मोदी की सुनामी में डूबता विपक्ष

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

कुल मिलाकर भाजपा को अपने दम पर 290 सीटें मिल सकती हैं,जबकि एनडीए को कुल तीन सौ से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, जो 320 से 330 सीटें भी हो सकती हैं। कांग्रेस के दुष्प्रचार के बावजूद मोदी इस चुनाव में सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उभरेंगे, जबकि कांगे्रस को खुद अपने अस्तित्व के प्रश्न से जूझना पड़ सकता है। राहुल गांधी, मायावती, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू, लालू प्रसाद यादव, चौटाला परिवार व मुफ्ती परिवार इस चुनाव में कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं कर पाएंगे। विपक्ष को फिर से संगठित करने की जरूरत पड़ेगी तथा नया नेतृत्व उभर सकता है। यह चुनाव भारत के राजनीतिक परिदृश्य का नया अध्याय लिखने जा रहा है…

आजकल लोकसभा का जो चुनाव लड़ा जा रहा है, उसमें कड़वाहट आ गई है तथा अब यह अपने अंतिम चरण में है। जनता द्वारा मतदान की प्रक्रिया 11 अप्रैल से शुरू हो चुकी है, जो 19 मई तक चलेगी। मतदान का सैलाब मतदान केंद्रों की ओर मुड़ गया है तथा यह 19 मई को समय की रेत पर चुपचाप स्थिर हो जाएगा। चुनाव प्रचार के लिए जो अभियान चला, उसकी एक प्रमुख खासियत यह रही है कि इसमें गालियों का एक तूफान चला, एक-दूसरे को बदनाम करने की भरपूर कोशिश हुई तथा प्रचार अभियान का पूरा परिदृश्य कड़वाहट से भर गया। आचरण के सभी मापदंडों को तिलांजलि दे दी गई तथा संभव है जब चुनाव प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, तो पीछे रह जाएगा झूठ और फरेब का कचरा, जो भारतीय राजनीति को दूषित करता दिखाई देता है। शिखर पर चढ़ने के बाद अब यात्रा के अवरोहण को देखना संभव है। मैं बिना किसी डाटा के स्पष्ट रूप से और सहज ज्ञान से देखता हूं कि नरेंद्र मोदी इस चुनाव प्रक्रिया में एक महापुरुष के रूप में उभरे हैं तथा आज के समय में उनका कोई विकल्प नहीं है तथा न ही उनके कद के आसपास कोई लगता है।

अगर हम पीछे की ओर देखें तो हमें जनमत में उतार-चढ़ाव, उभार तथा मोदी लहर के गिरने के तीन चरण स्पष्ट दिखाई देते हैं। पहली लहर उठी, किंतु जल्द ही मंद पड़ गई, इस जनमत को पुख्ता करती है कि जब किसी को कोई संदेह नहीं था तो नेतृत्व की अनुपस्थिति में मोदी सरकार का निर्माण करेंगे, किंतु वह अपने बल पर बहुमत हासिल नहीं कर पाएंगे। विपक्ष का शिखर और मोदी की धीमी लहर तब थी, जब विपक्ष के सभी नेताओं ने एकता का प्रदर्शन किया। वह ओपिनियन पोल, जिसने मोदी का हाई रेट दर्शाया, उसने दूसरी लहर में नीचे आना शुरू कर दिया। मोदी लहर का गिरना दर्शाता है कि विपक्ष में उभार आता है तथा इस चरण में राहुल गांधी, मोदी चोर है का मूर्खतापूर्ण व जोशीला प्रचार करते हैं। यह चरण एक विकृत चरण था तथा यह भारतीय चुनाव प्रचार का नैतिक रूप से आधारहीन चरण था। हालांकि किसी ने भी इस पर विश्वास नहीं किया तथा यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी आरंभिक नजरिए को खारिज कर दिया। दुखद रूप से एक छिछोरी व गैर जिम्मेवार रणनीति ने कांग्रेस को तहस-नहस कर दिया तथा इसने पार्टी की मदद करने के बजाय उसकी लोकप्रियता पर ही चोट कर दी। इसके अलावा राहुल गांधी की ओर से दूसरी सीट से नामांकन करने तथा चुनाव के अंतिम चरण में प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतार देने से मतदाताओं की नजर में कांग्रेस का ग्राफ गिरा ही है। दूसरे चरण में तथाकथित महागठबंधन का विखंडन भी देखा गया जिसकी बड़ी अपेक्षाओं के साथ बंगलुरू में शुरुआत हुई थी। ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में स्वीकार नहीं किया। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती ने भी कांग्रेस से कोई गठजोड़ नहीं किया तथा उसे व अन्य दलों को मात्र दो सीटें ही छोड़ी। गठबंधन की ये शर्तें अपमानजनक व मजाकिया थीं। चंद्रबाबू नायडू महागठबंधन के लिए इधर-उधर दौड़-भाग करते रहे, पर यह मसला सिरे नहीं चढ़ सका। प्रचार अभियान का तीसरा चरण हम जो देख रहे हैं, उसमें महागठबंधन ‘नॉन स्टार्टर’ है। इस कॉलम में मैंने पहले कहा था कि यह फेल हो जाएगा और ऐसा ही हुआ। आजकल राजनीतिक गलियारों में चार प्रकार के नजरिए देखने को मिल रहे हैं। पहला नजरिए यह है कि भाजपा इन चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आएगी तथा वह अपने बल पर बहुमत नहीं जुटा पाएगी। इस स्थिति में गठजोड़ करना पड़ेगा। दूसरा नजरिया यह है कि भाजपा को बहुमत मिल जाएगा, लेकिन वह इतना कम होगा कि सरकार को आसानी से चलाना मुश्किल होगा और ऐसी स्थिति में उसे अन्य दलों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी।

