राजनीति में युगांतरकारी बदलाव

May 31st, 2019 12:08 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

बड़े स्तर पर मुसलमानों ने भी मोदी के पक्ष में मतदान किया, जिन्होंने राजनीति के गांधी मॉडल के स्थान पर मोदी मॉडल स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि यूपी में एक महिला ने मोदी की प्रशंसा में अपने पुत्र का नाम नरेंद्र रख लिया। अब मोदी ने सबका साथ सबका विकास के अपने नारे में सबका विश्वास भी जोड़ लिया है…

हम जो हैं, वह नहीं हैं, हम जानते हैं किंतु हम महसूस नहीं करते हैं। वर्ष 2014 से लेकर मोदी अपने नए एजेंडे पर सत्ता में आए हैं। हम राजनीति के उनके मॉडल में अतिसूक्ष्म बदलाव देख सकते हैं, किंतु किसी ने इसे व्यक्त नहीं किया। ब्रांडेड लेखक व पत्रकार, जो राजनीति के परंपरागत मॉडल का प्रयोग करते रहे हैं, इसके प्रति सचेत नहीं थे। पत्रकार राजनीतिज्ञों को पंथनिरपेक्ष तथा गैर-पंथनिरपेक्ष, समाजवादी और गैर-समाजवादी, धर्म-आधारित व जातीय आधार पर विभाजित करने की ओर प्रवृत्त हुए। गांधी द्वारा स्थापित मॉडल के परंपरागत नजरिए का अस्तित्व अभी भी है तथा इसका राजनीतिज्ञ व राजनीतिक विचारक इसके भ्रमात्मक व भावनात्मक दोषों को महसूस किए बिना अनुगमन करते रहे हैं। पंथनिरपेक्षता ने राजनीति की गहराई को स्थापित किया, जिसे गांधी ने प्रतिस्थापित किया – यह था ईश्वर अल्लाह तेरे नाम सबको सम्मति दे भगवान के साथ रघुपति राघव मॉडल। किंतु सबके प्रति प्यार की आड़ में इसने सारे मनन में अल्पसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक के ऊपर रख दिया। गांधी ने अपने निर्णायक अनशनों में प्रदर्शित किया कि वह अल्पसंख्यक सरोकारों की पैरोकारी करते हैं क्योंकि उन्हें बढि़या आचरण की जरूरत है जिसकी बहुसंख्यक द्वारा उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

