विदेशी आक्रमणों के निहितार्थ

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

गुरु नानक देव जी सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगों की चर्चा करते हुए कहते हैं कि प्रत्येक युग में एक-एक वेद प्रमुख था, लेकिन कलियुग की तो गति निराली है। कलियुग में अथर्ववेद की प्रमुखता थी, लेकिन इस कालखंड तक आते-आते भारत का परिदृश्य बदल गया।  नीले वस्त्र पहन कर मध्य एशिया से तुर्क आए और उन्होंने भारत पर कब्जा कर यहां अपना शासन जमा लिया…

डा. भीमराव रामजी अंबेडकर ने सल्तनत काल में सुलतानों की निरंकुशता व भारतीयों के प्रति उनके व्यवहार का उल्लेख अपने ऐतिहासिक ग्रंथ ‘थाटस ऑन पाकिस्तान’ में किया है। उन्होंने महमूद गजनवी के  इतिहासकार अल उतबी को उद्धृत करते हुए लिखा ‘महमूद गजनवी ने मंदिरों में मूर्तियों को तोड़ा और इस्लाम की स्थापना की। उसने शहरों पर कब्जा किया और नापाक कमीनों को मार डाला। मूर्ति पूजकों को तबाह किया और मुसलमानों को गौरवान्वित किया। तदोपरांत वह घर लौटा और इस्लाम के लिए की गई विजयों का ब्यौरा दिया तथा यह संकल्प व्यक्त किया कि वह हर वर्ष हिंद के खिलाफ जिहाद करेगा’। (17)  भारत पर सैकड़ों साल से हमले करते रहे विदेशी चाहे मुसलमान थे, लेकिन वे अलग-अलग समुदायों के थे। मुसलमान कह देने भर से इस इतिहास को अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता। जब कोई एक मुस्लिम समुदाय भारत के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लेता था, तो मध्य एशिया से कोई दूसरा मुस्लिम समुदाय ही उसको पराजित कर स्वयं कब्जा कर लेने के लिए हमले करता था। इन हमलों में वह मुसलमानों को भी मारता था। कुछ इतिहासकार इसका निष्कर्ष यह निकालते प्रतीत होते हैं कि भारत पर इन मुसलमानी हमलों का अभिप्राय मजहबी नहीं था, बल्कि यह तो राजाओं के परस्पर युद्ध होते थे। ये मुसलमान आक्रांता मंदिरों पर हमले तो वहां का धन लूटने के लिए करते थे, उसका किसी मजहब से कुछ लेना-देना नहीं था, लेकिन भीमराव अंबेडकर ऐसा नहीं मानते। वह मानते हैं कि इन हमलों का उद्देश्य मजहबी भी था। उनके अनुसार ‘भारत पर मुसलमानों के हमले भारत के विरुद्ध हुए आक्रमण तो थे ही, साथ ही वे मुसलमानों में पारस्परिक युद्ध भी थे। यह तथ्य इसलिए छिपा रहा है, क्योंकि सभी आक्रांताओं को बिना किसी भेदभाव के सामूहिक तौर पर मुसलमान करार दिया जाता है, परंतु तथ्य यह है कि वे तातार, अफगान और मंगोल थे। मोहम्मद गजनी तातार था। मोहम्मद गौरी अफगानी था।

