हिमाचल में भी हों हरियाणा जैसे स्कूल

Jul 26th, 2019 12:06 am

भूपिंदर सिंह

राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक

हरियाणा के सोनीपत जिला के खरखौदा में प्रताप सिंह स्मारक वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला के पास जहां सभी इंडोर खेलों के लिए आधारभूत ढांचा है, वहीं पर इस स्कूल के पास विभिन्न खेलों के पचास प्रशिक्षक भी नियुक्त हैं। हिमाचल प्रदेश में इस समय विभिन्न जिलों में सैकड़ों स्कूल निजी स्तर पर संचालित हो रहे हैं। कई स्कूलों के पास प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए फीस आ रही है, मगर शिक्षा के मुख्य शारीरिक विकास के लिए स्कूल के पास कोई आधारभूत ढांचा या सुविधा मौजूद नहीं है। खेलों का अर्थ हर विद्यार्थी का खिलाड़ी बनना नहीं है और हर विद्यार्थी खिलाड़ी बन भी नहीं सकता है…

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। इसलिए शिक्षा की सही परिभाषा भी मानव का संपूर्ण शारीरिक व मानसिक विकास ही है। जब बच्चा अब चार वर्ष से भी कम उम्र में स्कूल जाना शुरू हो गया है, तो उसका संपूर्ण विकास कैसे हो, यह अब स्कूल प्रशासन को नए सिरे से सोचना होगा कि हमारे स्कूलों का आधारभूत ढांचा कैसा हो, जहां शिक्षा के संपूर्ण शिक्षण व प्रशिक्षण के लिए हर सुविधा के साथ-साथ शिक्षक व प्रशिक्षक भी मौजूद हों। हरियाणा के सोनीपत जिला के खरखौदा में प्रताप सिंह स्मारक वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला के पास जहां सभी इंडोर खेलों के लिए आधारभूत ढांचा है, वहीं पर इस स्कूल के पास विभिन्न खेलों के पचास प्रशिक्षक भी नियुक्त हैं। यह प्रचास प्रशिक्षक उस सौ से अधिक शिक्षकों की संख्या से अलग हैं। इसके स्कूल में तीन हजार से अधिक विद्यार्थी शिक्षण ले रहे हैं। लगभग एक हजार खिलाड़ी विद्यार्थी यहां छात्रावासों में रह रहे हैं। भारतीय खेल प्राधिकरण ने भी इस स्कूल में कुश्ती, जूडो, मुक्केबाजी, बुशु व नेशनल कबड्डी के लिए अपना प्रसार केंद्र दिया हुआ है।

