असली चुनौती अर्थव्यवस्था

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

अमरीका के दबाव में हमने ईरान के तेल मंत्री तक को टरका दिया। छप्पन इंच की छाती के बावजूद अब हम तेल महंगा भी ले रहे हैं और उसका भुगतान भी विदेशी मुद्रा में हो रहा है। यह ज्यादा आश्चर्य की बात नहीं है कि देश के सिर पर मंडरा रहे इस भयावह खतरे के बावजूद हम गाल बजा रहे हैं, नाच रहे हैं और हमारी उत्सुक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार में कौन शामिल होगा, एनडीए के सहयोगी दलों को कौन से मंत्रालय मिलेंगे और सहयोगी दलों में से किसकी सुनवाई ज्यादा होगी। हम वे कबूतर हैं, जिसने बिल्ली को न देखने के लिए रेत में मुंह छिपाकर आंखें बंद कर ली हैं। माहौल में चुप्पी है, तो इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि शपथ लेने से भी पहले मोदी चुनावी मोड में आ गए हैं…

मेरे जैसे कई विश्लेषकों को झुठलाते हुए मोदी ने शानदार वापसी की है और शीघ्र ही हम देश के नए केंद्रीय मंत्रिमंडल का स्वरूप देख सकेंगे, लेकिन मोदी की यह जीत सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि नोटबंदी के समय प्रधानमंत्री मोदी ने 50 दिन का समय मांगा था, पर पचास दिन तो क्या, वह आज तक भी नोटबंदी के लाभ सिद्ध नहीं कर पाए हैं। नोटबंदी को लेकर होने वाली तकलीफों से परेशान न होने वाले लोगों का मुख्य वर्ग उन वंचितों का है, जिन्हें यह लगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने बेईमान अमीरों पर चोट की है। वंचितों का यह वर्ग स्वाभाविक रूप से अमीरों के खिलाफ है और अमीरों पर की गई चोट की खुशी में वह अपना दुख, अपनी तकलीफ भूल गया। इस वर्ग के पास न पहले ज्यादा धन था और न अब है, पर उसे इसी बात की खुशी है कि अमीरों पर कार्रवाई हुई। यह एक मनोवैज्ञानिक कारण है, जिसका सच्चाई से दूर-दूर का भी रिश्ता नहीं है। तैयारी के बिना जीएसटी लागू करना दुखदायक था, लेकिन यहां भी वही मानसिकता मोदी के पक्ष में गई। हर नौकरीपेशा व्यक्ति यह मानता है कि व्यवसायी वर्ग टैक्स चोर है और जीएसटी के माध्यम से टैक्स चोरी पर रोक लगी है। जहां गरीब लोग ही नहीं, नौकरीपेशा लोग भी अमीरों, कारखानेदारों, व्यवसायियों और उद्यमियों को टैक्स चोर मानते हैं। इसलिए उन्हें यह मानसिक संतुष्टि थी कि किसी ने व्यवसायी वर्ग की नस को दबाने की हिम्मत की। नोटबंदी और जीएसटी से देश की अर्थव्यवस्था को कैसा नुकसान पहुंचा, इस पर इन लोगों ने विश्वास ही नहीं किया।

