सिंधु जल समझौता रद्द हो

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

यदि हम समझौते को तत्काल रद्द न करना चाहें, तो भी पाकिस्तान को नोटिस देकर विश्व बैंक की मध्यस्तता तो मांग ही सकते हैं। हम कह सकते हैं कि हम इस समझौते को रद्द करना चाहते हैं, क्योंकि इससे आपसी सौहार्द और मित्रता स्थापित नहीं हो रही है तथा विश्व बैंक से कहें कि वह मध्यस्तता करे, अगर इस मध्यस्तता में सफलता नहीं मिलती है, तो हम इस संधि को रद्द कर सकते हैं। ध्यान दें कि विश्व बैंक की मध्यस्तता यदि सफल नहीं होती है, तो उस हालात में क्या किया जाएगा, इसका कोई विवरण सिंधु जल संधि में नहीं दिया गया है। यदि विश्व बैंक की मध्यस्तता असफल होती है, तो हम इस जल संधि को रद्द करने के हकदार बनते हैं…

नए विदेश मंत्री जयशंकर के सामने प्रमुख चुनौती पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारने की है। हमने पाकिस्तान को आर्थिक दृष्टि से घेरने का प्रयास किया था। बीती एनडीए सरकार ने पाकिस्तान से आने वाले माल पर आयात कर में वृद्धि की थी, लेकिन यह पाकिस्तान को भारी नहीं पड़ रहा है, चूंकि पाकिस्तान के कुल निर्यातों में केवल 1.4 प्रतिशत भारत को जाते हैं। पाकिस्तान ने सऊदी अरब और चीन से मदद लेने में सफलता हासिल की है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी उसे मदद दी है। अतः हमारी आर्थिक मोर्चेबंदी सफल नहीं हुई है। ऐसे में जयशंकर के सामने पाकिस्तान को घेरने के उपाय सीमित हैं। यह सही है कि भारत ने अमरीका के साथ अच्छे संबंध बनाकर पाकिस्तान पर दबाव बनाया है, लेकिन यह भी सही है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा पकिस्तान को आर्थिक मदद दी गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में अमरीका का वर्चस्व है। अतः मुद्रा कोष द्वारा पाकिस्तान को मदद देना बताता है कि अमरीका पकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर नहीं करना चाहता है। इस दुरुह परिस्थिति में हमें सिंधु जल समझौते पर पुनः विचार करना चाहिए। स्वतंत्रता के शीघ्र बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच समझौता हुआ था कि सिंधु घाटी की छह नदियों में से तीन नदियों के जल पर भारत और तीन नदियों पर पकिस्तान का अधिकार होगा। पाकिस्तान के कोटे में सिंधु, चिनाब और झेलम नदियां डाली गई थीं। इनके द्वारा पाकिस्तान को हर वर्ष आठ करोड़ एकड़ फुट जल पहुंचाया जाता है। एक एकड़ भूमि पर यदि एक फुट पानी रखा जाए, तो उस पानी को एक एकड़ फुट कहा जाता है। इसके विपरीत भारत को ब्यास, रावी और सतलुज नदियां आबंटित की गईं, लेकिन भारत इन नदियों के संपूर्ण जल का उपयोग करने में सफल नहीं हुआ है। आज भी इन नदियों का 3.3 करोड़ एकड़ फुट पानी पाकिस्तान को बह रहा है।

