हिमाचल की बदलती राजनीति

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

इस बार सुखराम और वीरभद्र सिंह दोनों ही मंडी से भाजपा को उखाड़ने में एकजुट हो गए थे। दोनों को अपने परिवार, पुत्र / पौत्रों के भविष्य की चिंता थी, लेकिन मंडी के लोग इन दोनों परिवारों के पुत्र / पौत्रों का बोझ ढोते-ढोते हलकान हो रहे थे। बहुत से विशेषज्ञ हैरान हो रहे थे कि आखिर राजा वीरभद्र सिंह पंडित के परिवार की तीसरी पीढ़ी को राजनीति में ही आजीविका दिलवाने में क्यों आतुर थे? कारण स्पष्ट था कि उन्हें भी अपनी दूसरी पीढ़ी  के भविष्य की चिंता सता रही थी। एक-दूसरे के सहयोग से राजनीति में यह पारिवारिक परंपरा चलती रहे, इसीलिए यह दोनों का महागठबंधन था, परंतु हिमाचल की जनता अब यह बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं थी। उन्हें  देश की चिंता थी, जिस प्रकार पूरे देश ने परिवार-वंश विशेष की चिंता न करते हुए देश की चिंता को प्राथमिकता दी, उसी प्रकार हिमाचल के लोगों ने देश को प्राथमिकता दी…

लोकसभा के हाल ही में हुए चुनावों ने जहां पूरे देश की राजनीति की दिशा बदल दी है, वहीं हिमाचल प्रदेश की राजनीति में भी एक नया अध्याय लिख दिया। भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश की चारों सीटें पुनः प्राप्त कर ली हैं, यह शायद इतना बड़ा समाचार नहीं है, क्योंकि इससे पहले भी भाजपा ये चारों सीटें एक साथ जीती है, लेकिन इस बार भाजपा ने सत्तर प्रतिशत के करीब वोट हासिल कर लोकतंत्र के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। सुखराम का दशकों से चल रहा मंडी मिथक धराशायी हो गया। इसके साथ ही मंडी क्षेत्र पर से वीरभद्र सिंह का तथाकथित प्रभाव भी हवा हो गया। इस बार सुखराम और वीरभद्र सिंह दोनों ही मंडी से भाजपा को उखाड़ने में एकजुट हो गए थे।

दोनों को अपने परिवार, पुत्र / पौत्रों के भविष्य की चिंता थी, लेकिन मंडी के लोग इन दोनों परिवारों के पुत्र / पौत्रों का बोझ ढोते-ढोते हलकान हो रहे थे। बहुत से विशेषज्ञ हैरान हो रहे थे कि आखिर राजा वीरभद्र सिंह पंडित के परिवार की तीसरी पीढ़ी को राजनीति में ही आजीविका दिलवाने में क्यों आतुर थे? कारण स्पष्ट था कि उन्हें भी अपनी दूसरी पीढ़ी  के भविष्य की चिंता सता रही थी। एक-दूसरे के सहयोग से राजनीति में यह पारिवारिक परंपरा चलती रहे, इसीलिए यह दोनों का महागठबंधन था, परंतु हिमाचल की जनता अब यह बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं थी। उन्हें देश की चिंता थी, जिस प्रकार पूरे देश ने परिवार व वंश विशेष की चिंता न करते हुए देश की चिंता को प्राथमिकता दी, उसी प्रकार हिमाचल के लोगों ने देश को प्राथमिकता दी।  लोगों द्वारा देश को प्राथमिकता देने की यह जन नीति सुखराम के कुनबे पर बहुत भारी पड़ी। यही  कथन शिमला की सीट के बारे में भी कहा जा सकता है। हिमाचल की चारों सीटों पर पहली बार जाति-पाति व क्षेत्रवाद की दीवारों से ऊपर उठकर लोगों ने वोट दिया है। जो विशेषज्ञ प्रत्येक क्षेत्र में वोटों की जातिगत गणना को पैन ड्रायव में डाल कर चुनाव नतीजों की भविष्यवाणी कर रहे थे, उन्हें चुनाव परिणाम देख कर सचमुच हैरानी हुई होगी।

