हम भारतीय कितने गरीब हैं

Jun 21st, 2019 12:07 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

बेशक गरीबों तक पहुंचाने के लिए कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण होता रहा है तथा हम आगे की ओर कछुआ चाल से बढ़े हैं। कुछ अवसरों पर हमने मनरेगा से धन का आवंटन किया जो कि अस्थायी काम पैदा करता है तथा वास्तव में कोई काम किए बिना ही जाली एंटरी दिखा कर दिहाड़ी की अदायगी होती रही है। नरेंद्र मोदी ने पूरे साहस के साथ गरीबी व विकास के प्रश्न का अनुशीलन किया है। अर्थशास्त्रियों ने उन्हें अपने सिद्धांत के आधार पर घेरा, किंतु मोदी ने गरीबी को खुद देखा है तथा वह जानते हैं कि समस्या केवल मैक्रो स्तर पर ही नहीं है, बल्कि माइक्रो स्तर पर भी है…

पंजाब-राजस्थान सीमा पर एक महिला अपने बच्चे को नीचे जमीन पर रखती है, जो कि प्यासा व कुपोषित है। वह सूर्य की गर्मी से राहत पाने के लिए पानी ढूंढने जाती है। जब वह वापस आती है तो वह अपने बच्चे को मरा हुआ पाती है। अखबारों में एक न्यूज आइटम आती है तथा हर कोई दिल में दर्द लिए इस पर सरसरी नजर डालता है। मेरे लिए यह केवल एक खंडित घटनाक्रम नहीं है, बल्कि भारत में गरीबी का बहुत ही त्रासद सूचक है। यह फिल्म गांधी में एटेनबौरो द्वारा दर्शाई गई उस गरीब महिला की छवि को भी ताजा करता है जिसके पास ठंड के मौसम में भी अपना शरीर ढांपने लायक कपड़ा नहीं है। वह कपड़े धो रही होती है। गांधी जी अपने तन से कपड़ा हटाकर उसे पानी में बहा देते हैं, फिर जाकर वह महिला अपने तन को ढक लेती है। यह दया दर्शाने की एक मिसाल है तथा गरीबी हटाने के लिए कोई अभियान नहीं है। आजादी के बाद उन दिनों केवल डा. राम मनोहर लोहिया बचे थे जो भारत की संसद में प्रति व्यक्ति आय व गरीबी के मसले उठाते थे। लेकिन वह भी अपने तथा नेहरू के बीच कटतापूर्ण बहस के बीच में मर गए।