तीसरा नजरिया संघीय मोर्चा की अवधारणा को लेकर है, जब भाजपा के अलावा अन्य सभी पक्ष केंद्र में मिलकर सरकार का निर्माण करेंगे। मेरे विचार में यह फिजीबल नहीं है, लेकिन अगर भाजपा को पर्याप्त बहुमत नहीं मिलता है, तो यह एक विकल्प हो सकता है। पूर्व में विभिन्न दलों द्वारा गठजोड़ करने के अनुभव तथा वर्तमान के उदाहरण को देखते हुए यह संभव नहीं लगता है। चौथा नजरिया वह है जिसकी वर्तमान परिदृश्य में मुझे संभावना लगती है। मैंने चुनाव पर नजर रखने वाले विभिन्न लोगों से इस विषय में बात की है तथा मुझे लगता है कि भाजपा को पिछले लोकसभा चुनावों में मिली 282 सीटों के आसपास ही सीटें इस बार भी मिल सकती हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब व छत्तीसगढ़ में उसकी ज्यादा से ज्यादा 23 सीटें घट सकती हैं, लेकिन साथ ही भाजपा को कुछ क्षेत्रों में लाभ भी होने वाला है। दक्षिण भारत में उसकी उपस्थिति को इस बार पहली बार महसूस किया जाएगा। कर्नाटक व तमिलनाडू में उसे महत्त्वपूर्ण बढ़त मिल सकती है।

कुल मिलाकर भाजपा को अपने दम पर 290 सीटें मिल सकती हैं,जबकि एनडीए को कुल तीन सौ से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, जो 320 से 330 सीटें भी हो सकती हैं। कांग्रेस के दुष्प्रचार के बावजूद मोदी इस चुनाव में सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उभरेंगे, जबकि कांगे्रस को खुद अपने अस्तित्व के प्रश्न से जूझना पड़ सकता है। राहुल गांधी, मायावती, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू, लालू प्रसाद यादव, चौटाला परिवार व मुफ्ती परिवार इस चुनाव में कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं कर पाएंगे। विपक्ष को फिर से संगठित करने की जरूरत पड़ेगी तथा नया नेतृत्व उभर सकता है। इस बात की ज्यादा संभावनाएं हैं कि तमिलनाडू व पश्चिम बंगाल भारत की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले राज्यों के रूप में उभरेंगे। यह चुनाव भारत के राजनीतिक परिदृश्य का नया अध्याय लिखने जा रहा है।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

You might also like