गांधी अपनी पंथनिरपेक्षता को प्रमाणित करने के लिए जिन्ना को स्वतंत्र भारत का प्रमुख बनाने के लिए भी तैयार थे। इसी मॉडल का स्वतंत्रता के बाद राजनीति ने अनुगमन किया। किंतु एक बड़ा बदलाव डा. अंबेडकर के सन्निवेश के जरिए आ चुका था, देश के नए संविधान ने नए विचारों को लाया, जब विचारकों द्वारा कुछ को न तो नोट किया गया और न ही उपेक्षित किया गया। नए संविधान ने सभी नागरिकों को समानता प्रदान की तथा इसमें किसी के साथ प्राथमिकता के साथ व्यवहार को शामिल नहीं किया गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने हालांकि यही असमान व तुष्टिकरण का व्यवहार जारी रखा। संविधान की ओर से दिए गए मौलिक अधिकारों के बारे में जस्टिस गजेंद्रगडकर ने लिखा, ‘यह मानवाधिकारों का शायद सबसे विस्तृत चार्टर है जो कि राज्य द्वारा तैयार किया गया है। यह विस्तार से विषयों के हितों तथा राष्ट्र की एकता के लक्ष्य के साथ स्थिर है।’ जस्टिस भगवती ने लिखा, ‘ये मूल अधिकार वैदिक काल से देश के लोगों द्वारा प्रफुल्लित मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।’ क्या ये अधिकार नागरिकों को समानता व गौरव प्रदान करने के लिए काफी नहीं थे? पंथनिरपेक्ष दल अल्पसंख्यकों को बढि़या ट्रीटमेंट देने के लिए इसके भी पार चले गए। मोदी ने संविधान के प्रति अपनी वचनबद्धता पर जोर दिया तथा समय-समय पर उन्होंने इसे रेखांकित भी किया। किसी के साथ प्राथमिकता वाला व्यवहार करने के कारण राज्य उससे पार चला गया जिसकी पेशकश संविधान ने की थी। इस तरह एक बड़ा वर्ग, जिसके साथ ऐसा प्राथमिकता वाला व्यवहार नहीं किया गया, वह छूट गया। मिसाल के तौर पर एक समुदाय को उत्सव पर बिजली प्रदान करना तथा बहुसंख्यक को नहीं देना। गांधी जी और उनके अनुयायियों ने बहुसंख्यकों के साथ प्राथमिकता वाला व्यवहार नहीं किया तथा सभी समुदायों में समानता की चिंता नहीं की। अल्पसंख्यकों के प्रति उनका प्राथमिकता वाला व्यवहार इरादे के साथ किया गया। लेकिन मोदी ने संविधान के प्रति वचनबद्धता दिखाई जो कि राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करता है। अल्पसंख्यकों से बिना कोई पक्षपात किए प्राथमिकता वाले व्यवहार को हटाया गया, संविधान के प्रति वचनबद्धता दिखाई गई, बहुसंख्यकों से समान व्यवहार हुआ और अल्पसंख्यकों का विश्वास भी जीता गया। मोदी के बारे में गलत सूचनाएं फैलाई गईं तथा उन्हें हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति के रूप में प्रतिस्थापित किया गया। मोदी ने यह आश्वासन देना जारी रखा कि वह संविधान का पालन करेंगे, किंतु दूसरी ओर विपक्ष में किसी ने भी उन पर विश्वास नहीं किया। अंतरराष्ट्रीय प्रेस ने निर्दयतापूर्वक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में डिजाइन किया जो धर्म के आधार पर राज्य की स्थापना के प्रति कटिबद्ध है। इसकी सबसे बुरी मिसाल टाइम पत्रिका है जिसने उन्हें अपने पहले पृष्ठ पर फोटो के साथ भारत के विभाजक के रूप में चित्रित किया। इस संबंध में आलेख एक ऐसे पत्रकार ने लिखा जिसका संबंध पाकिस्तान से है। कानून और संविधान के प्रति समर्पित व्यक्ति के खिलाफ गलत जानकारियां फैलाने के साथ उनके खिलाफ षड्यंत्र रचने की रणनीति भी अपनाई गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके खिलाफ दुष्प्रचार चलाया गया जो कि गलत सूचनाओं पर आधारित था। मोदी के खिलाफ कई विशेषज्ञों का अभियान भी चला। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने उनको आर्थिक मोर्चे पर खूब घेरा। इसी तरह अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी मोदी की आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना की तथा उनके खिलाफ अभियान चलाया। उधर राहूल गांधी के गुरु सैम पित्रौदा, जो कि ‘हुआ तो हुआ’ जैसी विवादास्पद टिप्पणी के कारण खुद ही घिर गए, ने भी इस अभियान में भूमिका निभाई।

इन सभी लोगों ने उस शख्स के खिलाफ खूब दुष्प्रचार किया जो कि राष्ट्र की सेवा में स्वार्थरहित होकर काम कर रहा है। आखिर में इन सब के आरोपों को झुठलाते हुए मोदी ने सफलता हासिल कर ली। इस चुनाव में हारे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, वामपंथी तथा आम आदमी पार्टी के नेताओं के पास मोदी की इस जीत की व्याख्या में कुछ भी कहने को नहीं है। लालू, देवेगौड़ा, माया, ममता, केजरीवाल, चंद्रबाबू नायडू व पवार जैसे नेता मोदी की इस सुनामी में कहीं बह गए। किंतु क्यों? मोदी की जीत के कई कारण हो सकते हैं, किंतु इसका प्रमुख कारण मोदी का ‘सबका साथ सबका विकास’ वाला नारा है। उनका वादा है कि सबको स्पोर्ट किया जाएगा, सबका विकास किया जाएगा तथा किसी से भी पक्षपात नहीं होगा। उनका यह नारा उन्हें जीत दिलाता दिख रहा है। उन्हें पूरे भारत में बड़े पैमाने पर वोट मिले।

हिमाचल के एक दूरवर्ती क्षेत्र में मोदी को वोट करने वाली जनजातीय महिला जरीना से मैंने इस संबंध में बात की। वह कुछ समय के लिए चुप रहती है, फिर साफ कहती है कि मोदी के लिए वोट दिया। उसकी पीढ़ी में कांग्रेस के लिए वोट पड़ते रहे, इसके बावजूद वह मोदी के लिए वोट करती है। बड़े स्तर पर मुसलमानों ने भी मोदी के पक्ष में मतदान किया, जिन्होंने राजनीति के गांधी मॉडल के स्थान पर मोदी मॉडल स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि यूपी में एक महिला ने मोदी की प्रशंसा में अपने पुत्र का नाम नरेंद्र रख लिया। अब मोदी ने सबका साथ सबका विकास के अपने नारे में सबका विश्वास भी जोड़ लिया है। वह सबका विश्वास जीतने की कोशिश करेंगे।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

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