एक उपेक्षित देशभक्त हरनाम सिंह

पीएन शर्मा

लेखक, धर्मशाला से हैं

 

हालांकि अपने गांव में वह युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए। उन्होंने अपने गांव में सेवाकार्य और कई कल्याणकारी गतिविधियां की, बावजूद इसके उन्हें कभी स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं दिया गया और न ही इस वीर सिपाही ने कभी पेंशन के लिए शासन के आगे आवेदन किया। उनके गांव वालों ने उन्हें नंबरदार के रूप में चुना। इसके बाद 1947 में देश का विभाजन हो गया। हरनाम के गांव के निवासियोंमें 40 प्रतिशत मुसलमान थे। उनकी सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए हरनाम ने उन्हें अपनी हवेली में आश्रय दिया….

देशवासियों के दिल में ब्रिटिश शासन के खिलाफ ज्वाला भड़काने वाले कई शुरुआती नायकों के बारे में हम सुनते-पढ़ते हैं, परंतु इसी कड़ी के कुछ नायक ऐसे हैं, जिन्हें भारत के गौरवमयी इतिहास में मुश्किल से जगह मिल पाई है। ऐसे ही एक देशभक्त का नाम धर्मशाला की वादियों से जुड़ा है, जिन्हें उनके गांववासियों ने तो याद रखा है, परंतु देशभक्तों की सूची में इनका नाम कम ही लिया जाता है। देशभक्ति की भावना को खुद में समेटे हवलदार हरनाम सिंह धर्मशाला शहर से सटते गांव सराहा (हिमाचल प्रदेश) के एक अविस्मरणीय सैनिक और स्वतंत्रता सेनानी थे, जो अपने उज्ज्वल भविष्य की खोज में, आत्मसम्मान, गौरवान्वित भविष्य और अनुशासित जीवन के लिए ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हो गए। यह वह सैनिक थे, जिन्होंने अपने दो सैनिकों के साथ अभद्र व्यवहार, अशोभित वाणी का प्रयोग करने, जो कि सीधे तौर पर भारतीयों की मान प्रतिष्ठा और शौर्य-पराक्रम पर आघात था, पर अंग्रेज कर्नल पर परेड ग्राउंड में ही बट से हमला कर दिया। 1912 में जन्मे हरनाम सिंह ने वर्ष 1932 में पंजाब रेजिमेंट में बतौर सैनिक सेवाएं शुरू की। अत्यंत परिश्रमी, अपने पेशे में अनुभवी और कुशल, सेना के प्रति वफादारी के कारण हरनाम को अपनी सेवा के लगभग चार वर्ष में हवलदार का पद प्राप्त हो गया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1939-45 तक उन्होंने बेल्जियम, बर्मा, सिंगापुर और मलाया में एक बहादुर और होनहार सैनिक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। जब तक उनकी यूनिट मेरठ सेंटर में वापस आई, तब हरनाम को हवलदार मेजर के रूप में पदोन्नत किया गया, जो कि उस समय सेना में अति विश्वसनीय और उत्तरदायित्त्व का पद माना जाता था, जिसके ऊपर 850 जवानों में अनुशासन बनाए रखने, कार्यकुशलता, वफादारी इत्यादि की जिम्मेदारी थी। जबकि नेता जी सुभाष चंद्र बोस के इंडियन नेशनल आर्मी जवानों के शोषण के कारण देशभक्ति की ज्वाला ब्रिटिश इंडियन जवानों में भी फैल गई। ब्रिटिश अधिकारी का कोई भी अपमानजनक व्यवहार आक्रामक होने को प्रोत्साहित कर सकता था। प्रोविडेंस ने पंजाब रेजिमेंट के युवा हवलदार को एक ऐसा ही अवसर प्रदान कर दिया। एक दिन सुबह परेड के दौरान ब्रिटिश कर्नल ने सबके सामने दो जवानों का अपमान किया। हरनाम सिंह ने इस पर आपत्ति जताई और विरोध के रूप में अपने सुपीरियर के साथ असंतोष व्यक्त किया, जिसने खुद बटालियन हवलदार मेजर पर अनियंत्रित रोष जताया। हरनाम ने एक राइफल जब्त की और इसके बट को पकड़कर जोर से चिल्लाया ‘भारत माता की जय’। कर्नल एक कायर की तरह डर के मारे परेड ग्राउंड से भागकर सेना के लिए बने बैरेक में जा छिपा। हरनाम को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और अदालत द्वारा मुकद्दमे की सुनवाई के दौरान पंद्रह दिनों के लिए हिरासत में ले लिया। फायरिंग स्क्वैड से उसे मौत की सजा सुनाई गई। हालांकि सैनिकों की ओर से गंभीर और भयावह विद्रोह उत्पन्न होने के डर से अधिकारियों ने उन्हें माफी मांग कर मामले को रफा-दफा करने को कहा, ताकि सजा में थोड़ी कमी की जा सके। देशभक्त हरनाम को मौत का कोई भय नहीं था, इसलिए उसने ब्रिटिशों के इस लुभावने लॉलीपोप को ठुकरा दिया। इसके बाद उन्हें बिना किसी पेंशन लाभ और पदक-पुरस्कारों के ही सेवा से मुक्त कर दिया गया। यह बहादुर सिपाही खाली हाथ ही सेवा से मुक्त कर दिया गया और वक्त व इत्तफाक ऐसा कि घर पहुंचने पर उनका घर भी खाली पड़ा था, क्योंकि उनके माता-पिता तथा उनकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। अपनी सेवा से भी खाली हाथ लौट आए देशभक्त को अपने खाली घर में भी किसी की चहलकदमी और आवाज सुनने को नहीं मिली। इस तरह बर्खास्त किए हवलदार को आजादी तक मिलिट्री पुलिस और ब्रिटिश सेना में रखा गया था।

