नौकरशाह डुबो रहे अर्थव्यवस्था

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

 

मेरा मानना है कि भारत सरकार में विश्व बैंक, अंतराष्ट्रीय मुद्राकोष और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अप्रत्यक्ष घुसपैठ इन रास्तों से हो रही है, जिसके कारण भारत सरकार अपने खर्चों को कम करने और निर्यातों को बढ़ाने की घातक नीति पर टिकी हुई है। सरकार को चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों को सरकार में लाए, जो कि भारत की जमीन एवं आम आदमी से जुडे़ हुए हैं…

 

बीते पच्चीस वर्षों में भारत की आर्थिक नीति विदेशी निवेश को आकर्षित करने एवं विदेशों को उत्पादित माल का निर्यात करने पर टिकी हुई है। इस नीति को वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने 1991 में लागू किया था और उसके बाद क्रमशः वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी सरकारों ने इस नीति को ही लागू किया है। इस नीति को विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 80 के दशक में बनाया था। इस नीति के अंतर्गत विचार यह है कि भारत को अपने सरकारी खर्चों यानी वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करना चाहिए, जिससे अर्थव्यवस्था में महंगाई न बढे़ एवं अर्थव्यवस्था में स्थायित्व बना रहे। अर्थव्यवस्था में स्थायित्व से विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश करने का उत्साह बनेगा, वे निवेश करके यहां सस्ते वेतन का लाभ उठाते हुए सस्ते माल का उत्पादन करेंगे और इसका भारी मात्रा में निर्यात करेंगे। यह नीति चीन ने 80 के दशक में बखूबी अपनाई थी और बहुत आगे बढ़ा था, लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप के सत्तारूढ़ होने के बाद अमरीका में बड़ी कंपनियों को टैक्स की छूट दी गई है। अमरीका में आर्थिक विकास को गति मिली है, जिसके फलस्वरूप अमरीका के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में वृद्धि की है। साथ-साथ अमरीका ने संरक्षणवाद का मंत्र अपनाया है। अमरीका ने चीन और भारत से आयात होने वाले माल पर आयात कर बढ़ाए हैं। अमरीका के इस परिवर्तन का हमारी आर्थिक नीति पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अमरीका में ब्याज दर बढ़ने से वैश्विक निवेशकों की रुचि भारत में निवेश करने के स्थान पर अमरीका के सुरक्षित माने जाने वाले बाजार में निवेश करने की हो रही है। संपूर्ण विश्व की पूंजी का पलायन अमरीका की तरफ हो रहा है। अपने देश की भी पूंजी आज अमरीका की तरफ पलायन कर रही है। दूसरी तरफ अमरीका द्वारा संरक्षणवाद अपनाए जाने से भारत के माल का निर्यात कठिन होने लगा है। इन दोनों परिवर्तनों के कारण विदेशी निवेश आकर्षित करने एवं उत्पादित माल का निर्यात करने की नीति, जिसे हमारी सरकारों ने बीते 25 वर्षों में लागू किया है, आज सफल नहीं हो रही है। इस समय जरूरत है कि सरकार अपने पूंजी खर्च बढ़ाए। हाई-वे, बिजली, वाई-फाई आदि में निवेश करे। सरकार के खर्च बढ़ने से कुछ महंगाई में वृद्धि अवश्य होगी, लेकिन मेरा मानना है कि यदि ये खर्च पूंजी निवेश में किए जाते हैं, तो इससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। विदेशी निवेश न भी आए, तो अपनी स्वदेशी पूंजी का निवेश बढे़गा। जब सरकार हाई-वे बनाने में निवेश करेगी, तो भारत के उद्यमी सीमेंट बनाने में निवेश करेंगे, क्योंकि सीमेंट की मांग बढ़ेगी। साथ-साथ हमें अपने आयात कर बढ़ाने चाहिए, जिससे हमारे आयात घटें। आयातों के घटने से घरेलू बाजारों में घरेलू माल बिकेगा, जो पुनः अपने देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। हमारे सामने आज दो विपरीत रास्ते उपलब्ध हैं। विश्व बैंक और हमारी बीते 25 वर्षों की सरकारों का रास्ता है कि भारत सरकार अपने खर्च कम करें, विदेशी निवेश को आकर्षित करे और उत्पादित माल का निर्यात करे। विकल्प है कि भारत सरकार अपने खर्चों में वृद्धि करे और अपनी पूंजी के निवेश पर ध्यान दे, जिससे घरेलू उत्पादन बढे़गा। मेरा सुझाव है कि बीते 25 वर्षों की नीति को त्याग कर एनडीए-2 सरकार को इस वैकल्पिक नीति को अपनाना चाहिए। यह वैकल्पिक नीति कोई नई सोच नहीं है, इस प्रकार के सुझाव अर्थशास्त्रियों द्वारा लगातार दिए जा रहे हैं, लेकिन भारत सरकार ने पिछले 25 वर्षों में इस नीति को तवज्जो नहीं दिया है। इसका कारण यह दिखता है कि भारत के नौकरशाहों के व्यक्तिगत हित विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़े हुए हैं। हमारे पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम पूर्व में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में काम करते थे और वह अमरीका के पैटर्सन इंस्टीच्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनामिक्स के फेलो हैं। नीति आयोग के प्रथम उपाध्यक्ष अरविंद पनगडि़या पहले एशियन डिवेलपमेंट बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री थे और वर्तमान में अमरीका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। हमारे रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुख्य अर्थशास्त्री थे और वर्तमान में यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के प्रोफेसर हैं। हाल में भारत सरकार में कार्यरत किसी आईएएस अधिकारी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक गुमनाम पत्र भेजा था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि किसी अंतरराष्ट्रीय सलाहकारी कंपनी द्वारा सरकार के नौ शीर्ष अधिकारियों के संबंधियों को नौकरी अथवा बडे़ ठेके दिए गए हैं। ऐसा सोचिए कि यदि आपकी बेटी किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रही हो, तो आपकी सहज ही प्रवृत्ति बनेगी कि ऐसी नीति को बढ़ाएं, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नुकसान न हो। इस प्रकार बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे अधिकारियों के संबंधियों को अच्छे वेतन पर नौकरी देते हैं, जिससे वे अप्रत्यक्ष रूप से भारत सरकार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में प्रभावित करते हैं। विदेशी ताकतों द्वारा भारत की नीति को प्रभावित करने का तीसरा रास्ता है कि सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों को सीधे बड़े ठेके देना।