आपात स्थिति के बाद 1976 में हुए चुनावों में इंदिरा गांधी के खिलाफ भी पहली बार ऐसा वातावरण बना था कि हिमाचल जैसे पर्वतीय प्रदेश के लोगों ने भी अपने तमाम मतभेद भुला कर तब की जनता पार्टी को जिता दिया था। उस समय शांता कुमार मुख्यमंत्री बने थे और प्रदेश की राजनीति में नई पहल का पहला प्रयोग हुआ था। आज 2019 में हिमाचल में भाजपा की अविश्वसनीय जीत ने उस पहल को स्थायी रूप दे दिया है। इससे सिद्ध होता है कि हिमाचल के आम आदमी में भाजपा के प्रति विश्वास बढ़ा है। इसमें बहुत बड़ा हाथ जयराम ठाकुर का भी माना जाना चाहिए। मंडी से पहली बार मुख्यमंत्री बना है, निश्चय ही इससे मंडी में भाजपा की प्रचंड आंधी आई, लेकिन इसके साथ लोगों में यह भी विश्वास जगा कि भारतीय जनता पार्टी में कोई जमीनी कार्यकर्ता भी मुख्यमंत्री के शिखर तक पहुंच सकता है। मुख्यमंत्री का सौम्य व सरल व्यक्तित्व और उनकी ईमानदार छवि कहीं न कहीं आम आदमी को छूती है। नरेंद्र मोदी ने वर्तमान राजनीति पर टिप्पणी करते हुए ठीक ही कहा था कि विपक्ष अभी तक बीसवीं शताब्दी के माहौल में ही घूम रहा है, जबकि देश इक्कीसवीं शताब्दी में पहुंच चुका है। बीसवीं शताब्दी के टोटकों से न तो देश को पीछे खींचा जा सकना अब संभव है और न ही आम आदमी की पूंछ पकड़ कर पीछे खींचा जा सकता है।

हिमाचल प्रदेश में मोदी की यह टिप्पणी और भी ज्यादा सटीक बैठती है। जयराम ठाकुर प्रदेश में इक्कीसवीं सदी का स्वप्न बन कर उभरे थे और सोनिया कांग्रेस अभी भी पुराने बीसवीं सदी के व्यक्तियों और टोटकों से जनता को भरमाना चाहती थी, लेकिन जनता ने उन ताबीजों को अब अपने गले में बांधने से इनकार कर दिया। कुछ लोग यह मानते हैं कि कांग्रेस की इस ऐतिहासिक हार का कारण सोनिया कांग्रेस के  जो लोग हिमाचल प्रदेश में हैं, उनकी आपस में बहुत कलह थी और वे एक-दूसरे के प्रत्याशी को हराने का प्रयास कर रहे थे। कांग्रेस का ऐसा सोचना, स्वयं अपने को तो धोखे में रखना है ही, साथ ही हिमाचल के लोगों को भी धोखे में रखने का प्रयास है। यदि वे मिल कर भी लड़ते, तो परिणाम वही होते जो अभी आए हैं।

सोनिया कांग्रेस में फिलहाल कोई जमीनी नेता नहीं है और जो जमीनी नेता है, उस पर कांग्रेस अध्यक्ष को विश्वास नहीं है। हिमाचल में भाजपा को पड़ा नकारात्मक वोट नहीं है।  प्रदेश के संदर्भ में तो यह नकारात्मक हो भी नहीं सकता, क्योंकि प्रदेश में भाजपा की ही सरकार है। यह पहली बार है कि प्रदेश में कोई सरकार सकारात्मक वोट से जीती है। यह जीत गणितीय जोड़-तोड़ की जीत नहीं है, बल्कि प्रदेश के लोगों में आपसी सद्भावना व सौहार्द की प्रतीक है। मोदी ने जीत के बाद बहुत सटीक टिप्पणी की थी। मोदी ने कहा था कि चुनावों में जीत गणित की नहीं, बल्कि कैमिस्ट्री की हुई है। इस बार हिमाचल में यह कैमिस्ट्री मुक्कमल तौर पर सिद्ध हुई। इस कैमिस्ट्री को बनाने में जयराम ठाकुर की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी जाएगी।

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