भीड़ का हीरो

पीके खुराना

वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार

सत्ता में आने पर नेताओं के लिए अपने वादों को भूल जाना इसलिए आसान है, क्योंकि जनता भी तालियां बजाने के बाद सब कुछ भूल जाती है। भीड़ की शक्ति होती है, चुनाव के बाद भीड़ बिखर जाती है और लोग अकेले रह जाते हैं। भीड़ के भाड़ में तो नेता भी अकेला चना होता है, फिर आम आदमी की तो बिसात ही क्या? भीड़ की शक्ति के बिना किसी अकेले आदमी की कोई सुनवाई नहीं है। कोई सड़क बनाने को विकास बताने लगता है, तो कोई कागजी कानून बनाकर गाल बजाने लगता है। विकास की अधकचरी योजनाओं से न देश का भला होता है, न समाज का। शिक्षा महंगी है, इलाज महंगा है, न्याय महंगा है, जीवन महंगा है, आदमी सस्ता है, मौत सस्ती है। हमारा संविधान कानूनों का जंगल है, राजनीतिक दल और वकील इसका लाभ लेते हैं…

कोई नेता देश के विकास के लिए कोई नई बात कहता है, कोई अच्छी बात कहता है और कुछ कर के दिखाता है, तो उसका समर्थन बढ़ता है, पीछे लगी भीड़ बढ़ती है। इससे नेता का गुरूर बढ़ता है, वह जान जाता है कि उसकी बातें पसंद की जाने लगी हैं, लोग उससे प्रभावित हो रहे हैं। फिर अगर वह नेता किसी अनजान जगह पर चला जाए, जहां लोग उसे पहचानते न हों, तो उसे बड़ा अटपटा लगता है। उसकी नजरें ऐसे लोगों को खोजने लगती हैं, जो उसे पहचानते हों। उसे भीड़ की आदत पड़ जाती है। भीड़ उसकी भूख बन जाती है। परिणाम यह होता है कि नेता भीड़ को ‘पटाने’ में व्यस्त हो जाता है। उसे हर हाल में भीड़ चाहिए, बड़ी भीड़ चाहिए। नेता का अपना नजरिया होता है, नया नजरिया होता है, इसीलिए वह नेता है, लेकिन भीड़ का अपना मनोविज्ञान होता है। नेता अगर भीड़ के मनोविज्ञान को न समझ पाए, तो नेतागिरी जा सकती है। नेतागिरी बचाए रखने के लिए नेता को भीड़ का मनोविज्ञान समझकर तय करना पड़ता है कि भीड़ क्या सुनना और देखना चाहती है अन्यथा जनता उसे कूड़ेदान में डाल देती है। यही वह स्थिति है, जब नेता का रिमोट जनता के नहीं, भीड़ के हाथ में चला जाता है। भीड़ को साथ लेकर चलने वाला नेता खुद बहुत कमजोर होता है, लेकिन भीड़ को संभाल सकने वाला यही नेता बहुत शक्तिशाली भी होता है। इस विरोधाभासी तथ्य को समझना आवश्यक है। भीड़ नहीं तो नेता नहीं, यह नेता की कमजोरी है।