तैमूरलंग मंगोल था। बाबर तातार था, जबकि नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली अफगानी थे। अफगानों का भारत पर हमला करने के पीछे एक मकसद तातारों को तबाह करना था। मंगोल हमलावर तातारों और अफगानों दोनों को ही तबाह करना चाहते थे। वे परस्पर प्रेम भावना से संतुष्ट किसी ऐसे परिवार के अंग नहीं थे, जो मुस्लिम भाईचारे की भावना से एकजुट हो गया हो। वे एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे और उनके युद्धों का मकसद एक-दूसरे का सफाया करना भी था। मगर जिस बात को दिमाग में रखना महत्त्वपूर्ण है, वह यह है कि अपने इन सभी विवादों और संघर्षों के बावजूद  वे सभी एक सामूहिक उद्देश्य से प्रेरित थे। वह था- हिंदू धर्म का विध्वंस।’ (18) विदेशी सल्तनत काल में भारतीयों या हिंदुओं की हालत कैसी थी, इसका एक उदाहरण जियाउद्दीन बरनी की किताब ‘तारीखे फिरोजशाही’ में मिलता है। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के एक दिलचस्प संवाद को बरनी ने लिपिबद्ध किया है। खिलजी ने अपने समय के प्रसिद्ध काजी मुगीसुद्दीन से अपने राज्य में शरीयत के मामले में चर्चा की। उसने पूछा कि इस्लाम के शासन में हिंदू से कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? काजी मुगीसुद्दीन ने खुलासा किया ‘शरीयत की भाषा में हिंदू को खिराज गुजार कहा जाता है। इसका अर्थ है यदि कोई सरकारी कर्मचारी यानी महसल, हिंदू से टैक्स के रूप में चांदी मांगे, तो वह अत्यंत विनम्रता से बिना कोई उज्र किए सोना दे। यदि महसल उसके मुंह पर थूके, तो उसे चाहिए कि बिना घृणा किए अपना मुंह खोल दे, ताकि महसल उसके अंदर थूक सके। विशेष रूप से हिंदुओं को अपमानित करना मजहब के आवश्यक अंग में से इसलिए है कि ये मुस्तफा के सबसे बड़े शत्रु हैं। यही कारण है कि मुस्तफा अलैहिस्सलाम ने हिंदुओं को मार डालने या दास व बंदी बनाने का आदेश दिया है। या तो वे इस्लाम स्वीकार कर लें या फिर उनको मार दिया जाए। इनकी संपत्ति पर अधिकार कर लिया जाए।’ (19)  लेकिन देश के सारे हिंदुओं को मार देना तो संभव नहीं था। ये भारतीय ही तो सल्तनत की प्रजा घोषित कर दिए गए। प्रजा ही नहीं होगी, तो राज्य कैसे चल पाएगा? एक इस्लामी नरेश की प्रजा को अपने-अपने संप्रदायों यथा वैष्णव, शैव, शाक्त, के अनुसार का पालन करते देते रहना तो कुफर कहा जाएगा। इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता क्या हो सकता था? यह रास्ता अल्लाउद्दीन खिलजी ने निकाला था, जिसका उल्लेख वह स्वयं करता है। मौलवी मुगासुद्दीन की नसीहत सुन लेने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने अपने उत्तर में बताया कि उसने अपने राज्य में हिंदुओं की क्या दशा कर रखी है। ‘ऐ मौलाना मुगीसुद्दीन! तू पढ़ा-लिखा अवश्य है, लेकिन अनुभव नहीं रखता। मैं शिक्षित नहीं हूं, लेकिन अनुभव बहुत रखता हूं। यह बात अच्छी तरह समझ ले कि हिंदू उस समय तक मुसलमानों के मित्र और आज्ञाकारी नहीं होंगे, जब तक कि वे असहाय और निर्धन न हो जाएं। इसलिए मैंने आदेश दिया है कि प्रजा के पास कृषि उपज, दूध और दही आदि केवल उतनी मात्रा में रहना चाहिए जो कि उनकी सालभर की आवश्यकता के लिए पर्याप्त हो। उनके पास आवश्यकता से अधिक संपत्ति एकत्रित नहीं होनी चाहिए।’ (20) खिलजी की यह स्वीकारोक्ति उसके राज्य में भारतीयों की हालत की ओर संकेत करती है। कुल मिला कर उस समय विदेशी शासकों और हिंदुस्तान में शरीयत लागू करवाने के लिए सैयद मुल्ला-मौलवियों, फकीरों, सूफी कलंदरों द्वारा स्थापित अड्डों में भारतीयों को इस्लाम में मतांतरित करने का अभियान इतना तेजी पकड़ रहा था कि दशगुरु परंपरा के तीसरे गुरु श्री अमरदास जी को चेतावनी देनी पड़ी। उन्होंने कहा – जो अपने पूर्वजों को याद रखते हैं, उनकी पहचान और विरासत को संभालकर रखते हैं, उनकी संस्कृति और धर्म की रक्षा करते हैं, वे पूत से सपूत बन जाते हैं। ऐसे सुपुत्र उसी रास्ते पर चलते हैं, जो सतगुरु को अच्छा लगता है, जिसका निर्देश सतगुरु देते हैं। ऐसी सुयोग्य संतान वही कार्य करती है, जिसके पदचिन्ह सतगुरु बनाते हैं। स्मृतियां, शास्त्र, शुकदेव, व्यास और नारद आदि ऋषि भी यही कहते हैं कि अपनी विरासत को अपने पूर्वजों की गाथाओं को सदा स्मरण रखना चाहिए।

यही सत्य है और सत्य में मन लगाने से सत्य उपलब्ध होता है। पूर्वजों की गाथाएं ही सत्य हैं। उसी रास्ते पर चलकर सत्य का संधान होगा। ऐसे सुपुत्र ही सत्य का स्मरण करते हैं। पूर्वजों की गाथाओं, उनकी संस्कृति और विरासत पर चलने वाले जो लोग, सत्य के इस घेरे में आ जाते हैं, परमात्मा भी उन्हीं को स्वीकार करता है। ऐसी संतान ही अपने समस्त कुल और वंश के मोक्ष का कारण बनती है। नानक का स्वकथन – गुरु नानक देव जी के अपने विशाल काव्य में पंद्रहवीं शताब्दी की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिति को चित्रित देखा जा सकता है।

दरअसल गुरु जी ने अनेक स्थानों पर इस बात का जिक्र किया है कि भारतीयों पर इस्लाम का प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभाव पड़ रहा है। बहुत से भारतीय तो विदेशी लोदी मुगल शासकों को प्रसन्न करने के  लिए ही उनकी संस्कृति और सभ्यता की नकल करते हैं। गुरु नानक देव जी सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगों की चर्चा करते हुए कहते हैं कि प्रत्येक युग में एक-एक वेद प्रमुख था, लेकिन कलियुग की तो गति निराली है। कलियुग में अथर्ववेद की प्रमुखता थी, लेकिन इस कालखंड तक आते-आते भारत का परिदृश्य बदल गया।  नीले वस्त्र पहन कर मध्य एशिया से तुर्क आए और उन्होंने भारत पर कब्जा कर यहां अपना शासन जमा लिया। कलियुग में अथर्ववेद तो था, लेकिन इस युग में परमात्मा का नाम खुदा और अल्लाह हो गया। अब ईश्वर इसी नाम से पुकारा जाएगा। परशुराम चतुर्वेदी ने ‘उत्तरी भारत की संत परंपरा’ में इस पद की व्याख्या निम्न प्रकार से की है। अब हिंदुओं में से कोई वेद शास्त्रादि को नहीं मानता। अपितु अपनी ही बढ़ाई में लगा रहता है। उनके कान व हृदय सदा तुर्कों की धार्मिक शिक्षाओं से भरते जा रहे हैं और मुसलमान कर्मचारियों के निकट एक-दूसरे की निंदा करके लोग सबको कष्ट पहुंचा रहे हैं। वे समझते हैं कि रसोई के समय चौका लगा देने मात्र से हम पवित्र हो जाएंगे।

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