इस स्कूल से सैकड़ों खिलाडि़यों ने विभिन्न खेलों में राष्ट्रीय ही नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का प्रतिनिधित्व कर देश के लिए पदक जीतकर गौरव प्रदान किया है। स्कूल के हर भवन की ऊपरी मंजिल पर विभिन्न खेलों के लिए इंडोर खेल हाल बनाए गए हैं, जहां पर शूटिंग, मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, जूडो, टेबल टैनिस, ताइक्वांडो व कुश्ती सहित कई खेलों के एक से अधिक प्ले फील्ड मौजूद हैं। कुश्ती में इस स्कूल के पास चार मैट बिछे हैं, इन पर प्रतिदिन सैकड़ों पहलवान अपना प्रशिक्षण प्राप्त करते देखे जा सकते हैं। आउटडोर खेलों के लिए स्कूल से एक किलोमीटर की दूरी पर बड़े मैदान मौजूद हैं। निजी क्षेत्र में चल रहे इस स्कूल के पास अपनी चार सौ भैंसों व गऊओं की डेयरी भी है। खिलाड़ी विद्यार्थियों के लिए दूध तथा दूध से बने अन्य खाद्य पदार्थ इसी डेयरी से बिलकुल शुद्ध रूप में प्राप्त हो रहे हैं। सीबीएसई से संबद्धता प्राप्त इस स्कूल के शैक्षणिक परिणाम भी बहुत बेहतर हैं। प्रतिवर्ष दर्जनों विद्यार्थी चिकित्सा व अभियंता कालेजों में प्रवेश प्राप्त कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में इस समय विभिन्न जिलों में सैकड़ों स्कूल निजी स्तर पर संचालित हो रहे हैं। कई स्कूलों के पास प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए फीस आ रही है, मगर शिक्षा के मुख्य शारीरिक विकास के लिए स्कूल के पास कोई आधारभूत ढांचा या सुविधा मौजूद नहीं है। खेलों का अर्थ हर विद्यार्थी का खिलाड़ी बनना नहीं है और हर विद्यार्थी खिलाड़ी बन भी नहीं सकता है। हर विद्यार्थी के शारीरिक विकास के लिए कोई न कोई खेल जरूर होना चाहिए। खेल शारीरिक फिटनेस का सबसे आसान व मनोरंजक साधन है। जहां विभिन्न शारीरिक क्रियाओं को करने के लिए हर विद्यार्थी तैयार नहीं होता है, वहीं पर  किसी न किसी खेल में हर विद्यार्थी खेलने को तैयार हो ही जाता है। इसलिए हर विद्यालय के पास वहां की भौगोलिक संरचना को देखते हुए इंडोर या आउटडोर खेल प्ले फील्ड का निर्माण स्कूल प्रशासन को ईमानदारी से जरूर करवाना चाहिए। अगर स्कूल के पास प्ले फील्ड की सुविधा होगी, तो विद्यार्थियों को शारीरिक व्यायाम के लिए किसी भी प्रकार की असुविधा महसूस नहीं हो सकती है। प्रदेश में कई निजी स्कूलों के पास शारीरिक व खेल प्रशिक्षकों के नाममात्र के पद हैं, जबकि उनके पास विद्यार्थियों की संख्या हजारों में है। खेलों के आधारभूत ढांचे को बढ़ाते हुए बड़े निजी स्कूलों को अपने यहां खेलों के जानकार प्रशिक्षकों को भी नियुक्ति देनी चाहिए।

इससे जहां हर विद्यार्थी की सामान्य फिटनेस के लिए कार्यक्रम भी मिल जाएगा, वहीं पर अगर किसी विद्यार्थी में उस खेल की प्रतिभा हुई, तो उसे भी खोज कर प्रशिक्षित किया जा सकता है। चार दशक पूर्व राज्य के बड़े सरकारी स्कूलों में शारीरिक शिक्षकों के तीन-चार पद होते थे, बाद में घटते-घटते ये एक तक आ गए हैं। मिडल स्कूलों में तो शारीरिक शिक्षक का पद अब खत्म ही किया जा रहा है। पिछले वर्षों में पढ़ाई के नाम पर शारीरिक फिटनेस को हाशिए पर रखा गया है। उस समय राज्य में चिकित्सा, अभियंता, तकनीकी व अन्य प्रकार के व्यावसायिक कोर्स के संस्थान न के बराबर थे और राज्य के बाहर दक्षिण राज्यों तक निजी क्षेत्र के संस्थानों में मोटी फीस देनी पड़ती थी, इसलिए पिछले चार-पांच दशकों से पढ़ाई पर अधिक जोर रहा।

रट्टा ही सही अच्छे अंकों के चक्कर में शारीरिक फिटनेस से खिलवाड़ हुआ है। आज जब शिक्षण व प्रशिक्षण के लिए दर्जनों संस्थान राज्य में ही हैं और सरकारी नौकरियां भी खत्म हो चुकी हैं, ऐसे में अब हमें मानसिक व शारीरिक तौर पर पूरी तरह फिट विद्यार्थियों की जरूरत है, जो आने वाले कल में जीवन की जंग आसानी से जीत सकें। इसलिए हिमाचल के सरकारी व निजी क्षेत्र के हर स्कूल से अपेक्षा की जाती है कि वे विद्यार्थियों की फिटनेस के लिए अपने यहां खेलों के लिए आधारभूत ढांचे के साथ-साथ उनके प्रशिक्षक भी नियुक्त करें, ताकि हमारे विद्यार्थी भविष्य के फिट नागरिक बन सकें और जिनमें अति प्रतिभा है, वे उच्च कोटि के खिलाड़ी बनकर देश का गौरव बढ़ा सकें।

हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।                                              

-संपादक

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