कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई घातक

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

मैंने जब कांग्रेस के राज्य बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ से इस्तीफा दिया था तो सोनिया गांधी को लिखा था कि पार्टी में ग्रास रूट कैडर के विकास की सख्त जरूरत के साथ यह भी जरूरत है कि इसमें विचार-विनिमय को प्रश्रय दिया जाए, फीडबैक की खुली शेयरिंग  होनी चाहिए जिसकी मुझे पार्टी में कमी महसूस हुई तथा मुझे लगा कि पार्टी में कोई भी ऐसा नहीं है जो उसे बचाना अथवा मजबूत करना चाहता है। मुझे सोनिया गांधी से इस संबंध में कोई जवाब नहीं आया, स्वस्थ आलोचना को मान देने के बजाय पार्टी में चापलूसी वाली संस्कृति का जमावड़ा हो गया। लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद पार्टी कई दशकों से प्राइवेट लिमिटिड कंपनी की तरह काम कर रही है। एक राजनीतिक दल के रूप में इसकी ऊर्जा का लोगों में से विकास होना चाहिए था, इसके बजाय इसकी शक्ति एक परिवार के हाथों में केंद्रित हो गई…

एओ ह्यूम द्वारा 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज अस्तित्व का संकट झेल रही है। हाल के लोकसभा चुनाव में इसे कई राज्यों में एक सीट तक नहीं मिली तथा इसके सात पूर्व मुख्यमंत्री भी चुनाव हार गए। इसका नेतृत्व अपने अंदरूनी संकट का समाधान करने में विफल रहा है। कांग्रेस को अब सशक्त आत्म-मूल्यांकन के लिए अपने भीतर देखना चाहिए तथा आगे बढ़ने का रास्ता ढूंढना चाहिए। यह दुखद है कि ऐसा करने के बजाय वह निरंतर भाजपा को दोष देती रहती है अथवा अपनी बुरी स्थिति के लिए ईवीएम पर सवाल करती रहती है। वे बात करते हैं कि भाजपा देश के संवैधानिक संस्थानों को नष्ट कर रही है, जबकि वे स्वयं सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, जनरल या स्वयं संविधान जैसी संस्थाओं का अपमान करने में लगे हैं। संसद का खुल्लम-खुला अपमान, जो इसकी कार्यशैली को कुंद करता है, तथा इसके निर्णयों के प्रति अपमान की भावना भविष्य में इसकी प्रगति में योगदान करने वाली नहीं है क्योंकि ऐसे ही प्रश्नों का सामना उसे स्वयं भी करना होगा।

