सड़क दुर्घटनाएं और नींद

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

 

26/11 की बदनाम आतंकवादी घटना में जहां 195 निर्दोष लोग मारे गए, वहीं भारतीय सड़कों पर हर रोज औसतन 390 लोग जान गंवाते हैं। यानी सड़कों पर हर रोज दो-दो 26/11 घटते हैं। दुखद सत्य यह भी है कि सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होने वाले आधे से ज्यादा लोग युवा पुरुष होते हैं, जिनमें से अधिकांश अपने परिवार के लिए रोटी कमाने वाले अकेले या मुख्य सदस्य होते हैं। इससे परिवार के परिवार तबाह हो जाते हैं। परिवार के किसी सदस्य की अचानक मौत का सदमा इस नुकसान से अलग है, जिसकी कोई कीमत नहीं लग सकती…

ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब यूट्यूब के जरिए पता लगा कि केरल के एक धनाढ्य व्यक्ति ने अपने नौ वर्षीय बेटे को उसके जन्मदिन के उपहार के रूप में अपनी फरारी कार चलाने के लिए दी। उस बच्चे के साथ उसका सात वर्षीय भाई पैसेंजर सीट पर बैठा था। बच्चे की मां ने बाद में एक टीवी चैनल को बताया कि बच्चा पांच साल की उम्र से ही महंगी लग्जरी कारें चला रहा है और वह आत्मविश्वास के साथ कार ड्राइव करता है। मां ने गर्वपूर्वक इसका वीडियो यूट्यूब पर अपलोड किया, जो वायरल हो गया। देशभर में शोर मचा और अंततः बच्चे के पिता को इस आरोप में गिरफ्तार किया गया कि उसने दो छोटे बच्चों की जान के अतिरिक्त सड़क पर चलने वाले शेष लोगों की जान भी खतरे में डाली। इस घटना की मीडिया में बहुत चर्चा हुई। फिर भी हमारा समाज, मीडिया और प्रशासन एक खतरनाक तथ्य से बिलकुल अनजान दिखता है और वह तथ्य यह है कि सड़क दुर्घटनाओं में इतनी जानें जाती हैं कि आतंकवादी घटनाएं भी उनके सामने फीकी पड़ जाती हैं। प्रसिद्ध पत्रकार विजय क्रांति ने अपने लेख ‘रोड्स किल मोर दैन टेररिज्म इन इंडिया’ (भारत में आतंकवाद से भी ज्यादा मौतें सड़कों पर) में कई भयावह तथ्यों का जिक्र किया है। सन् 1947 से अब तक, यानी पिछले 70 सालों में जितने लोग देश में हुई सभी आतंकवादी घटनाओं के शिकार हुए, उससे कहीं ज्यादा सिर्फ एक साल में सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं।

