नए अध्याय की शुरुआत

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

इस पारिवारिक महल को पहला आघात तो 2014 में ही लग गया था, लेकिन अभी तक इस परिवार को विश्वास था कि यह एक बार फिर भारतीयों को धोखा देने में कामयाब हो जाएंगे और भारत के लोग अपना भाग्य इन के हाथों में सौंप देंगे। सोनिया परिवार को यह विश्वास दिलाने में शायद सैम पित्रोदा, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और अहमद पटेल जैसों का भी हाथ रहा होगा, लेकिन भारतीय इस प्रकार के पारिवारिक राज्यों से  थक ही नहीं गए थे, बल्कि उनको इनके भावी नुकसानों का भी आभास हो गया था। इसलिए चुनावों में सोनिया माईनो का यह परिवार धराशायी हो गया, लेकिन धराशायी होते-होते अपने साथ दूसरे पारिवारिक दलों को भी ले डूबा। जाति और परिवार के नाम पर पिछले दो-तीन दशकों में उगाए गए राजनीतिक दल और महल एक साथ ढह गए। लालू का कुनबा, ओम प्रकाश चौटाला का वंश, मुलायम सिंह यादव की पारिवारिक कंपनी, सभी देखते-देखते लुढ़क गए…

लोकसभा चुनावों के परिणाम आ गए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने अपने बलबूते 303 सीटें जीत ली हैं। सोनिया गांधारी – राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और राबर्ट वाड्रा के संपूर्ण प्रयासों के बावजूद सोनिया कांग्रेस 51 सीटें जीत पाई। पिछली लोकसभा में उसने 44 सीटें जीती थीं, इस लिहाज से सोनिया कांग्रेस पिछली बार से सात सीटें ज्यादा जीती हैं। सोनिया कांग्रेस के बेटे राहुल गांधी अमेठी से अपनी परंपरागत सीट स्मृति ईरानी के हाथों हार गए हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि इस परिवार ने काफी समय पहले सूंघ लिया था कि अमेठी इस बार परिवार को धूल चटाएगी। हैरानी की बात है कि उसके बाद भी पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति नहीं बदली, बल्कि सोनिया ने बेटे के भविष्य की चिंता में राहुल को केरल के वायनाड में भी खड़ा कर दिया।

मुसलमानों और ईसाइयों की इस सीट में बहुसंख्या होने के कारण परिवार को विश्वास था कि राहुल यहां से आसानी से जीत जाएंगे और वे जीत भी गए। इसका अर्थ यह हुआ कि पार्टी और परिवार दोनों को संकट काल में केवल मुसलमान और ईसाई समाज पर भरोसा था और उन्होंने अपनी पूरी रणनीति इसी परिकल्पना के आधार पर बनाई। इस समाज ने वायनाड में तो सोनिया परिवार का साथ दे दिया, लेकिन शेष भारत में उन्होंने मजहब लाइन पर चलने से इनकार कर दिया। प्राप्त मतों का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार बहुत बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी भाजपा को वोट दिया। सोनिया परिवार ने जो पचास सीटें देशभर में जीती भी हैं, उनमें से आठ-आठ तो तमिलनाडु और पंजाब से हैं। सभी जानते हैं तमिलनाडु में उसे ये सीटें डीएमके के कारण मिली हैं, न कि परिवार के कारण। जहां तक पंजाब का प्रश्न है, वहां कांग्रेस की जीत कैप्टन अमरेंद्र सिंह के कारण है, न कि राहुल गांधी के कारण। पंद्रह सीटें उसे केरल से मिली हैं।

