लोकतंत्र और भीड़तंत्र

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

संसदीय प्रणाली की विफलता को देखकर ही हिमाचल के अग्रणी अखबार ‘दिव्य हिमाचल’ के सीएमडी भानू धमीजा ने अपनी पुस्तक में यह वकालत की है कि भारत को शासन की राष्ट्रपति पद्धति अपना लेनी चाहिए। उनके अनुसार ऐसा करना उपयुक्त होगा। लेकिन हम एक ऐसी शासन प्रणाली के अधीन हैं जिसमें अंकुशों और उत्तरदायित्व का अभाव है…

क्या भारतीय लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल रहा है? देश के विभिन्न भागों में हो रही मॉब लिंचिंग की घटनाओं की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भीड़तंत्र के इन शब्दों को प्रयोग किया। कोर्ट का मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए एक सख्त कानून बनाने की जरूरत है। ऐसा करते हुए सुप्रीम कोर्ट शायद यूनानी विचारक प्लेटो अथवा अफलातून से प्रभावित हुई होगी। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में अफलातून ने लोकतंत्र को इन शब्दों से विभूषित किया था। इस महान दार्शनिक का मत था कि लोकतंत्र सुशासन की दृष्टि से एक उपयुक्त प्रणाली नहीं है। उन्होंने लोकतंत्र की व्याख्या भीड़तंत्र के रूप में की थी क्योंकि इस प्रणाली में योग्य व बुद्धिमान लोगों के बजाय एक चयनित अयोग्य भीड़ द्वारा शासन किया जाता है। अफलातून के अनुसार शासन की सबसे बढि़या प्रणाली कुलीनतंत्र है। उनके अनुसार कुलीनतंत्र में योग्य व बुद्धिमान लोग लोगों के हित में राज्य का शासन चलाते हैं।

इसमें शासन करने वाले अपने काम में विशेषज्ञ लोग होते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि अफलातून के विचारों में कई तर्क काफी हद तक सुस्पष्ट हैं, न्यायसंगत हैं क्योंकि उनके तर्क का अपना एक अलग महत्त्व व वजन है। हम अपने लोकतंत्र में कई तरह के असंतोष देखते हैं जो कि सरकार के भीड़ चयन की बुराइयों को इंगित करते हैं। शासन की जो प्रणाली अस्तित्व में है, वह लोकप्रियता दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में मापदंडों से समझौते की ओर उन्मुख है। स्वतंत्रता के बाद हमारे पास कई विकल्प मौजूद थे, लेकिन हमने इसलिए लोकतंत्र की उस संसदीय प्रणाली को अपना लिया क्योंकि हम पर वर्षों तक शासन करने वाले अंग्रेजों के देश में भी यह प्रणाली वर्षों से प्रचलित थी। ऐसा करते हुए हमारे संविधान निर्माता यह भूल गए कि भारत तथा ब्रिटेन के बीच शिक्षा व संस्कृति को लेकर व्यापक अंतर है। संसदीय प्रणाली की विफलता को देखकर ही हिमाचल के अग्रणी अखबार ‘दिव्य हिमाचल’ के सीएमडी भानू धमीजा ने अपनी पुस्तक में यह वकालत की है कि भारत को शासन की राष्ट्रपति पद्धति अपना लेनी चाहिए। उनके अनुसार ऐसा करना उपयुक्त होगा। लेकिन हम एक ऐसी शासन प्रणाली के अधीन हैं जिसमें अंकुशों और उत्तरदायित्व का अभाव है। ऐसी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में सुशासन की संकल्पना संभव नहीं है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि हमारी प्रणाली में शासकों के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता तय नहीं है। साथ ही सामूहिक रूप से काम करने की संस्कृति का भी यहां अभाव है। हमने गलत तरीके से विदेशी शासन प्रणाली को चुन लिया। हमने भारत व ब्रिटेन की परिस्थितियों में अंतर को समझे बिना ही यह प्रणाली अपना ली। यही कारण है कि इंगलैंड में यह प्रणाली अलिखित संविधान होने के बावजूद सफल है। यहां तक कि वहां आज भी अधिकतर परंपराएं अलिखित हैं। किंतु कोर्ट गौ संरक्षण कानूनों के उल्लंघन तथा धार्मिक कट्टरपन के हिंदू संदर्भ में हो रहे दंगों की ओर इशारा कर रहा था। अधिकतर पत्रकार तथा सेल्फ स्टाइल वाले बौद्धिक लोग भी उस समय हिंदू व अन्य सांप्रदायिक समूहों की आलोचना करते हैं जब भीड़ हिंसा में संलिप्त हो जाती है। भीड़ को न्याय प्राप्त करने के लिए जब कोई रास्ता नहीं मिलता अथवा जब स्थिति भी भावनात्मक हो जाती है तो ऐसे हमलों में भीड़ के शामिल होने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। मॉब लिंचिंग में बड़े दोषी शिथिल न्यायिक प्रणाली तथा स्थानीय स्तर पर अपर्याप्त सूचना तंत्र हैं। कई देशों में पिछले कुछ वर्षों से सामाजिक समूहों में तीन प्रकार के हमले भीड़ की ओर से हो रहे हैं। मिसाल के तौर पर अमरीका में काले और गोरे लोगों के बीच संघर्ष का इतिहास रहा है। यह हिंसा या तो शारीरिक होती है अथवा मौखिक होती है। भारत का जब विभाजन हुआ तो यहां सांप्रदायिक हिंसा हुई जिसमें लाखों लोग मारे गए। ये केवल भीड़ द्वारा हमले नहीं थे, बल्कि चारों ओर फैले सांप्रदायिक दंगे थे। स्थानीय स्तर पर भीड़ शारीरिक हिंसा में संलिप्त रही है जो कि शरीर अथवा संपदा को नुकसान पहुंचाती रही है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख दंगे भी भयानक थे। इसने समुदायों में गहरे घाव पैदा कर दिए। इसमें राजनीतिक लोगों की शह पर समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया और बड़ी संख्या में लोग दंगे के शिकार हो गए। इन दोनों समुदायों की साझी विरासत व संस्कृति रही है, लेकिन एक समुदाय के बड़े नेता की हत्या से उपजे भावात्मक उफान ने हिंसक रूप ग्रहण कर लिया। अविश्वास की इस खाई को भरने में कई साल लग गए, किंतु साझे पारिवारिक संबंधों के कारण यह खाई भरने में अंततः सफलता मिल गई। भीड़ की इस हिंसा के बाद देश में दो समुदायों के बीच कोई हिंसात्मक हमला नहीं हुआ। केवल कश्मीर घाटी में मॉब लिंचिंग शुरू हुई। वहां पत्थरबाज युवकों की ओर से हिंसा शुरू हुई तथा कश्मीरी पंडितों की जान व माल को क्षति पहुंची। अंततः उन्हें घाटी छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा तथा देश के अन्य स्थानों पर शरणार्थी बनकर वह जीवन जीने को विवश हो गए। कश्मीर घाटी में पत्थरबाज ही सामान्य लिंचिंग ग्रुप्स थे। हालांकि इससे कश्मीरी पंडितों को भारी क्षति पहुंची, लेकिन इसके बावजूद पत्थरबाजी की यह घटनाएं पूरी तरह रुक नहीं पाईं। इसके बाद पत्थरबाजों ने सेना के उन जवानों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया जो इन पत्थरबाजों को शांत करवाना चाहता थे। अब जबकि सेना ने इन पत्थरबाजों को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया है, ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि छोटे स्तर पर गौ संरक्षण के प्रश्न पर दो सामुदायिक समूहों में हिंसा हो रही है।