26/11 की बदनाम आतंकवादी घटना में जहां 195 निर्दोष लोग मारे गए, वहीं भारतीय सड़कों पर हर रोज औसतन 390 लोग जान गंवाते हैं। यानी सड़कों पर हर रोज दो-दो 26/11 घटते हैं। दुखद सत्य यह भी है कि सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होने वाले आधे से ज्यादा लोग युवा पुरुष होते हैं, जिनमें से अधिकांश अपने परिवार के लिए रोटी कमाने वाले अकेले या मुख्य सदस्य होते हैं। इससे परिवार के परिवार तबाह हो जाते हैं। परिवार के किसी सदस्य की अचानक मौत का सदमा इस नुकसान से अलग है, जिसकी कोई कीमत नहीं लग सकती। हमारे एनजीओ ‘बुलंदी’ ने एक सर्वेक्षण में पाया कि मुख्यतः तीन तरह के लोग सड़क दुर्घटनाओं के ज्यादा शिकार होते हैं। इनमें सबसे पहले नंबर पर ट्रक डाइवर आते हैं, उसके बाद दूसरा नंबर नए बने बाइक चालकों का है और तीसरे नंबर पर कार मालिक आते हैं। ट्रक ड्राइवरों को सीमित समय में सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना होता है और रास्ते में आराम के साधनों और समय का अभाव होता है। ज्यादातर ट्रक ड्राइवर बिना आराम किए और नशे की हालत में ट्रक चलाते हैं। थकावट और नशे के कारण वे सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं करते हैं। नए-नए बाइक मालिक युवा दूसरे नंबर पर आते हैं, जो बाइक की खरीद की खुशी में अपने मित्रों के साथ पार्टी के बाद नशे की हालत में घर लौटते हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। कार चालकों और बाइक चालकों में दुर्घटना का एक अन्य कारण बिलकुल एक जैसा है। तकनीकी उन्नति के कारण गाडि़यों का ब्रेकिंग सिस्टम ज्यादा प्रभावी हुआ है तथा रफ्तार पकड़ने में लगने वाला समय न के बराबर है। रोमांच की खातिर तेज गति में चलना, अब एक आम बात है और जब कहीं से अचानक कोई गाड़ी के सामने आ जाए, तो हमारी प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत तेज नहीं होती और दुर्घटना घट जाती है। ‘बुलंदी’ के सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि सड़क दुर्घटनाओं में शामिल टैक्सियों तथा ऐसी कारों की संख्या सबसे कम होती है, जिन्हें मालिक के बजाय ड्राइवर चलाते हैं, क्योंकि ज्यादातर ड्राइवर प्रशिक्षित होते हैं, जबकि कारों के मालिक अकसर किसी प्रशिक्षित ट्रेनर से ट्रेनिंग लेने के बजाय अपने परिवार के सदस्य अथवा मित्र से गाड़ी चलाना सीखते हैं। हर साल लाखों लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं और उनसे कई गुना घायल हो जाते हैं। यह कहना मुश्किल है कि इनमें से कितने लोग जीवनभर के लिए अपंग हो जाते हैं, क्योंकि सरकार के पास इनका कोई रिकार्ड नहीं है। उल्लेखनीय है कि वाहनों का 90 प्रतिशत अमीर देशों में है, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं की चपेट में आने वाले लोगों का 91 प्रतिशत विकासशील देशों का है। इन देशों में सड़कों की मुरम्मत, चालकों के प्रशिक्षण और ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने के नियमों में होने वाली कोताही ने इन देशों की सड़कों को आतंकवादी सड़कों में तबदील कर दिया है। यह खेद का विषय है कि हमारे देश में सड़क सुरक्षा को लेकर वह हर चीज गड़बड़ है, जहां गड़बड़ी हो सकती थी। मसलन, ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की लचर प्रणाली ही अपने आप में एक बड़ी खामी है।

अप्रशिक्षित चालक और गैरलाइसेंसधारी चालकों की बड़ी संख्या ही  सड़कों पर मंडराता बड़ा खतरा हैं। कुछ वर्ष पूर्व एक राज्य की सरकारी बस सेवा के ड्राइवरों की आंखों के निरीक्षण में पाया गया कि उनमें से आधे से ज्यादा ड्राइवरों को साफ नहीं दिखता था और उन्हें चश्मे की जरूरत थी, कइयों को रात को कम दिखता था। ऐसे ड्राइवर अंदाजे से और राम भरोसे वर्षों से बसें चला रहे थे और खुद अपने लिए तथा अपनी सवारियों के लिए जान का खतरा थे। कार और मोटरबाइक कंपनियां मार्केटिंग पर बहुत ध्यान देती हैं, लेकिन अपने ड्राइवरों को प्रशिक्षित करने के लिए कुछ नहीं करतीं या फिर उनके कई पुरस्कार प्राप्त कार्यक्रम भी एकदम कागजी होते हैं। ‘बुलंदी’ के सर्वेक्षण की एक और खास बात यह है कि सड़क दुर्घटनाओं के कारण में सबसे पहला और बड़ा कारण आवश्यकता से कम नींद लेना है। पूरी नींद न लेने से हमारे रेफ्लेक्सेज सुस्त पड़ जाते हैं।

हम आगे-पीछे की गाडि़यों की गति का सही अंदाजा नहीं लगा पाते और सुस्त प्रतिक्रिया के कारण दुर्घटना हो जाती है। खराब सड़कें दुर्घटना का दूसरा और रैश ड्राइविंग तीसरा बड़ा कारण हैं, जबकि गलत ढंग से बनाए गए सड़कों के मोड़ और अप्रशिक्षित ड्राइवरों द्वारा गाड़ी चलाना दुर्घटना के चौथे और पांचवें कारण हैं। अब समय है कि हम इस ओर भी ध्यान दें, ताकि समाज में ऐसे परिवारों की संख्या न बढ़े, जो सड़क दुर्घटना में परिवार के मुखिया की मृत्यु के कारण अनाथ हो गए।  

ई-मेलःindiatotal.features@gmail

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