जीएसटी पर पुनर्विचार करें

Apr 16th, 2019 12:08 am

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था की कुशलता का लाभ नहीं मिल रहा है। जीएसटी लागू होने के कारण साइकिल की उत्पादन लागत कम हुई है, लेकिन आम आदमी के पास साइकिल खरीदने के लिए क्रय शक्ति ही नहीं रही है। यह ऐसे हुआ कि आम आदमी के सामने 56 भोग परोसकर उसके हाथ पीछे बांध दिए जाएं। इस प्रकार जीएसटी का कुल प्रभाव आम आदमी और अर्थव्यवस्था दोनों पर नकारात्मक हुआ है और मूल रूप से जीएसटी पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। चुनाव बाद सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह प्रमुख आर्थिक चुनौती होगी…

जीएसटी लागू करने को भाजपा और कांग्रेस पार्टियां एकमत रही हैं। इस व्यवस्था को कैसे लागू किया जाए, मात्र इसमें विवाद है। जीएसटी का आम आदमी के ऊपर दो प्रकार से प्रभाव पड़ता है। जीएसटी का सीधा प्रभाव यह होता है कि तमाम टैक्स की दरों को चुनिंदा तीन या चार टैक्स दरों में परिवर्तित कर दिया गया है। इससे व्यापार करना आसान हो गया है। सभी राज्यों में एक दर से जीएसटी लगने से राज्यों के बीच व्यापार सुलभ हो गया है। विचार यह था कि जीएसटी से व्यापार करना आसान हो जाएगा, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलेगी और रोजगार उत्पन्न होंगे। यह जीएसटी का अप्रत्यक्ष सुप्रभाव हुआ। दूसरी तरफ जीएसटी का आम आदमी पर सीधे नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अब तक हम टैक्स पालिसी को जनकल्याण के एक अस्त्र के रूप में देखते थे। आम आदमी द्वारा खपत की गई वस्तुएं, जैसे बाइसाइकिल एवं सस्ते जूतों पर टैक्स की दर कम लगाई जाती थी और अमीर द्वारा खपत की जा रही वस्तुओं जैसे एयर कंडीशनर और मर्सिडीज कार पर टैक्स की दर अधिक लगाई जाती थी। जीएसटी के अंतर्गत इन दरों को एकल दिशा में ले जाया जा रहा है।

