तुम कब ठहरोगे?

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

कलिंग युद्ध के बाद युद्ध क्षेत्र में क्षत-विक्षत लाशें और विधवाओं के हाहाकार से त्रस्त सम्राट अशोक ने भी खुद से ही पूछा – तुम कब ठहरोगे? अब शायद यही प्रश्न हमें आज के शासकों से पूछना है। हर शासक चाहता है कि वह अनंत समय तक राज करे। उसके राज्य में उसके विरुद्ध सिर उठाने वाला कोई न हो। एकछत्र राज की ललक ही उस शासक का सपना बन जाता है और वह अपनी सत्ता को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है। ऐसा शासक वस्तुतः अपने ही सिंहासन का दास बन जाता है। पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच का हिंसक संग्राम सिंहासन की इसी दासता की कहानी है…

सम्राट अशोक को हम महात्मा बुद्ध के शिष्य, बौद्ध धर्म के महान प्रचारक और शांतिदूत के रूप में जानते हैं। इतिहास में दर्ज है कि सम्राट अशोक अपने ही भाइयों का संहार करके राजा बने थे। वह युवा थे, वीर थे और महत्त्वाकांक्षी थे। राजा बनने के बाद वह चक्रवर्ती सम्राट बनना चाहते थे और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए चलाए गए विजय अभियान में उन्होंने विभिन्न राजाओं को हराया। उनका अंतिम युद्ध एक छोटे से राज्य कलिंग के साथ था। कलिंग की सेना ने सम्राट अशोक की सेना का डटकर मुकाबला किया और उनके योद्धा युद्ध में खेत रहे। युद्ध में विजय से फूले नहीं समाए सम्राट अशोक ने जब युद्ध क्षेत्र का दौरा किया, तो वहां मची मार-काट देखकर उनका मन हाहाकार कर उठा। कलिंग का वह युद्ध उनके जीवन में ऐसे परिवर्तन का कारण बना कि उन्होंने हमेशा के लिए हिंसा से मुंह मोड़ लिया और शांति के पुरोधा बन गए। कलिंग के इस युद्ध के बाद ही वह महात्मा बुद्ध के शिष्य बने और बौद्ध धर्म स्वीकार करके वह जनहित तथा धर्म प्रचार के काम में जुट गए। यहां तक कि उन्होंने अपने बच्चों को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भारत से बाहर भी भेजा। महात्मा बुद्ध का जीवन ही नीति कथा के समान है। उनके साथ घटी घटनाएं हमें सीख देने के लिए काफी हैं। सम्राट अशोक के प्रेरणा स्रोत बनने के अलावा भी महात्मा बुद्ध ने हजारों-हजार लोगों को प्रभावित किया।

