देखता हूं कि उच्च अध्ययन संस्थान वह नहीं कर पा रहा है जिसकी राज्य को जरूरत है तो ऐसी स्थिति में क्या वह राष्ट्रीय पहचान का दावा कर सकता है? क्यों नहीं अंतरराष्ट्रीय पहचान वाले विश्वविद्यालय की स्थापना हो पाई?

उत्तराखंड के पास बिना कोई तेल होते हुए तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग का पूरा सेटअप है। इसके पास विश्व स्तर का पेट्रोलियम संस्थान व मैनेजमेंट कालेज है। सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर इस राज्य के अधिकारियों का कब्जा है। हिमाचल व उत्तराखंड के लिए एक ही समय में केंद्रीय विश्वविद्यालय मंजूर हुए। उत्तराखंड में यह संस्थान छह वर्षों से कार्य कर रहा है, जबकि हिमाचल में इसे अभी अपना रूपाकार बनाना है। ऐसी स्थिति में हिमाचल का मुख्यमंत्री कैसे प्रभावशाली हो सकता है? ये वे अंतर हैं जो राज्य के आकार पर निर्भर नहीं करते, बल्कि इस बात पर निर्भर करते हैं कि राज्य का नेतृत्व विविध मसलों को किस प्रकार लेता है तथा उनका निपटारा कैसे करता है। राज्य को अपने सभी संसाधनों का प्रयोग करना चाहिए। इसके पास अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र के बड़े अधिकारी हैं, किंतु यह राजनेताओं का प्रयोग करता है। राज्य में बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए इसे योग्य लोगों को प्राथमिकता देनी चाहिए। राज्य को कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में काम करने के लिए एक्शन प्लान बनाने की जरूरत है। मिसाल के तौर पर नंबर-1. पर्यावरण संरक्षण, 2. ईको फ्रेंडली इंडस्ट्री, 3. पर्यटन, 4. जॉब्स उपलब्ध करवाने के लिए स्माल स्केल के इंटरप्राइज का विकास, 5. उद्योग की ओवर रेगुलेटिंग व राजनीतिकरण को घटाना।

अच्छे उद्योग प्राप्त करने के लिए यह जरूरी है (उत्तराखंड में उद्योग का राजनीतिकरण नहीं है)। छोटे राज्यों को केंद्र में अपनी प्रभावशीलता के मामले में हानि होती है, किंतु इस कमी को संसद में सही सदस्यों का चुनाव करके दूर किया जा सकता है। ऐसा करने से इन राज्यों को ज्यादा से ज्यादा फंड केंद्र से मिलेगा तथा विकास भी सुनिश्चित हो पाएगा। हिमाचल में जल्द ही लोकसभा के लिए मतदान होने वाला है तथा यहां मात्र चार सीटें हैं। मुझे इस बात का आश्चर्य है कि दलों ने ऐसे नेताओं को क्यों नहीं तैयार किया जो केंद्र में राज्य के हितों की प्रभावशाली ढंग से पैरवी कर सकें।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

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