वर्तमान में 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत एवं 28 प्रतिशत की तीन दरें हैं, लेकिन सरकार की मंशा है कि इन्हें भी एक ही दर पर ले जाए। बाइसाइकिल पर यदि पूर्व में पांच प्रतिशत टैक्स था, तो वह अब 18 प्रतिशत हो जाएगा और मर्सिडीज कार पर यदि 28 प्रतिशत टैक्स था, तो वह भी 18 प्रतिशत हो जाएगा। इस प्रकार आम आदमी द्वारा खपत किए जाने वाले माल पर टैक्स की दरें आमतौर पर बढ़ी हैं। इस कारण जीएसटी का आम आदमी पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। न्यूजीलैंड सरकार  द्वारा किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि भिन्न दरों से गरीबों पर टैक्स का भार कम होता है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर जेम्स मिर्लीस द्वारा किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि एकल दर से गरीब पर टैक्स का भार बढ़ता है। आस्ट्रेलिया की शेरिदन कालेज द्वारा बोस्तवाना के लिए किए गए एक अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि की गई है। जीएसटी का एक और तरह से नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। राज्यों के बीच व्यापार करना आसान हो गया है। बड़ी कंपनियों द्वारा इसका विशेषकर लाभ उठाया जा रहा है। इस कारण छोटे उद्योगों की परेशानी बढ़ी है। पहले राज्यों की सरहद के कारण उन्हें दूर स्थापित बड़ी कंपनियों से एक प्राकृतिक संरक्षण मिलता था, जो अब समाप्त हो गया है। इस कारण जीएसटी का छोटे उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। छोटे उद्योगों के मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2011-12 में हमारे देश की आय में छोटे उद्योगों का हिस्सा 29.6 प्रतिशत था, जो 2016 में घटकर 28.8 प्रतिशत रह गया था। इन्हीं छोटे उद्योगों द्वारा अधिकतर रोजगार बनाए जाते हैं। छोटे उद्योगों के मंत्रालय के अनुसार छोटे उद्योगों द्वारा 11.2 करोड़ रोजगार बनाए गए हैं, जबकि वित्त मंत्रालय के अनुसार बड़े निजी क्षेत्रों के उद्योगों में केवल 1.2 करोड़ रोजगार बनाए गए हैं। छोटे उद्योगों के दबाव में आने से कुल रोजगार का हनन हुआ है, जिससे आम आदमी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जीएसटी के ये नकारात्मक प्रभाव पूरे विश्व में पाए गए हैं। आस्ट्रेलिया की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि छोटे उद्योगों द्वारा अपनी कुल आय का तीन प्रतिशत हिस्सा जीएसटी के अनुपालन में खर्च किया जा रहा है। उद्योगों को सामान्यतः बिक्री का 15 प्रतिशत लाभ होता है, इसमें तीन प्रतिशत की गिरावट आई है। आस्ट्रेलिया के छह में से पांच छोटे उद्योगों को जीएसटी से नुकसान हुआ है। न्यूजीलैंड की विलिंग्टन यूनिवर्सिटी ने पाया कि बड़े उद्यमियों की तुलना में छोटे उद्यमी जीएसटी अधिक अदा करते हैं। जीएसटी के अनुपालन के लिए कम्प्यूटर और साफ्टवेयर खरीदना पड़ता है। छोटा उद्यमी एक लाख का कम्प्यूटर खरीद कर साल में दस लाख का माल बेचता है। बड़ा उद्यमी उसी एक लाख का कम्प्यूटर खरीदकर दस करोड़ का माल बेचता है। मलेशिया की मोनाश यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में पाया गया है कि मलेशिया के छोटे उद्यमों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ गया है। वे बंद होने की चिंता से जूझ रहे हैं। अब हम जीएसटी के आम आदमी पर समग्र विकास का आकलन कर सकते हैं। जीएसटी के अंतर्गत सभी माल पर समान दर से टैक्स वसूलने से आम आदमी पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। साथ-साथ आम आदमी के लिए रोजगार बनाने वाले छोटे उद्योग दबाव में आते हैं, जिससे पुनः उसकी आय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

साथ-साथ यह भी सही है कि जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था में कुशलता स्थापित होती है और विकास दर बढ़ती है। विकास दर के बढ़ने से रोजगार में वृद्धि होनी चाहिए, लेकिन यह कौतूहल का विषय है कि जीएसटी का यह सार्थक प्रभाव क्यों नहीं पड़ता दिख रहा है? जीएसटी के लागू होने से आम आदमी पर नकारात्मक प्रभाव क्यों पड़ रहा है। इस पहेली का उत्तर यह है कि जीएसटी के कारण आम आदमी पर टैक्स का बोझ बढ़ता है और छोटे उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने से उसके रोजगार का हनन होता है। इन कारणों से बाजार में मांग कम होती है। आम आदमी को साइकिल पर पांच प्रतिशत की जगह यदि 18 प्रतिशत देना पड़े, तो उसकी साइकिल खरीदने की क्षमता कम होती है। तदानुसार साइकिल बनाने वाली फैक्टरी का माल कठिनाई से बिकता है। इसलिए जीएसटी से बाजार में कुल मांग कम हो रही है। मांग के कम होने से निवेश कम हो रहा है। आर्थिक विकास के लिए मांग और निवेश का जो सुचक्र जरूरी है, वह सुचक्र टूट रहा है। पहले मांग उत्पन्न होती है और फिर उस मांग की पूर्ति के लिए निवेश होता है।

 मांग ही कम उत्पन्न होने से यह सुचक्र टूट रहा है, जिसके कारण हमारी विकास दर भी गिरी है और आम आदमी की कठिनाई भी बढ़ी है। जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था की कुशलता का लाभ नहीं मिल रहा है। जीएसटी लागू होने के कारण साइकिल की उत्पादन लागत कम हुई है, लेकिन आम आदमी के पास साइकिल खरीदने के लिए क्रय शक्ति ही नहीं रही है। यह ऐसे हुआ कि आम आदमी के सामने 56 भोग परोसकर उसके हाथ पीछे बांध दिए जाएं। इस प्रकार जीएसटी का कुल प्रभाव आम आदमी और अर्थव्यवस्था दोनों पर नकारात्मक हुआ है और मूल रूप से जीएसटी पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। चुनाव बाद सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह प्रमुख आर्थिक चुनौती होगी।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

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