इस तरह की हिंसा में कई बार झूठा घटनाक्रम झगड़े का आधार बनता है अथवा अफवाहों के कारण इस तरह की हिंसक घटनाएं हो जाती हैं। पिछले कुछ समय से एक अन्य प्रकार की लिंचिंग भी उभरी है जिसे बौद्धिक लिंचिंग कहा जा सकता है। इसमें ओपिनियन लीडर्स पर आक्रामकता के मनोवैज्ञानिक हमले शामिल हैं। इसकी मानसिक पृष्ठभूमि झूठी सूचना फैलाना है अथवा विरोधियों को आक्रामक तर्कों से तंग करना है। इस तरह की बौद्धिक लिंचिंग से हम पहली बार तब अवगत हुए जब कांग्रेस की ओर से सम्मानित कई लोगों ने अपने पुरस्कार यह कहते हुए लौटा दिए कि उन्हें बोलने की स्वतंत्रता नहीं है। यह एक गलत अवधारणा थी जो कि समाज के कुछ लोगों के समूह की ओर से विचारपूर्वक फैलाई गई। परिणामस्वरूप वे यह प्रमाणित नहीं कर पाए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गालियों के शब्दों में संबोधित किया गया, इसके बावजूद उन्हें दंडित करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई। वास्तव में कुछ लोगों का यह भी विचार है कि इस समूह ने स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है।

इसी तरह एक अन्य समूह, जिसमें फिल्मों से जुड़े 49 सितारे शामिल हैं, ने गौ रक्षकों की ओर से की जा रही मॉब लिंचिंग का विरोध किया है। उधर 62 लोगों के अन्य समूह, जिसमें फिल्मी सितारे व लेखक आदि शामिल हैं, ने पहले समूह की यह कह कर आलोचना की है कि वह झूठा नेरेटिव फैला रहा है। विरोध करने वाले इन लोगों के साथ समस्या यह है कि वे यह नहीं समझते हैं कि देश को अंतराष्ट्रीय व्यापार व राजनीति में उसकी ख्याति को वे कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि इन लोगों के उस विदेशी प्रेस से संबंध हैं जो गाहे-बगाहे अनुचित ढंग से देश की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करती रहती है। यह सही समय है जब इस तरह का झूठा नेरेटिव फैलाने वाले लोगों को नियंत्रित करके देश की छवि को हो रहे नुकसान को रोका जाना चाहिए। वास्तव में इस तरह के गु्रप तथ्यों को तोड़-मरोड़ करके देश-विदेश में दुष्प्रचार कर रहे हैं।

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