बंगाल में ममता की माया

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

 

सड़क पर कोई बंगाली जय श्री राम कहता हुआ मिल गया, तो ममता दीदी ने अपनी कार से उतर कर उन्हें सबक सिखाने की धमकियां देनी शुरू कर दीं। इफ्तार पार्टियों का आयोजन कर वहां अवैध बांग्लादेशियों को आश्वस्त करना शुरू किया कि जो हमसे टकराएगा, वह चूर-चूर हो जाएगा। इतना ही नहीं, जब इन अवैध बांग्लादेशियों ने बंगालियों की हत्या करनी शुरू की, तो ममता दीदी की पुलिस ने मुंह फेर लिया। यह भी कहा जाता है कि पुलिस इन अवैध बांग्लादेशियों को बचाने का प्रयास करती है। इतना ही नहीं, ममता संदिग्ध चरित्र के पुलिस अधिकारियों के समर्थन में धरने तक पर बैठने लगीं…

पश्चिम बंगाल में अराजकता का साम्राज्य फैलता जा रहा है। वैसे तो वहां राजनीतिक हत्याओं का दौर काफी अरसे से जारी है। पिछले साल हुए पंचायत और शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव में बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र तक राजनीतिक हिंसा की चपेट में थे। उस हिंसा में भी कुछ लोग मारे गए थे, लेकिन अभी हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान उसी हिंसा का विस्तार हुआ और कुछ और लोगों को प्राण गंवाने पड़े। तब लगता था कि चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक हिंसा का यह दौर थम जाएगा, लेकिन बंगाल के दुर्भाग्य से वह दौर थमने की बजाय विकराल रूप धारण करता जा रहा है। इस हिंसा में भारतीय जनता पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। सबसे दुख की बात तो यह है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस हिंसा को रोकने की बजाय इसे चुनाव परिणामों का स्वाभाविक परिणाम मानती नजर आ रही हैं। लगता है बंगाल सरकार या तो इस हिंसा को परोक्ष प्रश्रय दे रही है या कम से कम उसे रोकने में उसकी कोई रुचि नहीं है। यदि राजनीतिक भाषा में ही कहना हो तो ममता ‘दीदी’ लगता है बंगाल के लोगों को भाजपा का समर्थन करने के लिए राजनीतिक सबक सिखाना चाहती हैं। दरअसल लोकसभा चुनाव के परिणामों ने ममता दीदी का राजनीतिक रोडमैप हवा में उड़ा दिया है, जिसके कारण उनकी निराशा व हताशा राजनीतिक हिंसा में फलित हो रही है।

ममता दीदी को आशा थी कि लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा और विपक्ष की जोड़-तोड़ की सरकार ही बनेगी। उस जोड़-तोड़ की सरकार में प्रधानमंत्री वही बन पाएगा, जिसके पास लोकसभा में कम से कम चालीस-पचास सीटें होंगी। चालीस-पचास सीटों की आशा केवल तीन दल ही कर सकते थे। बंगाल में ममता और उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव या मायावती, लेकिन ममता के सौभाग्य से अखिलेश की पार्टी  केवल 35 सीटों पर लड़ रही थी और मायावती की पार्टी की भी यही स्थिति थी। इनमें से कोई पार्टी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतेगी, तो तीस के आसपास जीत लेगी। आंध्र प्रदेश के पुराने मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू यदि प्रदेश की सभी सीटें भी जीत लेते, तो पच्चीस पर ही अटक जाते, क्योंकि प्रदेश में कुल मिलाकर लोकसभा की पच्चीस सीटें ही हैं। ऐसी स्थिति में ममता के पास भारतीय राजनीति के जोड़-तोड़ के युग का तुरुप का पत्ता था, बंगाल की बयालीस सीटें। यदि वह इन सीटों पर कब्जा कर लेतीं, तो उनके प्रधानमंत्री बनने के चांस काफी बढ़ जाते। वह जानती थीं कि राष्ट्रीय दल होने के कारण सोनिया गांधी के पुत्र राहुल गांधी की पार्टी उससे ज्यादा सीटें जीत सकती थी, लेकिन ममता को इस बात का भी यकीन था कि राहुल गांधी को अन्य विपक्षी दल प्रधानमंत्री बनाने के लिए तैयार नहीं होंगे। कर्नाटक विधानसभा में सोनिया और राहुल गांधी की पार्टी के पास कहीं ज्यादा विधायक हैं, लेकिन मुख्यमंत्री तो जेडीएस का कुमारस्वामी ही बन पाया, जिसके पास बमुश्किल पैंतीस विधायक हैं। जेडीएस ने मां-बेटे को बस इतना ही बताया यदि जेडीएस को समर्थन नहीं दोगे, तो भारतीय जनता पार्टी आ जाएगी। बस इसी एक पेंच के कारण अस्सी के आसपास विधायकों वाले मां-बेटे की पार्टी बाहर बैठी है और पैंतीस विधायकों वाले कुमारस्वामी मजे से मुख्यमंत्री बने घूमते हैं। ममता भी इसी पेंच के बल पर प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रही थीं। उनको केवल इतना करना था कि किसी तरह से भी बंगाल से लोकसभा की बयालीस सीटें जीतनी थीं। ममता को यह संभव भी लगता था, क्योंकि आज की तारीख में बंगाल में मां-बेटे की तथाकथित कांग्रेस और साम्यवादियों के टोले का बंगभूमि से लगभग सफाया हो गया है। ममता दीदी ने अपनी जीत को और भी सुनिश्चित करने के लिए अवैध बांग्लादेशियों की लाखों की फौज को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया था। बंगालियों को अपने झोले में मान कर ममता बनर्जी बांग्लादेशियों को साधने का तांत्रिक अनुष्ठान कर रही थीं, लेकिन इस अनुष्ठान में अचानक जो एक बाधा दिखाई देने लगी, वह थी भारतीय जनता पार्टी।

