इस चुनाव के अनसुलझे मसले

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

 

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के लिए ‘चौकीदार चोर है’ का नारा देकर सबसे बुरा नारा गढ़ने का काम किया। इसी नारे पर जब बच्चों ने शोरोगुल किया तो नारे पर हंसकर प्रियंका गांधी ने भी बचकाना हरकत की। विरोधियों को आपत्तिजनक बातें कहना किसी भी तरह से विचार अभिव्यक्ति की सीमा के तहत नहीं आता है। व्यक्ति के गौरव व उसकी शिष्टता का सम्मान तो होना ही चाहिए। इस तरह के मामलों में अगर कोई हनन होता है, तो उसकी दैनिक सुनवाई के लिए कुछ ठोस व्यवस्था की जानी चाहिए…

इसी कॉलम में एक मई के संस्करण में मैंने लिखा था कि भाजपा को बहुमत मिलेगा। भाजपा को पिछले चुनावों में मिली 282 सीटों से कम सीटें नहीं मिलेंगी। मेरा तर्क उपलब्ध सर्वेक्षण आंकड़ों पर आधारित है। भाजपा को कुछ सीटें कम आ सकती हैं, किंतु ये यूपी, पंजाब व छत्तीसगढ़ में 23 सीटों से ज्यादा नहीं होंगी। दूसरी ओर कुछ राज्यों में भाजपा को लाभ हो सकता है। पहली बार इसकी उपस्थिति दक्षिण भारत में महसूस की जाएगी। यह कर्नाटक तथा तमिलनाडू में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अर्जित कर सकती है। भाजपा अपने ही बूते 290 सीटें हासिल करेगी तथा एनडीए को 300 प्लस सीटें मिल सकती हैं जो 320 से 330 सीटें तक हो सकती हैं। कांग्रेस की ‘कैट काल्स’ के बावजूद नरेंद्र मोदी सर्वाधिक शक्तिशाली नेता के रूप में उभरेंगे, जबकि कांगे्रस के समक्ष अस्तित्व का प्रश्न खड़ा होगा। राहुल गांधी, मायावती, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू, लालू प्रसाद यादव, चौटाला परिवार तथा मुफ्ती परिवार इस चुनाव में खास कुछ नहीं कर पाएंगे। अब एग्जिट पोल तथा मेरा पूर्वानुमान जनता के ज्ञान क्षेत्र में है, यह 23 मई को घोषित हुए परिणामों से भी संगति कर रहे हैं। इसके बावजूद भविष्य में देखना मेरे लिए एक पवित्र अभ्यास है जिसे किसी को निहित स्वार्थों के साथ नहीं करना चाहिए। मैंने अपना पूर्वानुमान प्रकाशित किया जिसके परिणामस्वरूप कई पाठक मुझ पर हंस पड़े। जिन दलों का मैंने पक्ष नहीं लिया, उन दलों से भी कुछ लोग थे जिन्होंने मेरी निंदा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। परंतु मैं अपने नजरिए पर कायम रहा।