अब जबकि कांग्रेस नीचे की ओर जा रही है, यह वह समय है जब पार्टी को आत्मावलोकन करना चाहिए। उसे पार्टी में विचारों की शेयरिंग को बढ़ावा देना चाहिए, सच्चाई का सामना करना चाहिए तथा आत्म-भ्रम के प्रति आसक्ति को छोड़ देना चाहिए। दुखद यह है कि पार्टी चमकीले पथ पर आगे बढ़ने के बजाय इसके उलट कर रही है। मैं महसूस करता हूं कि देश एक जिम्मेवार विपक्ष के बिना नहीं चल सकता तथा केवल कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो एक पूरी तरह जानकार, बौद्धिक तथा नैतिक रूप से शक्ति संपन्न विपक्ष की भूमिका अदा कर सकती है। मैंने जब कांग्रेस के राज्य बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ से इस्तीफा दिया था तो सोनिया गांधी को लिखा था कि पार्टी में ग्रास रूट कैडर के विकास की सख्त जरूरत के साथ यह भी जरूरत है कि इसमें विचार-विनिमय को प्रश्रय दिया जाए, फीडबैक की खुली शेयरिंग  होनी चाहिए जिसकी मुझे पार्टी में कमी महसूस हुई तथा मुझे लगा कि पार्टी में कोई भी ऐसा नहीं है जो उसे बचाना अथवा मजबूत करना चाहता है। मुझे सोनिया गांधी से इस संबंध में कोई जवाब नहीं आया, स्वस्थ आलोचना को मान देने के बजाय पार्टी में चापलूसी वाली संस्कृति का जमावड़ा हो गया। लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद पार्टी कई दशकों से प्राइवेट लिमिटिड कंपनी की तरह काम कर रही है। एक राजनीतिक दल के रूप में इसकी ऊर्जा का लोगों में से विकास होना चाहिए था, इसके बजाय इसकी शक्ति एक परिवार के हाथों में केंद्रित हो गई। इस चुनाव में जो प्रचार अभियान चला, उससे भी यह बात और ज्यादा स्पष्ट तथा वास्तविक रूप में नजर आई। भाई-बहन को छोड़कर किसी भी संगठित टीम ने इस बार प्रचार अभियान नहीं चलाया। पार्टी की कार्यशैली का सबसे बुरा पक्ष यह रहा कि इसके नेता आपस में झगड़ते रहे तथा वे संयुक्त रूप से अपने विरोधियों के साथ भिड़ते नजर नहीं आए। वे कोई साझा जमीन तैयार नहीं कर पाए। भाजपा का सामना कर रही कांग्रेस एकजुट नजर नहीं आई तथा पार्टी नेताओं ने एकता का मुखौटा पहना जरूर, परंतु जमीनी स्तर पर यह एकता नजर नहीं आई। कई मसलों पर वे स्वयं ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई दिए। इस परिप्रेक्ष्य में अगर हम देखें तो पार्टी के भीतर जो चल रहा था, वह इस बात की ओर इशारा करता है कि पार्टी विभाजित थी और इसके नेता हर कहीं एक-दूसरे से लड़ रहे थे। इस संबंध में हम राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल जैसे उत्तरी राज्यों की मिसाल लेते हैं। राजस्थान में सचिन पायलट व अशोक गहलोत दो ध्रुवों पर नजर आए। अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सहमति बनाना ही कांग्रेस हाईकमान के लिए किसी अग्नि-परीक्षा से कम नहीं था। हरियाणा में हुड्डा के लिए बंसीलाल की बहू किरन चौधरी आंखों में खटकती रही। पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू के कैप्टन अमरेंद्र सिंह सरकार में शामिल होने तक कोई समस्या नहीं थी।

पंजाब में कांग्रेस की सफलता का श्रेय बहुत हद तक कैप्टन अमरेंद्र सिंह को जाता है जिन्होंने अपने प्रभावशाली नेतृत्व का प्रमाण पेश किया। इसी कारण वे उन अकालियों पर अपनी बढ़त बना पाए जो विधानसभा चुनाव में हार के बाद अपने लिए अनुकूल माहौल नहीं बना पाए। इसके बावजूद कैप्टन अमरेंद्र की नवजोत सिंह सिद्धू से लड़ाई चुनाव के बाद जगजाहिर हो गई जब कैप्टन ने आरोप लगाया कि कई शहरी सीटें हम सिद्धू के कारनामों के कारण हार गए। उन्होंने यह भी कहा कि सिद्धू का पाकिस्तान के जनरल के साथ जफ्फी मारना कांग्रेस के लिए नुकसानदायक रहा। कांग्रेस की ऐसी ही स्थिति हिमाचल में भी दिखी। यहां कांग्रेस के बड़े नेता वीरभद्र सिंह को पार्टी के पूर्व अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू की कार्यशैली पसंद नहीं आई। ये दोनों एक-दूसरे से नजरें मिलाने से भी बचते रहे।

हालांकि पार्टी ने सुक्खू को हटाकर तथा कुलदीप सिंह राठौर को पार्टी का राज्य अध्यक्ष बनाकर इस मसले को सुलझाने का प्रयास भी किया, किंतु जब तक राठौर ने कार्यभार संभाला, तब तक काफी देर हो चुकी थी। इस सब के बावजूद राठौर को कमजोर करने की उस समय कोशिश हुई जब हाईकमान ने मंडी सीट से एक नए चेहरे को मैदान में उतार दिया, जबकि पार्टी के पास कौल सिंह ठाकुर जैसे बड़े चेहरे मौजूद थे। अब कांग्रेस के लिए वह समय है जब उसे भाजपा या किसी अन्य को दोष देते हुए आरोप लगाने के बजाय अपने भीतर देखना चाहिए तथा पार्टी की बेहतरी के लिए बड़े कदम उठाने चाहिए। पार्टी का नेतृत्व अब तक कई मामलों में विफल रहा है तथा उसे अब खुशामदी संस्कृति को दूर फेंक अंतर्दृष्टि विकसित करके आगे बढ़ना होगा।

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