शुरू में तो ममता यह मानकर चलती थीं कि भाजपा गैर बंगाली पार्टी है, इसलिए बंगाल के सीमांत पर एक-दो सीटें जीत ले, तो जीत ले अन्यथा बंगाल में उसकी दाल नहीं गलेगी। यद्यपि जल्दी ही ममता को एहसास हो गया कि अब बंगाल में वह स्वयं बांग्लादेशियों की लीडर मान ली गई हैं और बंगाल की अस्मिता का संबंध भाजपा से जुड़ गया था। इस मरहले पर ममता को किसी एक का चुनाव करना था, बंगालियों या फिर बांग्लादेशियों का। संकट की उस घड़ी में ममता ने अवैध बांग्लादेशियों पर विश्वास किया, बंगालियों पर नहीं। उसका जो परिणाम आना था, वही आया। भाजपा ने बंगाल से लोकसभा की अठारह सीटें जीत लीं और ममता केवल 22 सीटें बचा पाईं। यदि अवैध बांग्लादेशियों को वोट देने का अधिकार न होता, तो ममता शायद पांच-सात से आगे न बढ़ पातीं। इस हार से ममता कम से कम एक सबक तो सीख ही सकती थीं कि अवैध बांग्लादेशियों के संरक्षण का काम छोड़कर पुनः बंगालियों की ओर वापस मुड़तीं, लेकिन उन्होंने निराशा और गुस्से में आकर बंगालियों की ही प्रताड़ना शुरू कर दी।

सड़क पर कोई बंगाली जय श्री राम कहता हुआ मिल गया, तो ममता दीदी ने अपनी कार से उतर कर उन्हें सबक सिखाने की धमकियां देनी शुरू कर दीं। इफ्तार पार्टियों का आयोजन कर वहां अवैध बांग्लादेशियों को आश्वस्त करना शुरू किया कि जो हमसे टकराएगा, वह चूर-चूर हो जाएगा। इतना ही नहीं, जब इन अवैध बांग्लादेशियों ने बंगालियों की हत्या करनी शुरू की, तो ममता दीदी की पुलिस ने मुंह फेर लिया। यह भी कहा जाता है कि पुलिस इन अवैध बांग्लादेशियों को बचाने का प्रयास करती है। इतना ही नहीं, ममता संदिग्ध चरित्र के पुलिस अधिकारियों के समर्थन में धरने तक पर बैठने लगीं। यही कारण है कि आज बंगाल अराजकता का बहुत बड़ा केंद्र बन गया है। ममता को लगता है कि भारतीय जनता पार्टी बंगालियों के हितों के लिए खड़ी हो गई है, इसलिए उसके गुस्से का शिकार भी सबसे ज्यादा भाजपा ही हो रही है।

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