अब एग्जिट पोल और परिणाम ने मेरे पूर्वानुमान की वैधता को मजबूती के साथ पुष्ट किया है। ये एग्जिट पोल भी भाजपा को स्पष्ट बहुमत देते हैं। अब आम चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है तथा यह वह समय है जब उन समस्याओं पर विचार होना चाहिए जिन्हें इस चुनाव प्रक्रिया के दौरान अनुभव किया गया तथा जो अब भी अनसुलझी हैं। अब जबकि परिणाम आ चुके हैं, मेरा विश्वास है कि यहां कुछ महत्त्वपूर्ण मसले हैं जिनकी ओर ध्यान देने की जरूरत है। पहले कदम के रूप में तीन मसले लिए जा सकते हैं। पहला मसला है प्रचार की वैधता अथवा आपत्तिजनक भाषण। इस संबंध में गाइडलाइन की सख्त जरूरत है। यदि प्रज्ञा ठाकुर नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहती हैं तथा अन्य उसे आतंकवादी कहते हैं, तो जरूरत है इसे रोकने या इस पर पाबंदी लगाने के नजरिए की। परंतु विवाद के संबंध में निर्णय कौन करेगा? साध्वी के पास गोडसे को आतंकवादी कहने पर आपत्ति जताने का आधार था। वह अपने अभियान के लिए लड़ रहा था तथा उसका विश्वास था कि गांधी जी देश के विभाजन व खून-खराबे के लिए जिम्मेवार थे। हत्यारों का एक समूह संलिप्त था तथा गोडसे ने उनको बचाने के लिए दोष अपने सिर पर ले लिया। चूंकि यह मसला संवेदनशील प्रकृति का है, इसलिए इससे निपटने में आवश्यकता इस बात की है कि अलग से तथा चुनाव की ‘क्लोज्ड कोर्ट’ में निपटा जाए। यहां तक कि इतिहास को भी तथ्यों की सफाई तथा झूठी कहानियों को किनारे करने की जरूरत होती है, किंतु इसे चुनाव आपरेशन से दूर रखा जाना चाहिए। ऐसे मसलों तथा अन्य शिकायतों पर तुरंत सुनवाई की जरूरत है तथा एक व्यक्ति पर आधारित स्टैंडिंग बैंच की ओर से निर्णय लिया जाना चाहिए। इस तरह के विस्तृत मसले विलंबित किए जाने चाहिए ताकि इन पर न्यायपालिका विचार कर सके, किंतु चुनाव के दौरान इन्हें रोका जाना चाहिए। मुख्य मसलों का दूसरा क्षेत्र उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले वादों तथा लुभावने नारों से संबंधित है। अगर वोट के लिए पैसे की पेशकश की जाए अथवा अन्य प्रलोभन दिए जाएं तो यह खुली रिश्वत की तरह है। इस तरह की रिश्वत पर पाबंदी लगनी चाहिए। मेरा चालक मुझे रोज 72000 रुपए की याद दिलाता है जो उसने अपना वोट बेच कर प्राप्त कर लिए होते। न केवल धन की पेशकश, बल्कि सबसिडी या अनुदान या आवास इत्यादि की अन्य पेशकश पर भी सख्त पाबंदी होनी चाहिए क्योंकि यह मतदाता को रिश्वत देना ही है। कई उदाहरण हैं जब उम्मीदवार स्कूलों, कालेजों या अस्पतालों का वादा करते हैं, किंतु यह भी रोका जाना चाहिए क्योंकि प्रत्येक उम्मीदवार को अपनी एक पेज की वादा सूची जमा कराने के लिए कहा जाना चाहिए तथा चुनाव की पूर्णता को छोड़कर इसमें कुछ और जोड़ने पर रोक लगानी चाहिए।

ऐसे वादे करते समय यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या इन्हें पूरा करने की क्षमता उम्मीदवार में है अथवा नहीं? व्यवहार में क्या संभव है, इस पर विचार किए बिना कई उम्मीदवार काल्पनिक और अविश्वसनीय वादे कर देते हैं। चुनाव के बाद ये वादे कई बार अव्यावहारिक साबित होते हैं तथा वित्तीय रूप से इन्हें पूरा करना असंभव हो जाता है। इस तरह के वादों के कारण मतदाता बाद में ठगा-सा महसूस करते हैं। तीसरा मसला विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है। इस पर सभी दलों में सहमति होनी चाहिए तथा यह सहमति बनाने के लिए प्रत्येक चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दलों की मीटिंग आहूत करनी चाहिए। भद्दी गालियां अथवा किसी के उपनाम रख लेने पर पूरी तरह पाबंदी लगा देनी चाहिए। किसी को पप्पू या चायवाला या कुछ और आपत्तिजनक कहने पर पाबंदी होनी चाहिए।

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के लिए ‘चौकीदार चोर है’ का नारा देकर सबसे बुरा नारा गढ़ने का काम किया। इसी नारे पर जब बच्चों ने शोरोगुल किया तो नारे पर हंसकर प्रियंका गांधी ने भी बचकाना हरकत की। विरोधियों को आपत्तिजनक बातें कहना किसी भी तरह से विचार अभिव्यक्ति की सीमा के तहत नहीं आता है। व्यक्ति के गौरव व उसकी शिष्टता का सम्मान तो होना ही चाहिए। इस तरह के मामलों में अगर कोई हनन होता है, तो उसकी दैनिक सुनवाई के लिए कुछ ठोस व्यवस्था की जानी चाहिए। यह एक ऐतिहासिक चुनाव था। विरोधियों पर तीखे हमलों के कारण प्रचार अभियान में काफी कड़वाहट भी आई। चुनाव के दौरान उभरे मसलों से निपटने के लिए चुनाव आयोग को भी सख्ती करनी पड़ी। इस चुनाव को यादगार बनाए रखने का जिम्मा अब जीतने व हारने वाले प्रत्याशियों पर निर्भर करता है। उन्हें जीत अथवा हार की स्वीकृति की शानदार परंपरा स्थापित करनी चाहिए।  

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