भापजा के विरुद्ध जो थोड़ा-बहुत विरोध था, बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक ने उसे भी धो डाला। मोदी के मौजूदा कार्यकाल में नोटबंदी पर कोई सवाल नहीं उठेगा, जीएसटी पर भी कोई बहस नहीं होगी। एनडीए के सहयोगी दलों में से भी किसी की मुंह खोलने की हिम्मत नहीं होगी, यहां तक कि शिवसेना भी अब संभल-संभल कर बोलेगी और मोदी के पिछले कार्यकाल की तरह सत्ता में भागीदार रहते हुए भी विपक्ष की भूमिका नहीं निभाएगी। संसद, भाजपा, संघ में कोई मोदी के खिलाफ बोलने वाला नहीं होगा। राज्यसभा की चुनौती भी अब मोदी के लिए ज्यादा बड़ी नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में उनकी पार्टी से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन हो, इसका फैसला भी प्रधानमंत्री के हाथ में होता है, इसलिए राष्ट्रपति का अपना अलग अस्तित्व नहीं है। चुनाव आयोग ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति में भी शासन का दखल होने के कारण इन दोनों की स्वतंत्रता पर सवाल उठते रहते हैं। लब्बोलुआब यह कि संसद, भाजपा, संघ, मीडिया, चुनाव आयोग और राष्ट्रपति ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय भी प्रधानमंत्री से प्रभावित रहते हैं। मोदी की तो शैली ही ऐसी है कि हर कोई उनकी इच्छा का सम्मान करने के लिए बाध्य सा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सारे संकल्प सन् 2022 तक पूरे करने का वादा किया है। अब मोदी यह नहीं कह पाएंगे कि पिछले 70 सालों में कांग्रेस ने फलां गलती कर दी, जिसका खामियाजा हम भुगत रहे हैं। अर्थव्यवस्था का हाल वास्तव में बुरा है। रोजगार के साधन कम होते जा रहे हैं, रिजर्व बैंक के रिजर्व का सफाया हो चुका है, निर्यात डांवाडोल है, आयात बढ़ रहा है, देश पर कर्ज बेतहाशा बढ़ गया है। नई सरकार के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। फिलहाल मानसून के खराब हो जाने की चिंता है। यदि ऐसा हुआ, तो बदहाली स्पष्ट नजर आएगी। पिछले एक साल से खाद्य पदार्थों की कीमत में भी ऊपर का रुझान है। आंकड़ों में फेरबदल करके सरकार बेरोजगारी कम दिखाए, वह अलग बात है, पर जो बेरोजगार है, उसके लिए तो उन आंकड़ों की कोई कीमत नहीं है, उसे तो रोजगार चाहिए। आटोमोबाइल की बिक्री घटना, ग्रामीण मजदूरी में गिरावट, औद्योगिक उत्पादन में कमी, पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतें आदि सब चिंता का विषय हैं। यह पहली बार हुआ है कि पेट्रोलियम पदार्थों और बिजली की खपत में ही कमी आ गई है।

इस्पात का उत्पादन पिछली दोनों-तिहाइयों में लगातार घटा है। जीडीपी का आधार बदलने के बावजूद यह नीचे जा सकती है। इसमें भी जो आंकड़े हैं, वे 39 शैल कंपनियों की रिपोर्ट को शामिल करने के बाद हैं। यानी असल आंकड़े और ज्यादा बदहाली दिखाते हैं। इन सब का मिला-जुला मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था सचमुच ऐसे अंधे मोड़ पर है, जहां से उसका जल्दी बाहर आना संभव नहीं नजर आता। न केवल बैंक के क्रेडिट के उठने में जबरदस्त कमी है, बल्कि निर्यात गिर रहा है और आयात लगातार ऊपर जा रहा है। अमरीका और चीन के द्वंद्व में हम कितना पिसेंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा, पर यह निश्चित है कि ईरान से तेल ले पाने की मनाही के चलते हमारी अर्थव्यवस्था की चुनौती गहराएगी ही। अमरीका के दबाव में हमने ईरान के तेल मंत्री तक को टरका दिया। छप्पन इंच की छाती के बावजूद अब हम तेल महंगा भी ले रहे हैं और उसका भुगतान भी विदेशी मुद्रा में हो रहा है। यह ज्यादा आश्चर्य की बात नहीं है कि देश के सिर पर मंडरा रहे इस भयावह खतरे के बावजूद हम गाल बजा रहे हैं, नाच रहे हैं और हमारी उत्सुक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार में कौन शामिल होगा, एनडीए के सहयोगी दलों को कौन से मंत्रालय मिलेंगे और सहयोगी दलों में से किसकी सुनवाई ज्यादा होगी।

हम वे कबूतर हैं, जिसने बिल्ली को न देखने के लिए रेत में मुंह छिपाकर आंखें बंद कर ली हैं। माहौल में चुप्पी है, तो इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि शपथ लेने से भी पहले मोदी चुनावी मोड में आ गए हैं। रोज एक नई इवेंट का आयोजन होता है, वह रोज एक नया बयान देते हैं और रोज एक नया सूत्र सामने आता है। यही नहीं, भाजपा का आईटी सेल अभी से सक्रिय हो चुका है और सोशल मीडिया मंचों पर राहुल गांधी और कांग्रेस के खिलाफ रोज  एक नया अपमानजनक चुटकुला देखने को मिल रहा है। यह खेद का विषय है कि हम समस्याओं पर चिंतन से विमुख होकर विपक्ष के अपमान पर ठहाके लगा रहे हैं। अगर हम जल्दी ही न संभले, तो पूरा विश्व हम पर हंसेगा।

ई-मेलः indiatotal.features@gmail

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