यही कारण है कि बुद्ध धर्म आज भी न केवल जीवित है, बल्कि बुद्ध धर्म के अनुयायी अपनी प्राचीन परंपराओं पर भी कायम हैं। महात्मा बुद्ध की प्रेरणा से डाकू से दयावान इनसान बनने की एक और कथा बहुत प्रसिद्ध है। डाकू अंगुलिमाल राहगीरों को लूट लेता था और लोगों को डराए रखने के लिए लूटे हुए राहगीरों की अंगुली काट लेता था। ऐसे काटी गई अंगुलियों की माला बनाकर वह गले में पहने रहता था। डाकू  अंगुलिमाल का खौफ ऐसा था कि राहगीर उसके सामने बेबस हो जाते थे। एक दिन महात्मा बुद्ध उसी राह से गुजर रहे थे, जिधर डाकू अंगुलिमाल रहता था। अपनी आदत के मुताबिक डाकू अंगुलिमाल ने उन्हें ठहर जाने के लिए आवाज दी, पर महात्मा बुद्ध ठहरे नहीं, चलते रहे। डाकू अंगुलिमाल ने महात्मा बुद्ध को रुकने के लिए दोबारा आवाज लगाई, लेकिन महात्मा बुद्ध अब भी शांत भाव से चलते रहे। इससे खफा होकर अंगुलिमाल ने अपनी कटार निकाली और कूद कर उनके सामने आ गया। कठोर स्वर में उसने महात्मा बुद्ध से पूछा – तुम ठहरे क्यों नहीं? महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और बोले – लो अंगुलिमाल, मैं तो ठहर गया, पर यह भी तो बताओ कि तुम कब ठहरोगे? यह एक ऐसा नीति वाक्य था, जिसने डाकू अंगुलिमाल की आंखें खोल दीं। उसे अपने अपराध का अहसास हो गया और उसने डाकू जीवन का परित्याग करके भिक्षु का बाना अपना लिया। ‘तुम कब ठहरोगे’ महात्मा बुद्ध का यह छोटा सा प्रश्न अंगुलिमाल जैसे क्रूर डाकू का जीवन बदलने में सक्षम हुआ। कलिंग युद्ध के बाद युद्ध क्षेत्र में क्षत-विक्षत लाशें और विधवाओं के हाहाकार से त्रस्त सम्राट अशोक ने भी खुद से ही पूछा – तुम कब ठहरोगे? अब शायद यही प्रश्न हमें आज के शासकों से पूछना है। हर शासक चाहता है कि वह अनंत समय तक राज करे। उसके राज्य में उसके विरुद्ध सिर उठाने वाला कोई न हो। एकछत्र राज की ललक ही उस शासक का सपना बन जाता है और वह अपनी सत्ता को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है। ऐसा शासक वस्तुतः अपने ही सिंहासन का दास बन जाता है। पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच का हिंसक संग्राम सिंहासन की इसी दासता की कहानी है। ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बने रहना चाहती हैं और नरेंद्र मोदी अपने सर्वाधिक मुखर विरोधी को सड़क पर ले आना चाहते हैं। दोनों शासक हैं, दोनों की लालसाएं समान हैं, दोनों गद्दी को बचाने के लिए कमर कसे हुए हैं और हर हद पार करने पर उतारू हैं। गत माह संपन्न लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने हर अस्त्र का प्रयोग किया। राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, सेना, हिंदू, राम मंदिर, गरीबों को लाभ देने वाली योजनाएं और मोदी-शाह का जलवा सब ने काम किया।

कयास था कि यह मोदी का कठिन दौर है और अर्थव्यवस्था की चुनौतियों के बावजूद जनता ने मोदी में विश्वास व्यक्त किया है, तो उसके तीन मुख्य कारण हैं। बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक वह तुरुप का पत्ता था, जिसने मोदी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। हिंदू हृदय सम्राट की छवि दूसरी वह बात थी, जिसने मोदी को मजबूती दी। मोदी के मुकाबले में विपक्ष का कोई विश्वसनीय विकल्प न होना भी मोदी के काम आया। देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा का झंडा बुलंद है। इसी वर्ष तीन और विधानसभा चुनाव संपन्न होंगे। इनमें हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड शामिल हैं। हरियाणा में हालांकि भाजपा की भारी जीत हुई है और बड़े-बड़े कांग्रेसी नेताओं ने मुंह की खाई है, तो भी कुछ दिग्गज मंत्रियों की सीटों पर भाजपा पिछड़ी है। ओम प्रकाश धनकड़, कैप्टन अभिमन्यु की सीटों के अलावा बेरी, सांपला, किलोई, महम और गुरुग्राम की तीन सीटों पर भाजपा पीछे रह गई। इसलिए भाजपा की रणनीति यह है कि विधानसभा चुनावों में भी एंटी-इन्कंबेंसी फैक्टर से बचने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को ही चुनाव का चेहरा बनाया जाए तथा उनके नाम पर ही वोट मांगे जाएं।

प्रधानमंत्री मोदी आज लगभग सर्वशक्ति संपन्न एकछत्र राजा हैं। वह कोई भी कानून पास करवा सकते हैं, संविधान संशोधन करवा सकते हैं, संविधान को ही स्थगित कर सकते हैं। आज संसद, भाजपा, संघ में कोई मोदी के खिलाफ बोलने वाला नहीं है। मीडिया पहले से ही गिरवी है। मोदी की शैली ऐसी है कि हर कोई उनकी इच्छा का सम्मान करने के लिए बाध्य है। इसके बावजूद उनकी लालसा का कोई अंत नहीं है। आज अर्थव्यवस्था का हाल बेहाल है, रोजगार के साधन कम होते जा रहे हैं, रिजर्व बैंक के रिजर्व का सफाया हो चुका है, निर्यात डांवाडोल है, आयात बढ़ रहा है, देश पर कर्ज बेतहाशा बढ़ गया है। हम सिर्फ आशा ही कर सकते हैं कि अपने इस कार्यकाल में मोदी अपना राज्य बढ़ाने के साथ-साथ इन ज्वलंत समस्याओं के हल पर भी ध्यान देंगे। 

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