केरल में दो मोर्चे हैं – एक एलडीएफ  और दूसरा यूडीएफ। बदल-बदल कर दोनों मोर्चे वहां से जीतते रहते हैं। यूडीएफ मोटे तौर पर सोनिया कांग्रेस और मुस्लिम लीग का साझा मोर्चा है, जिसमें कुछ और भी छोटे-मोटे दल हैं। इस समय केरल में एलडीएफ की साम्यवादी सरकार है, उसकी प्रतिक्रिया में सोनिया कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने पंद्रह सीटें प्राप्त कर लीं। कांग्रेस की शेष बीस सीटें इधर-उधर से इक्का-दुक्का का जोड़ कर ही बनती हैं। उत्तरी भारत, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बंगाल और गुजरात में वह साफ ही हो गई। आखिर कांग्रेस की इस दुर्गति का क्या कारण हो सकता है? दरअसल यह लड़ाई कांग्रेस की लड़ाई थी ही नहीं। यह तो सोनिया गांधी परिवार, जिसमें उनका पुत्र राहुल गांधी, उनकी बेटी प्रियंका गांधी और उनका दामाद राबर्ट वाड्रा का अपने पारिवारिक साम्राज्य को बचा पाने का अंतिम प्रयास था। कांग्रेस का नाम तो इस पूरे प्रयास में ढाल के तौर पर किया जा रहा था। 2014 से पहले भी  एक भारतीय डा. मनमोहन सिंह को ढाल के तौर पर आगे करके सोनिया माईनो गांधी ने दस साल तक इस देश पर राज किया था। इस दस साल के राज में भारत की जो दुर्दशा हुई, सम्मान के मामले और भ्रष्टाचार के मामले में भी, उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता। इस पारिवारिक महल को पहला आघात तो 2014 में ही लग गया था, लेकिन अभी तक इस परिवार को विश्वास था कि यह एक बार फिर भारतीयों को धोखा देने में कामयाब हो जाएंगे और भारत के लोग अपना भाग्य इन के हाथों में सौंप देंगे।

सोनिया परिवार को यह विश्वास दिलाने में शायद सैम पित्रोदा, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और अहमद पटेल जैसों का भी हाथ रहा होगा, लेकिन भारतीय इस प्रकार के पारिवारिक राज्यों से  थक ही नहीं गए थे, बल्कि उनको इनके भावी नुकसानों का भी आभास हो गया था। इसलिए चुनावों में सोनिया माईनो का यह परिवार धराशायी हो गया, लेकिन धराशायी होते-होते अपने साथ दूसरे पारिवारिक दलों को भी ले डूबा। जाति और परिवार के नाम पर पिछले दो-तीन दशकों में उगाए गए राजनीतिक दल और महल एक साथ ढह गए। लालू का कुनबा, ओम प्रकाश चौटाला का वंश, मुलायम सिंह यादव की पारिवारिक कंपनी, सभी देखते-देखते लुढ़क गए। जो विश्लेषण भारत की राजनीति को जाति और मजहब से परे हटकर न समझने को तैयार नहीं थे, वे भी यह लिखने को मजबूर हो गए कि मोदी लहर ने जाति और मजहब की दीवारों से बन गए भेदभाव को समाप्त कर दिया है।

तथाकथित विपक्ष के अनेक नेतानुमा व्यक्ति, जो लोकसभा की एक-एक सीट के लिए आपस में लड़ रहे थे, वे चुनावों के बाद किसी भी तरह आपस में मिलकर सत्ता पर कब्जा जमा लेने के षड्यंत्र रच रहे थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि इस प्रकार के, नरेंद्र मोदी के शब्दों में मिलावटी गठबंधन से शक्तिशाली और विश्वगुरु भारत का सपना नहीं पैदा होता, बल्कि इससे घर जोड़ने की माया की सुरंगें निकलती हैं। पिछले कई दशकों से भारत की राजनीति में इसी प्रकार की काली रहस्यमयी सुरंगें निकलती रही हैं, जिनमें पारिवारिक राजनीतिक दलों की बौनी नस्लें  तैयार होती रही हैं। इस प्रकार की ये अतृप्त आत्माएं हस्तिनापुर में घूम रही थीं। भारत की जनता ने अंततः इन आत्माओं की गति कर दी और देश के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत भी कर दी।

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