भारत सरकार के किसी सेवानिवृत्त ऊर्जा सचिव ने बडे़ गर्व से किसी समय मुझे बताया था कि विश्व बैंक द्वारा उन्हें चालीस हजार रुपए प्रतिदिन की सलाहकारी का ठेका दिया गया है। ऐसे ठेके के लालच में वर्तमान आईएएस अधिकारियों की सहज ही प्रवृत्ति बनती है कि विश्व बैंक के इशारों के अनुसार नीतियों को लागू करें, जिससे उनके सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें विश्व बैंक द्वारा सलाहकारी दी जाए। भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं से जुडे़ हुए इन नौकरशाहों को नियुक्त करके यह सुनिश्चित किया है कि इनके द्वारा सलाह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में ही दी जाएगी। हमें याद रखना चाहिए कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में वर्चस्व अमरीका एवं यूरोप का है और इन देशों की सरकार अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बड़ी मुस्तैदी से साधती है।

भारत सरकार ने विदेशपरक व्यक्तियों को प्रमुख आर्थिक पदों पर नियुक्त करके यह सुनिश्चित किया है कि ये लोग भारत के हितों को न बढ़ाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बढ़ाएंगे। मेरा मानना है कि भारत सरकार में विश्व बैंक, अंतराष्ट्रीय मुद्राकोष और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अप्रत्यक्ष घुसपैठ इन रास्तों से हो रही है, जिसके कारण भारत सरकार अपने खर्चों को कम करने और निर्यातों को बढ़ाने की घातक नीति पर टिकी हुई है। सरकार को चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों को सरकार में लाए, जो कि भारत की जमीन एवं आम आदमी से जुडे़ हुए हैं। जैसे विनोबा ने कहा था कि आर्थिक नीति का मूल्यांकन इस मानदंड पर करना चाहिए कि अंतिम व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है। तब ही देश की नीतियां ठीक हो सकेंगी।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

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