इस प्रकार पाकिस्तान को वर्तमान में 11.3 करोड़ एकड़ फुट पानी भारत की भूमि से बहकर मिल रहा है। पाकिस्तान में कुल पानी की उपलब्धता 14.5 करोड़ एकड़ फुट है। यानी पाकिस्तान को उपलब्ध पानी में से लगभग 80 प्रतिशत पानी भारत से मिल रहा है। आश्चर्य की बात है कि भारत पर इतना परावलंबी होने के बावजूद पाकिस्तान हमारे विरुद्ध आतंकियों को पोषित कर रहा है। बीती सरकार ने ब्यास, रावी और सतलुज नदियों के भारत के कोटे के 3.3 करोड़ एकड़ फुट पानी का भारत में ही उपयोग करने के कदम उठाए हैं और आशा की जा सकती है कि वर्तमान सरकार के समय यह पानी हम पूरी तरह से उपयोग कर सकेंगे। तब यह पानी पाकिस्तान को मिलना बंद हो जाएगा। इससे पाकिस्तान की समस्या बढ़ेगी, क्योंकि वर्तमान में 11.3 करोड़ एकड़ फुट पानी जो सिंधु घाटी के माध्यम से उसको मिल रहा है, उसकी तुलना में आने वाले समय में केवल आठ करोड़ एकड़ फुट पानी मिलेगा। फिर भी पाकिस्तान का रवैया सुधरता नहीं दिख रहा है। इस परिस्थिति में हमें सिंधु जल समझौते को रद्द करने पर विचार करना चाहिए। यदि हम इस समझौते को रद्द कर दें और सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी को भी रोक लें, तो पाकिस्तान बहुत शीघ्र ही घुटने टेक देगा। समस्या यह है कि सिंधु जल समझौते में व्यवस्था दी गई है कि उस समझौते में कोई भी परिवर्तन आपसी सहमति से ही किया जाएगा और मतभेद होने पर विश्व बैंक की मध्यस्तता की पहल की जाएगी। इस प्रावधान के अनुसार हम एकतरफा कार्रवाई से समझौते को रद्द नहीं कर सकते हैं, लेकिन कानून का एक मूल सिद्धांत है कि कानून की विवेचना उसकी प्रस्तावना के मद्देनजर की जाती है। जिस उद्देश्य से कानून बनाया गया है, उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही कानून की विवेचना की जानी चाहिए। सिंधु जल समझौते की प्रस्तावना में लिखा गया है कि आपसी सौहार्द और मित्रता की भावना से पाकिस्तान तथा भारत इस समझौते में प्रवेश कर रहे हैं। हमने जो सिंधु, चिनाब और झेलम नदियों का पानी पाकिस्तान को देना स्वीकार किया, उसका उद्देश्य था कि पाकिस्तान तथा भारत के बीच सौहार्द एवं मित्रता बनी रहेगी। यदि पाकिस्तान ने यह सौहार्द और मित्रता ही नहीं बनाई है और हमारे विरुद्ध आतंकवाद को पोषित कर रहा है, तो इस बदली हुई परिस्थिति में समझौते का औचित्य ही नहीं रह जाता है। अतः हम इस समझौते को पूरी तरह रद्द कर सकते हैं। ध्यान दें कि जब हम समझौते के अंतर्गत कुछ सुधार करना चाहें, यानी समझौते को स्वीकार करते हुए उसमें परिवर्तन करना चाहें, तो आपसी सहमति जरूरी है, लेकिन यदि हम समझौते को ही रद्द करते हैं, तो उसके साथ वह धारा भी रद्द हो जाती है, जिसमें आपसी सहमति की बात की गई है। इसलिए समझौते को रद्द करने में आपसी सहमति की धारा बीच में नहीं आती है।

यदि हम समझौते को तत्काल रद्द न करना चाहें, तो भी पाकिस्तान को नोटिस देकर विश्व बैंक की मध्यस्तता तो मांग ही सकते हैं। हम कह सकते हैं कि हम इस समझौते को रद्द करना चाहते हैं, क्योंकि इससे आपसी सौहार्द और मित्रता स्थापित नहीं हो रही है तथा विश्व बैंक से कहें कि वह मध्यस्तता करे, अगर इस मध्यस्तता में यदि सफलता नहीं मिलती है, तो हम इस संधि को रद्द कर सकते हैं। ध्यान दें कि विश्व बैंक की मध्यस्तता यदि सफल नहीं होती है, तो उस हालात में क्या किया जाएगा, इसका कोई विवरण सिंधु जल संधि में नहीं दिया गया है। यदि विश्व बैंक की मध्यस्तता असफल होती है, तो हम इस जल संधि को रद्द करने के हकदार बनते हैं। हमें इस दृष्टि से राष्ट्रपति ट्रंप से सबक लेना चाहिए।

अमरीका ने कनाडा और मेक्सिको के साथ नाफ्टा नाम का मुफ्त व्यापार समझौता कर रखा था। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि यह समझौता हमारे पक्ष में नहीं है और उसे एकतरफा रद्द कर दिया। फलस्वरूप मेक्सिको तथा कनाडा ने अमरीका के साथ दोबारा वार्ता की और एक नया समझौता किया, जिसमें अमरीका को लाभ हुआ। अतः हम भी यदि एकतरफा सिंधु जल समझौते को रद्द कर देते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वार्ता के  रास्ते बंद हो जाते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ जरूर है कि पाकिस्तान को समझ आएगा तथा विश्व समुदाय को भी समझ में आएगा कि भारत द्वारा अपने इतने जल को देने के बावजूद पाकिस्तान किस प्रकार का व्यवहार हमारे साथ कर रहा है। इस प्रकार हम पाकिस्तान पर आतंकवाद को समाप्त करने का दबाव बनाने में सफल होंगे।

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