हालांकि अपने गांव में वह युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए। उन्होंने अपने गांव में सेवाकार्य और कई कल्याणकारी गतिविधियां की, बावजूद इसके उन्हें कभी स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं दिया गया और न ही इस वीर सिपाही ने कभी पेंशन के लिए शासन के आगे आवेदन किया। उनके गांव वालों ने उन्हें नंबरदार के रूप में चुना। इसके बाद 1947 में देश का विभाजन हो गया। हरनाम के गांव के निवासियों में 40 प्रतिशत मुसलमान थे। उनकी सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए हरनाम ने उन्हें अपनी हवेली में आश्रय दिया। उन मुस्लिमों की जिम्मेदारी लेते हुए हरनाम ने अपने भरोसेमंद सौ सिपाहियों को साथ लेकर इन्हें कांगड़ा के रेलवे स्टेशन पर पहुंचाया। जब वे कांगड़ा के लिए मार्च निकाल रहे थे, तो एक अर्धविक्षिप्त आदमी ने चैतड़ू गांव में हरनाम सिंह पर अपनी बंदूक से गोली चलाई, लेकिन वह निशाना चूक गया और हरनाम सिंह रहस्यमयी ढंग से बच गए। इस पर हरनाम सिंह उस आदमी पर चीते की तरह झपट पड़े, उससे हथियार छीन लिया, हथियार में से गोली बाहर निकाली, उसे अपनी जेब में डाला और खाली बंदूक को साथ बहती खड्ड में फेंक दिया।

यह एक प्रशिक्षित जवान के दिमाग की उपस्थिति और विकट स्थिति में त्वरित कार्रवाई की एक मिसाल है। हरनाम सिंह का उसके गांव में 2 सितंबर 2005 को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। भले ही हरनाम सिंह का देशभक्तों की सूची में नाम बहुत कम या नहीं देखने को मिलता है, फिर भी अपने गांव के लिए आज भी वह प्रेरणा बने हुए हैं। उनके हौसले, देशभक्ति की भावना और देश को गुलामी की जंजीरों में जकड़ने वाले ब्रिटिशों के प्रति गुस्से के भाव ने उस समय युवाओं को अवश्य ही प्रेरणा दी होगी।

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