हिमाचल के नौनिहालों का मार्गदशर्क क्यों नहीं? 

Aug 30th, 2019 12:06 am

भूपिंदर सिंह

राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक

केंद्रीय विभाग व अन्य राज्यों में खेल आरक्षण से नौकरी लगे खिलाडि़यों को कम से कम नौकरी प्राप्त करने के बाद अगले पांच वर्षों तक अपने विभाग व देश के लिए खेलना अनिवार्य होता है। मगर हिमाचल में ऐसा कोई नियम न होने के कारण खिलाड़ी, कर्मचारी या अधिकारी बहुत कम फिर से अपना खेल जारी रख पाते हैं। साथ ही हिमाचल में खिलाड़ी कर्मचारियों के साथ अच्छा बरताव भी नहीं किया जाता है…

सन 2000 से पहले हिमाचल प्रदेश में सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिशत/आरक्षण खिलाडि़यों के लिए जरूर था मगर यह तभी मिल पाता था जब किसी राजनीतिक पहुंच से खिलाड़ी की फाइल मंत्री परिषद की बैठक तक पहुंचती थी। रोस्टर में कोई भी पद खिलाड़ी के लिए आरक्षित नहीं था। तब तत्कालीन सरकार के मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने प्रदेश में तृतीय श्रेणी तक की नौकरियों में तीन प्रतिशत आरक्षण रखा है। प्रथम व द्वितीय श्रेणी के लिए यह आरक्षण एशियाई व ओलंपिक खेलों में पदक प्राप्त खिलाडि़यों को मंत्री परिषद की मंजूरी के बाद पद मिलना तय किया गया। इन दो दशकों में सैकड़ों खिलाडि़यों को विभिन्न विभागों में नौकरी मिल चुकी है। नौकरी लगने के बाद एथलेटिक्स कुस्ती, मुक्केबाजी व कबड्डी आदि खेलों में दो दर्जन खिलाडि़यों ने अपना खेल जारी रखा होगा।

शेष खिलाड़ी नौकरी लगने के बाद शायद ही कभी खेल मैदान गए हों। केंद्रीय विभाग व अन्य राज्यों में खेल आरक्षण से नौकरी लगे खिलाडि़यों को कम से कम नौकरी प्राप्त करने के बाद अगले पांच बर्षों तक अपने विभाग व देश के लिए खेलना अनिवार्य होता है। मगर हिमाचल में ऐसा कोई नियम न होने के कारण खिलाड़ी कर्मचारी या अधिकारी बहुत कम फिर से अपना खेल जारी रख पाते हैं। साथ ही हिमाचल में खिलाड़ी कर्मचारियों के साथ अच्छा बरताव भी नहीं किया जाता है। उसे प्रशिक्षण के लिए समय नहीं दिया जाता है। हो जब कोई राष्ट्रीय प्रतियोगिता हो तो कुछ दिन पहले उसे जरूरी दस दिनों की छुट्टी मिल जाती है। खेल प्रशिक्षण वर्ष दर वर्ष लगातार कई वर्षों तक चलने वाली प्रक्रिया है।

तभी आप राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्वालिफाई कर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं। खेल आरक्षण से नौकरी प्राप्त करने वाले खिलाड़ी कर्मचारियों की संख्या आज इतनी कम हो चुकी है कि वे लगभग शहर से गांव तक नियुक्त मिल जाएंगे। अपने सवेरे व शाम के समय में जब वे अपनी फिटनेस करते हैं, तो आस-पड़ोस के बच्चों को भी वे अपने खेल के गुर सिखा सकते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है स्नेह लता है, जो राजनीति शास्त्र की प्रवक्ता है मगर अपने स्कूल के पास ही वह पहले दाड़लाघाट के पास हैंडबाल स्कूल की लड़कियों को सिखाती थी और जब उसका तबादला उसके गांव मोरसिंघी हुआ तो वहां पर तो उसने एशियाई खेलों तक अपनी प्रशिक्षित की हुई खिलाडि़यों को भारत का कलर दिखाया। एथलेटिक्स में राजनीतिक शास्त्र के स्कूली प्रवक्ता अजय लखनपाल, टीजीटी कुलवीर, अनिल शर्मा तथा रजनीश शर्मा अपनी नौकरी में अपने पूरे पीरियड़ लगाकर भी स्कूली विद्यार्थियों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। जूडो में अनूप, संजय व उनके साथ कई अध्यापकों को अपने-अपने खेलों में जहां वे नियुक्त हैं विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करते देखा जा सकता है। खेल प्रशिक्षक व शारीरिक शिक्षक का कार्य तो मोटा वेतन पाकर अपना कार्य करना है। मगर अन्य पदों पर नौकरी कर प्रदेश की खेलों को जो आगे बढ़ा रहे हैं वे शाबाशी के हकदार जरूर हैं। राष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता पहलवान जॉनी चौधरी हमीरपुर के बड़सर में एक्साइज अधिकारी हैं। वह सवेरे-शाम अपनी ड्यूटी पूरी करने से पहले और बाद वहां बणी के सेवन स्टार स्कूल में कुश्ती हाल में तीन दर्जन से अधिक पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखा रहा हें। मगर इस तरह के स्वयंसेवी खेल प्रशिक्षक प्रेमियों की संख्या बहुत कम है। जिन सैकड़ों खिलाडि़यों ने खेल आरक्षण से नौकरी प्राप्त की है क्या वे अपने प्रदेश की युवा व किशोर पीढ़ी को वह सब आसानी से नहीं दे सकते जिससे प्रदेश में खेलों व फिटनेस का वातावरण बन सकता है।

खेल के माध्यम से जहां खिलाड़ी को मान-सम्मान व प्रदेश को गौरव मिलता वहीं पर वह आम जनमानस के लिए फिटनेस का सबसे आसान तरीका भी है। आज जब नशे के सौदागर आपके घरों व शिक्षा संस्थानों के आंगन तक पहुंच चुके हैं। सस्ता इंटरनेट होने के कारण मोबाइल व कम्प्यूटर पर आपका बच्चा पढ़ाई के नाम पर कई घंटों पर पता नहीं किस दुनिया में खोया रहता है। ऐसे में केवल खेल ही बचाता है जो आज की किशोर व युवा पीढ़ी को इस दलदल से बाहर निकाल सकता है। कई राज्यों में पुलिस ने अपने पूर्व खिलाडि़यों को सुविधा व प्रतिभा के अनुसार शिक्षा संस्थानों में भेज रखा है। जहां वे विद्यार्थियों को खेल के गुर सिखा रहे हैं, क्या हिमाचल पुलिस भी पंजाब पुलिस की तरह अपने पूर्व कर्मचारियों को ऐसा कार्य करवाने जा रही है? पूर्व खिलाड़ी व सरकार अगर संकल्प करती है तो यह हिमाचल की आगामी पीढ़ी के लिए खेलों व नशा निवारण में वरदान साबित हो सकता है। भारत सरकार भी विभिन्न विद्याओं में निपूर्ण लोगों को स्कूलों में व्याख्यान देने की बात कर विद्यार्थियों की क्षमता बढ़ाने का कार्य करने जा रही है तो प्रदेश सरकार को भी चाहिए कि वह प्रदेश में पूर्व खिलाडि़यों की सेवाएं शिक्षा संस्थानों में लें।

हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।      

-संपादक

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