राजनीति और चुनार

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

 

हो सकता है परिवार में यह फैसला हो ही गया हो कि गद्दी पर प्रियंका की ताजपोशी कर दी जाए, लेकिन यदि ताजपोशी होनी ही है, तो यह काम इस प्रकार किया जाए कि यह बहुत भव्य प्रकरण होना चाहिए। इस प्रकार के पद के दावेदार को सामान्य जन के संघर्ष का हिस्सा होना चाहिए, लेकिन यह प्रक्रिया तो बहुत लंबी है और इसके लिए समय चाहिए। सोनिया परिवार के पास अब समय की ही कमी है। शायद इसीलिए अब जल्दी-जल्दी ऐसी घटनाओं की तलाश हो रही है, जहां गांव या शहर में दो ग्रुप किन्हीं कारणों से लड़ पड़ते हैं, तो तुरंत उन लाशों के पास बैठ कर फोटो खिंचवाने को ही जन संघर्ष बता दिया जाए। प्रियंका वाड्रा की चुनार अतिथि गृह तक की गिरफ्तारीनुमा यात्रा सोनिया परिवार की इसी भीतरी छटपटाहट की निशानी है…

सोनिया गांधी की पार्टी की महासचिव चुनार के अतिथि गृह में हैं। सोनभद्र में जमीन की मिलकीयत को लेकर दो पक्षों के आपस के झगड़े में दस लोगों की हत्या कर दी गई थी। प्रियंका गांधी पीडि़त परिवार से मिलने जाना चाहती थीं, लेकिन प्रशासन को लगता था प्रियंका गांधी के जाने से पूरा मामला राजनीतिक रंग ले लेगा और उससे अपराधी बच निकलने का प्रयास कर सकते हैं। मामला स्पष्ट था- यदि एक पक्ष को एक राजनीतिक दल समर्थन करना शुरू कर देगा, तो दूसरे पक्ष को भी कोई राजनीतिक दल जाति या क्षेत्र के आधार पर समर्थन दे ही देगा। तब सारा मामला आपराधिक न रह कर राजनीतिक रंगत ले लेगा और उससे अपराधी बचने में कामयाब हो सकते हैं। इस कारण स्थानीय प्रशासन ने प्रियंका की घटनास्थल की बजाय चुनार अतिथि गृह में कर दी। अब उनके भाई राहुल गांधी का कहना है कि उनकी बहन को प्रशासन ने गिरफ्तार कर लिया है और यह गिरफ्तारी दुर्भाग्यपूर्ण है।

भाई-बहन की यह पारिवारिक व्याख्या पढ़ कर मुझे पंडित जवाहर लाल नेहरू के जीवन की एक घटना का स्मरण आता है, जिसे वह सारी उम्र पूरी संजीदगी से सुनाया करते थे। जम्मू-कश्मीर में उनके सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को 1846 की संधि को निरस्त करने के लिए चला रहे आंदोलन के कारण  उस समय के जम्मू-कश्मीर नरेश महाराजा हरिसिंह ने 1946 में गिरफ्तार  कर  लिया था। यदि 1846 की संधि निरस्त हो जाती, तो कश्मीर घाटी ब्रिटिश सरकार के पास चली जाती और वह मुस्लिम बहुमत का तर्क देकर  पाकिस्तान के हवाले कर देते। इसलिए महाराजा हरि सिंह ने इस आंदोलन को खत्म किया और शेख को बंदी बना लिया गया, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह कि अचानक पंडित जवाहर लाल नेहरू भी इस आंदोलन का समर्थन करते हुए शेख का साथ देने के लिए श्रीनगर के लिए चल पड़े। महाराजा हरि सिंह के प्रशासन ने उन्हें शेख मोहम्मद अब्दुल्ला से तो नहीं मिलने दिया, लेकिन उनके और उनके साथियों के रहने की व्यवस्था एक गैस्ट हाउस में कर दी। पंडित नेहरू ने प्रचार करना शुरू कर दिया कि उनको गिरफ्तार कर लिया गया है।

