निचले स्तर तक पहुंचे प्रतिभा खोज

भूपिंदर सिंह

राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक

 

स्कूल स्तर पर अच्छे खिलाडि़यों के लिए प्रशिक्षण सुविधा का भी प्रबंध अनिवार्य रूप से होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि शिक्षा विभाग के स्कूलों में हर बच्चे का बैटरी टेस्ट कम से कम त्रैमासिक स्तर पर लिया जाए और उसका रिपोर्ट कार्ड भी बनाया जाए। उसमें सुनिश्चित करवाया जाए कि विद्यार्थी साल दर साल कितना सुधार कर रहा है। जब स्कूली स्तर पर हम हर विद्यार्थी तक फिटनेस के लिए पहुंचेंगे, तो उससे जहां हिमाचल व भारत को फिट नागरिक मिलेंगे, वहीं पर वहां से तिरंगे को विश्व स्तर पर सबसे ऊंचा करने वाले उत्कृष्ट खिलाड़ी भी मिलेंगे…

आज खेल किसी भी देश की तरक्की, खुशहाली व सेहतमंद होने का पैमाना बने हुए हैं। ओलंपिक खेलों की पदकतालिका में हम संसार के विकसित देशों को क्रमवार ऊपर देख सकते हैं। आजादी के बाद से लेकर अब तक देश में खेलों को बढ़ावा देकर उत्कृष्ट खेल परिणाम देने के लिए कई तरह की योजनाएं बनी हैं। कहते हैं खिलाड़ी पैदा होते हैं, उन्हें बनाया नहीं जा सकता है। इसलिए प्रतिभावान खिलाडि़यों की खोज कम उम्र में बहुत जरूरी हो जाती है। भारतवर्ष में पांच दशक पूर्व पूर्वी जर्मनी के खेल विशेषज्ञों के सुझाव पर कैच दैम यंग नामक योजना बनी। इस योजना के अंतर्गत पूरे भारतवर्ष में ग्रामीण खेलों की शुरुआत हुई।

इसमें विभिन्न खेलों के लिए अंडर-16 वर्ष आयु वर्ग के लड़के-लड़कियों की प्रतियोगिताएं खंड स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक करवाई जाने लगी। यहां से भविष्य के खिलाडि़यों को पहचान कर उन्हें फिर खेल छात्रावासों में लाकर प्रशिक्षण का प्रबंध किया गया। उस समय देश का मानव संसाधन मंत्रालय इस योजना को राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान पटियाला के माध्यम से चलाता था। बाद में भारत सरकार ने खेलों व युवा गतिविधियों  के लिए अलग मंत्रालय बनाया, जिसे आज युवा सेवाएं एवं खेल मंत्रालय के नाम से जाना जाता है। 1982 एशियाई खेलों के लिए बड़े पैमाने पर बने खेल ढांचे के रखरखाव के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना की, बाद में राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान का विलय भी भारतीय खेल प्राधिकरण में कर दिया गया। देश में आजकल भारतीय खेल प्राधिकरण खेलों को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देख रही है। खेल राज्य सूची का विषय होने के कारण प्रारंभिक स्तर पर खेलों को बढ़ावा देने का जिम्मा राज्य सरकारों का है।

भारतीय खेल प्राधिकरण के ग्रामीण खेलों को पायका में बदला, फिर उनका नाम राजीव गांधी खेल योजना हो गया, उसे भी बदलकर राष्ट्रीय खेल योजना रखा और खेलों को निचले स्तर पर बढ़ावा देने के लिए कोई भी योजना नहीं है। स्कूल में आज हर बच्चा शिक्षा ग्रहण करने जा रहा है, मगर स्कूलों के पास भी हर बच्चे की फिटनेस के लिए कोई योजना नहीं है। जब देश के स्कूलों में फिटनेस के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है तो फिर हर बच्चे तक प्रतिभा खोज के लिए कैसे पहुंचा जा सकता है। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे अपने स्कूलों में हर बच्चे की फिटनेस सुनिश्चित करवाए। हिमाचल प्रदेश में अधिकतर स्कूलों के पास खेल मैदान जैसी मूलभूत सुविधा ही नहीं है। ऐसे में हम कैसे हर विद्यार्थी की फिटनेस सुनिश्चित कर सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में स्कूली क्रीड़ा संगठन खंड स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपने खिलाड़ी विद्यार्थियों को खेल प्रतियोगिताओं का प्रबंध तो जरूर करवाता है, मगर खंड स्तर पर नाममात्र के स्कूल वहां भाग लेते हैं। कई प्रतिभावान बच्चे खेल मैदान तक नहीं पहुंच पाते हैं। खेल विभाग के नाम खेल प्रतियोगिता करवाने के लिए धन व प्रशिक्षक हैं, मगर खिलाड़ी शिक्षा विभाग के स्कूलों में हैं तथा खेलों के प्रतियोगिता नियम प्रचार-प्रसार व अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व का जिम्मा खेल संघों के पास है।

ऐसे में इन अलग-अलग संस्थाओं में समन्वय की काफी अधिक आवश्यकता है। जब आज हर बच्चा स्कूल जाकर वहां का विद्यार्थी है तो फिर राज्य सरकार सुनिश्चित करे कि पढ़ाई की तरह हर बच्चे का फिटनेस रिपोर्ट कार्ड बने और जो बच्चे शारीरिक क्षमताओं में अतिप्रतिभावान हैं, उन्हें सुविधा व प्रतिभा के अनुसार खेल में डाला जाए। हर स्कूल को अनिवार्य हो कि वह खंड स्तर की खेल प्रतियोगिता में अनिवार्य रूप से भाग ले। इस स्तर पर सरकार खंड स्तर की खेल प्रतियोगिता के लिए माकूल धन का भी प्रावधान करे।

जब हजारों घोड़े दौड़ेंगे तो उसमें से रेस का घोड़ा भी जरूर निकलेगा, जब खंड स्तर पर सभी स्कूलों के अच्छे खिलाड़ी भाग लेंगे तो फिर जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आगे अच्छे खिलाड़ी आएंगे। हिमाचल प्रदेश में इस समय कुछ खेलों के लिए स्कूली खेल छात्रावास हैं तथा राज्य खेल विभाग व भारतीय खेल प्राधिकरण के भी दो-दो खेल छात्रावास हैं, मगर प्रतिभा खोज से निकले सैकड़ों खिलाडि़यों के लिए यह सुविधा बहुत कम है।

स्कूल स्तर पर अच्छे खिलाडि़यों के लिए प्रशिक्षण सुविधा का भी प्रबंध अनिवार्य रूप से होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि शिक्षा विभाग के स्कूलों में हर बच्चे का बैटरी टेस्ट कम से कम त्रैमासिक स्तर पर लिया जाए और उसका रिपोर्ट कार्ड भी बनाया जाए। उसमें सुनिश्चित करवाया जाए कि विद्यार्थी साल दर साल कितना सुधार कर रहा है। जब स्कूली स्तर पर हम हर विद्यार्थी तक फिटनेस के लिए पहुंचेंगे, तो उससे जहां हिमाचल व भारत को फिट नागरिक मिलेंगे, वहीं पर वहां से तिरंगे को विश्व स्तर पर सबसे ऊंचा करने वाले उत्कृष्ट खिलाड़ी भी मिलेंगे।

ई-मेल-bhupindersinghhmr@gmail.com

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