ठीक उस दिन से जब वर्ष 1916 में गांधी जी गरीबी हटाने का अभियान परिकल्पित करते हैं, आज जबकि बच्चे प्यासे व भूखे मर रहे हैं, हम गरीबी को पूरी तरह हटाने में सफल नहीं हुए हैं।  इंदिरा गांधी ने निश्चित रूप से गरीबी हटाओ का सशक्त राजनीतिक नारा दिया जिसे कि व्यंग्यकार शरद जोशी ने एक स्वांग से अधिक कुछ नहीं माना। उन्होंने हटाओ शब्द की आलोचना में कहा कि यह इसे हटाने के निर्देश से अधिक कुछ नहीं है, यह सड़क पर रेहड़ी हटाने के लिए रेहड़ी-फड़ी वाले को पुलिस द्वारा दिए निर्देश जैसा है। बेशक गरीबों तक पहुंचाने के लिए कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण होता रहा है तथा हम आगे की ओर कछुआ चाल से बढ़े हैं। कुछ अवसरों पर हमने मनरेगा से धन का आवंटन किया जो कि अस्थायी काम पैदा करता है तथा वास्तव में कोई काम किए बिना ही जाली एंटरी दिखा कर दिहाड़ी की अदायगी होती रही है। नरेंद्र मोदी ने पूरे साहस के साथ गरीबी व विकास के प्रश्न का अनुशीलन किया है। अर्थशास्त्रियों ने उन्हें अपने सिद्धांत के आधार पर घेरा, किंतु मोदी ने गरीबी को खुद देखा है तथा वह जानते हैं कि समस्या केवल मैक्रो स्तर पर ही नहीं है, बल्कि माइक्रो स्तर पर भी है। अर्थशास्त्री सोचते हैं कि गरीबी विकास को प्रोत्साहित करके घटाई जा सकती है क्योंकि इसका फल आने वाले समय में स्वतः वितरित हो जाएगा। अब जीडीपी, जो अपने आप में आर्थिक विकास का यार्डस्टिक है, विवादास्पद यार्डस्टिक बना हुआ है। पूर्व आर्थिक सलाहकार सुब्रह्मण्यम का शोध पत्र कहता है कि सरकार की कैलकुलेशन वास्तविक तथ्यों से ज्यादा प्रफुल्लित करने वाली है। वर्ष 2016 से सरकार का मैथ्ड़ बदल गया जिसने कि विकास को 8.2 के स्तर पर दिखाया। लेखक, जो कि सरकार के साथ एक पूर्व अर्थशास्त्री रहा है तथा स्वयं कैलकुलेशन में संलिप्त रहा है, दिखाता है कि अनुमान की प्रणाली गलत है तथा इसे ठीक करने के लिए यह केवल 4.4 फीसदी लेगा। यह निंदात्मक है क्योंकि वह स्वयं उस सरकार में संलिप्त रहा जिसने इसे बदला तथा दावा किया जाता है कि यह पहले से ज्यादा ठीक है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या विश्व बैंक तथा संयुक्त राष्ट्र ने नए प्रतिमान को स्वीकार किया है। किसी को इसमें राजनीति ढूंढने की जरूरत नहीं है क्योंकि वर्ष 2011 से 2016 तक जो पीरियड रिसर्च किया गया, वह यूपीए तथा एनडीए सरकारों दोनों को कवर करता है। किंतु जैसे कि स्वामीनाथन कहते हैं कि इस काल में विकास का उनका 4.5 फीसदी का अनुमान भी एक डिजास्टर है। अर्थशास्त्रियों के डाटा पर ध्यान देने के समय किसी को साम्राज्यवादी पिक्चर की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए जो कि कई बार ड्राई एज डस्ट सांख्यिकी की तुलना में ज्यादा यथार्थवादी स्थिति दिखाता है। इसे स्मैल फैक्टर कहा जा सकता है अथवा मैं इसे फील फैक्टर कहता हूं। प्रबंधन में मैं इसे अवधारणा पिक्चर कहता हूं। मिसाल के तौर पर इन फील फैक्टर को देखते हैं।

फील फैक्टर एक- मैं दिल्ली से हिमाचल के एक दूरस्थ गांव में शिफ्ट हुआ और मैं गांव की गरीबी के बारे में बहुत कुछ सुना करता था। मैं सोचता हूं कि इसका मतलब है पर्याप्त रोटी, कपड़ा और मकान की क्षमता का अभाव। पिछले पांच वर्षों में मैंने गांव में देखा कई मकान, शौचालय व गैस कनेक्शन तथा और भी कई कुछ हुआ, जो पहले मैंने कभी नहीं देखे थे। गांव में चारों ओर ट्रक चालक हुआ करते थे, इसलिए हमने कई ट्रक देखे, लेकिन अब हम देखते हैं कि करीब हर घर के पास अतिरिक्त रूप से मारुति या स्कार्पियो गाड़ी भी है। मैंने एक बार गांव में हैडमैन से कहा कि चूंकि मैं गरीब पर लिखना चाहता हूं, इसलिए इंटरव्यू के लिए कोई गरीब व्यक्ति लेकर आओ, परंतु वे ऐसा व्यक्ति नहीं ढूंढ पाए। अब फील फैक्टर दो की बात करते हैं। मैं दिल्ली स्टेशन पर हिमाचल को जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहा हूं। मैंने एक बड़े समूह को इंतजार करते हुए देखा जो कि राज्य से नहीं महसूस हो रहा था। उन्होंने मुझे बताया कि वे हर साल रोपड़ को फसल काटने के लिए जाते हैं जहां एक जमींदार ने उन्हें रोजगार दे रखा है।

ये बिहार के दूरवर्ती क्षेत्रों के मजदूर हैं जो उत्तर भारत में दिहाड़ी लगाने के लिए घूम रहे हैं। बिहार के कई ऐसे मजदूर हैं जो झोंपडि़यों में रहते हैं तथा अभाव की स्थितियों में जीने को विवश हैं। वे काम करते हैं तथा मेरे अनुमान में वे निश्चित रूप से गरीब हैं। मैं नहीं जानता कि गरीबी की सांख्यिकी हमें कहां दिखाएगी, हम क्या हैं, किंतु डाटा निश्चित रूप से भ्रामक है क्योंकि बड़ी मात्रा में धन छिपा हुआ है तथा साथ ही कई मानव त्रासदियां आंकड़ों में नहीं घटाई जा सकती हैं। ब्राह्मण की तरह की गरीबी ज्ञात अथवा अज्ञात है।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

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