वह अपने जीवन के अंतिम समय तक अपनी इस तथाकथित गिरफ्तारी की चर्चा करते रहे और कहा जाता है कि उसके बाद उन्होंने कश्मीर को लेकर जो कुछ किया, वह राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि महाराजा हरि सिंह से बदला लेने और उन्हें सबक सिखाने के लिए ही किया। अब  चुनार के अतिथि गृह में बैठ कर प्रियंका वाड्रा भी यही कह रही हैं कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। आखिर उनका भी कुछ अंशों तक प्रत्यक्ष-परोक्ष नेहरू के वंश से संबंध है ही। नेहरू की बेटी के बेटे की वह पुत्री हैं। अतिथि गृह और हवालात/जेल का अंतर इतनी दूर तक आते-आते समाप्त हो ही जाता होगा। वैसे पार्टी के अध्यक्ष पद को लेकर सोनिया परिवार में जो घमासान मचा हुआ है, उसमें शायद अतिथि गृह को जेल बताना भी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। कुछ दिनों से इधर-उधर से तीव्र आवाजें तो आनी शुरू हो गई हैं कि यदि राहुल गांधी गद्दी संभालने के लिए तैयार नहीं है, (इसकी भीतरी व्याख्या यह भी है कि यदि इस काम के योग्य नहीं हैं) तो गद्दी प्रियंका वाड्रा के हवाले कर दी जाए।

हो सकता है परिवार में यह फैसला हो ही गया हो कि गद्दी पर प्रियंका की ताजपोशी कर दी जाए, लेकिन यदि ताजपोशी होनी ही है, तो यह काम इस प्रकार किया जाए कि यह बहुत भव्य प्रकरण होना चाहिए। इस प्रकार के पद के दावेदार को सामान्य जन के संघर्ष का हिस्सा होना चाहिए, लेकिन यह प्रक्रिया तो बहुत लंबी है और इसके लिए समय चाहिए। सोनिया परिवार के पास अब समय की ही कमी है। शायद इसीलिए अब जल्दी-जल्दी ऐसी घटनाओं की तलाश हो रही है, जहां गांव या शहर में दो ग्रुप किन्हीं कारणों से लड़ पड़ते हैं, तो तुरंत उन लाशों के पास बैठ कर फोटो खिंचवाने को ही जन संघर्ष बता दिया जाए। प्रियंका वाड्रा की चुनार अतिथि गृह तक की गिरफ्तारीनुमा यात्रा सोनिया परिवार की इसी भीतरी छटपटाहट की निशानी है। लेकिन चुनार जाने से पहले प्रियंका वाड्रा ने एक और धमाका करने की कोशिश की थी।

उन्होंने कहा कि मुझे तो अंकल नेल्सन मंडेला ने बहुत साल पहले ही राजनीतिक क्षेत्र में जाने के लिए कहा था। सोशल मीडिया का पीछा करने वालों को तो बहुत समय तक यही समझ नहीं आया कि प्रियंका के यह अंकल कौन हैं। बाद में समझ आया कि प्रियंका तो अफ्रीका वाले नेल्सन मंडेला की बात कर रही हैं। यानी अनेक देशों की हस्तियां भी प्रियंका को भारत की गद्दी संभाल लेने की सलाह देती रही हैं। यानी जब वह गद्दी संभालेंगी, तब मामला राष्ट्रीय नहीं अंतरराष्ट्रीय होगा। हो सकता है इटली की किसी हस्ती ने भी उन्हें भारत की गद्दी संभाल लेने की सलाह दी हो। वहां की और कोई हस्ती इस काम के लिए न मिली, तब भी वह कह सकती हैं कि सोनिया ने भी यह सलाह दी थी। इटली की कमी इसी से पूरी हो जाएगी।

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