अंतरराष्ट्रीय खेल ढांचे को यूं बर्बाद मत करो

भूपिंदर सिंह

राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक

आज प्रदेश के विभिन्न जिलों में कई खेलों के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने वाली प्ले फील्ड बनकर तैयार हैं, मगर प्रदेश में खेल वातावरण के अभाव में खेल का यह स्तरीय ढांचा आज लावारिस बन गया है। धर्मशाला, हमीरपुर तथा बिलासपुर में आज तीन सिथेंटिक ट्रैक हैं, मगर उनकी देखरेख के लिए आज कोई नहीं है। इन ट्रैकों पर लोग पार्क की तरह सवेरे-शाम सैर करते देखे जा सकते हैं। कोई धावक अगर अपने प्रशिक्षण के समय उन्हें रोकता है तो वे उन्हें हड़का कर चुप करा देते हैं। ये सैर करने वाले अधिकतर बड़े अधिकारी, व्यापारी व उनके परिवार के लोग होते हैं। हद तो तब हो जाती है जब सरकारी अधिकारी इन मैदानों पर उड़नखटोले को उतरने की अनुमति दे देते हैं…

हिमाचल प्रदेश में खेलों का स्तर राष्ट्रीय स्तर पर चले रहे विभिन्न राज्यों के खिलाडि़यों के मुकाबले अभी तक बहुत नीचे है। इस राज्य में पहले तो स्तरीय प्ले फील्ड का अभाव था। सदी के शुरू में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने राज्य में विभिन्न खेलों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्ले फील्ड कई खेलों के लिए योजना में डाली, जो उनके दूसरे कार्यकाल से लेकर अब तक पूरी हो रही है । आज प्रदेश के विभिन्न जिलों में कई खेलों के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने वाली प्ले फील्ड बनकर तैयार हैं, मगर प्रदेश में खेल वातावरण के अभाव में खेल का यह स्तरीय ढांचा आज लावारिस बन गया है। धर्मशाला, हमीरपुर तथा बिलासपुर में आज तीन सिथेंटिक ट्रैक हैं, मगर उनकी देखरेख के लिए आज कोई नहीं है। इन ट्रैकों पर लोग पार्क की तरह सवेरे-शाम सैर करते देखे जा सकते हैं। कोई धावक अगर अपने प्रशिक्षण के समय उन्हें रोकता है तो वे उन्हें हड़का कर चुप करा देते हैं। ये सैर करने वाले अधिकतर बड़े अधिकारी, व्यापारी व उनके परिवार के लोग होते हैं। हद तो तब हो जाती है जब सरकारी अधिकारी इन मैदानों पर उड़नखटोले को उतरने की अनुमति दे देते हैं। इस बार बिलासपुर के ट्रैक पर पुलिस भर्ती हो रही है, जो ट्रैक करोड़ों खर्च कर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार करने को बनाए हैं, उन पर भर्ती भी शुरू हो गई है। हिमाचल प्रदेश खेल विभाग के अधिकारी व प्रशिक्षक कहां हैं? उनकी इस बारे में क्या राय है क्या वे प्रशासनिक अधिकारियों के दबाव में इतना दब गए हैं कि खेल के आधारभूत नियम भी भूल गए हैं। क्या सरकार इस बारे में पता करेगी कि क्यों इन अंतरराष्ट्रीय प्ले फील्ड को यूं बर्बाद किया जा रहा है। ऊना में  बना हाकी के लिए एट्रो ट्रर्फ बनने से पहले ही खराब हो गया है क्या ऊना में जो ट्रर्फ बचा है उसके उपयोग के लिए ऊना खेल छात्रावास में हाकी के लड़कों को नहीं रखा जा सकता है। ऊना तथा मंडी में तैराकी के लिए तरनताल बने हैं, मगर इनका उपयोग आज तक प्रशिक्षण के लिए नहीं हो पाया है। हिमाचल का कौन तैराक या प्रशिक्षण लिया हुआ है। इसका उत्तर विभाग के पास है। राज्य के कई जिलों में इंडोर स्टेडियम बने हैं। इनमें शाम को  जरूर कुछ अधिकारी अपनी थकान मिटाने के लिए बैडमिंटन आदि खेल लेते हैं। यहां से कोई राष्ट्रीय स्तर का पदक विजेता निकला हो इसका पता किसी को है। इन सुविधाओं का उपयोग प्रशिक्षण के लिए क्यों नहीं हो पा रहा है। खेल विभाग के प्रशिक्षक कहां प्रशिक्षण दे रहे हैं इसका उत्तर कहां से मिलेगा। अगर इन प्ले फील्ड पर लगातार प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहा होता तो यहां पर न तो बाहरी लोग सैर कर पाते और न ही यहां पर भर्ती या मेले होते। हिमाचल खेल विभाग के अधिकारियों व प्रशिक्षकों को चाहिए कि वे हीन भावना से निकल कर अपने दायित्व को समझे। उनके द्वारा प्रशिक्षित किए गए खिलाड़ी जब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतेंगे तो उससे उनका और देश का सम्मान बढ़ेगा। इसलिए अपनी कक्षा के परिसर को यूं बर्बाद न होने दें। जब उनके पास राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाली टीम या खिलाड़ी होगा और उसके लिए जब अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्ले फील्ड बर्बाद हालत में मिलेगी तो प्रदेश व देश की कितनी हानि होगी कभी सोचा है। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाला खिलाड़ी हजारों में नहीं लाखों में एक मिलता है। उसके लिए राज्य में प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए प्ले फील्ड तो चाहिए ही तोती है। इसलिए प्रदेश के अधिकारियों खासकर जिलाधीशों, जिला खेल अधिकारियों व प्रशिक्षकों से अनुरोध है कि वे प्रदेश में बने इस अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल ढांचे को यूं बर्बाद मत होने दें। आने वाली नस्लें जब हम पहाडि़यों से हमारे खेल व अन्य गतिविधियों का इतिहास जब जानना चाहेंगी तो उसमें हम कब तक इस बात की आड़ लेंगे कि हमारे पास जो सुविधा बड़ी लड़ाई लड़कर बनाई गई थी वह हमने अज्ञानता के कारण बर्बाद कर दी और हम राज्य में अंतरराष्ट्रीय खेल सुविधा के अभाव में वह नहीं कर सके, जो हम करना चाहते थे। हिमाचल की कई संतानों ने हिमाचल के बाहर प्रशिक्षण प्राप्त कर ओलंपिक तक की पदकतालिका में भारत का नाम लिखा दिया है। राज्य में भी उन्हें खेल प्रशिक्षण वातावरण देना हमारा सबका कर्त्तव्य है। प्रदेश सरकार को चाहिए कि भविष्य में हम अपना गौरवशाली इतिहास पढ़ सकें, उसके लिए राज्य में बने खेल ढांचे पर सही प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाकर उसका सदुपयोग करवाएं, ताकि हिमाचल के पहाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतते हुए पोडियम पर खड़े होकर तिरंगे को ऊपर उठते देख जन-मन-गन की धुन पूरे विश्व को सुना सकें।

हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।                                              

-संपादक

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