इसलिए वह सच-झूठ-फरेब सब मिलाकर बातें करता है, ताकि भीड़ को अपने साथ लगाए रख सके। भीड़ के समर्थन के लिए उसे भीड़ को उकसाए रखना पड़ता है, डराए रखना पड़ता है, ताकि भीड़ उसे अपना मसीहा मानती रहे। ऐसा नेता खुद में कमजोर होने के बावजूद बहुत शक्तिशाली भी होता है, क्योंकि वह जनता को उकसा सकता है, बलवा करवा सकता है। भीड़ अपने नेता को अड़चनें दूर करने वाला मसीहा मानने लगती है और उससे असहमत होने वालों को देशद्रोही। ऐसे में लोग जनतंत्र की बहुत सी स्थापित परंपराओं को गैरजरूरी मानने लगते हैं। उनके लिए अदालत, संविधान और कानून का कोई मतलब नहीं रह जाता। भीड़ का यह मिजाज लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदल देता है। बहुत से बुद्धिजीवी स्वार्थवश भीड़तंत्र का समर्थन करने लगते हैं, क्योंकि नेता की नजदीकी फायदेमंद होती है, जबकि आम लोग अपने नेता को मसीहा मानकर उसकी हर सही-गलत बात का समर्थन करते हैं, उसका संदेश फैलाते हैं और उसके झूठ को भी सच साबित करने लगते हैं, उसकी गलतियों की सफाई में नए-नए तर्क गढ़ लेते हैं या फिर गढ़े गए तर्कों को सही मानने लगते हैं। भीड़ का अपना नशा है। भीड़ आपको महत्त्वूपर्ण बनाती है, वीआईपी बनाती है। भीड़ न हो, तो आप वीओपी (वैरी आर्डिनरी पर्सन) बनकर रह जाते हैं। भीड़ का यही नशा आपसे वह सही-गलत सब करवा लेता है। सभी नेता इसी मर्ज के मरीज हैं। वे अपने मन का कुछ नहीं कहते, वे वह कहते हैं जो भीड़ सुनना चाहती है, वह करते हैं जो भीड़ उनसे करवाना चाहती है। भीड़ के लक्ष्य अलग हो सकते हैं, लड़ने का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन भीड़ का चरित्र एक सा होता है। वह अच्छे दिनों के सपने देखना चाहती है, नारे लगाना चाहती है, तालियां बजाना चाहती है और उत्साह में नाचना चाहती है। इसलिए नेता को मजमेबाज होना पड़ता है। फिर मजमा जमाने के लिए झूठ क्या और सच क्या? भीड़तंत्र की मानसिकता से संचालित नेता खुद भी शतरंज का मोहरा बन कर रह जाता है। भीड़तंत्र का यह गणित ही लोकतंत्र को झूठतंत्र में बदल देता है। सत्ता में आने पर नेताओं के लिए अपने वादों को भूल जाना इसलिए आसान है, क्योंकि जनता भी तालियां बजाने के बाद सब कुछ भूल जाती है। भीड़ की शक्ति होती है, चुनाव के बाद भीड़ बिखर जाती है और लोग अकेले रह जाते हैं। भीड़ के भाड़ में तो नेता भी अकेला चना होता है, फिर आम आदमी की तो बिसात ही क्या? भीड़ की शक्ति के बिना किसी अकेले आदमी की कोई सुनवाई नहीं है।

कोई सड़क बनाने को विकास बताने लगता है, तो कोई कागजी कानून बनाकर गाल बजाने लगता है। विकास की अधकचरी योजनाओं से न देश का भला होता है, न समाज का। शिक्षा महंगी है, इलाज महंगा है, न्याय महंगा है, जीवन महंगा है, आदमी सस्ता है, मौत सस्ती है। हमारा संविधान कानूनों का जंगल है, राजनीतिक दल और वकील इसका लाभ लेते हैं। हमारा संविधान राजनीतिक दलों को बहुत सी अनुचित सुविधाएं देता है, नौकरशाही को असीमित अधिकार देता है, जवाबदेही से बचने की पतली गलियां उपलब्ध करवाता है और हम इस संविधान को समझे बिना संविधान के गुण गाते हैं। अन्ना हजारे जैसे लोग भी अंततः अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी के बिना श्रीहीन हो जाते हैं। उनकी ईमानदारी और सच्चाई जनता को प्रभावित करने के लिए काफी नहीं है, उसके साथ रोमांच भी चाहिए और अगर सच के साथ रोमांच नहीं है, तो सच भी बेमानी है। तब भानु धमीजा जैसे विद्वानों की कोई पूछ नहीं है, जिन्होंने दो देशों के संविधान का विस्तृत विश्लेषण करके देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाने की कोशिश की है, लेकिन भीड़ के बिना उनका प्रयास अचर्चित है, समाज उससे गाफिल है। एक समाज के रूप में हम सच कहने और सुनने की कूबत और हिम्मत गंवा चुके हैं। इसीलिए हम विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद विकसित नहीं, सिर्फ विकासशील हैं। अब हमें तय करना है कि हम झूठतंत्र में जीना चाहते हैं या लोकतंत्र को सफल बनाना चाहते हैं। यह तय करना नेताओं का काम नहीं है, इसे जनता तय करेगी, हम तय करेंगे। भीड़ का हीरो बनना अच्छा है, जब भीड़ को सही दिशा दी जाए और उसे जागरूक बनाया जाए, न कि असहमत होने वाले लोगों को अपमानित करके देशद्रोही बताया जाए। अब रास्ता यही है कि हमें ही जागरूक रहना होगा कि हम नेताओं के चंगुल में न फंसें, भीड़ का हिस्सा न बनें, बल्कि नेताओं से सवाल पूछें, सही सवाल पूछें और तोल-परख कर निर्णय लें। इसी में लोकतंत्र का भला है, देश का भला है।

ई-मेलः indiatotal.features@gmail

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