बाहर से आने का भ्रम

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

इस सभ्यता को साधारण भाषा में मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है। यह सप्त सिंधु क्षेत्र या पश्चिमोत्तर भारत में फैली हुई थी। यूरोप के तथाकथित विद्वानों ने यह अफवाह उड़ा दी कि इस क्षेत्र में विदेशी आर्यों ने हमला कर, यहां के निवासियों को मार कर उनको दक्षिण की ओर धकेल दिया और स्वयं इस इलाके  पर कब्जा कर लिया। अपनी इस खोज को धारदार बनाने के लिए उन्होंने कुछ किताबें बगैरा भी लिखीं। सिंधु सरस्वती घाटी के अवशेषों में मिले कुछ नरकंकालों की परीक्षा के बाद यह भी घोषित कर दिया कि इनकी हत्या आर्यों ने धारदार हथियारों से की थी…

दक्कन कालेज पुणे के वैज्ञानिकों की एक टीम डा. बसंत शिंदे के नेतृत्व में पिछले कई साल से सिंधु सरस्वती घाटी की सभ्यता के अवशेषों को खंगालने में लगी हुई थी। इस सभ्यता को साधारण भाषा में मोहनजोदडो हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है। यह सप्त सिंधु क्षेत्र या पश्चिमोत्तर भारत में फैली हुई थी। यूरोप के तथाकथित विद्वानों ने यह अफवाह उड़ा दी कि इस क्षेत्र में विदेशी आर्यों ने हमला कर, यहां के निवासियों को मार कर उनको दक्षिण की ओर धकेल दिया और स्वयं इस इलाके पर कब्जा कर लिया। अपनी इस खोज को धारदार बनाने के लिए उन्होंने कुछ किताबें बगैरा भी लिखीं। सिंधु सरस्वती घाटी के अवशेषों में मिले कुछ नरकंकालों की परीक्षा के बाद यह भी घोषित कर दिया कि इनकी हत्या आर्यों ने धारदार हथियारों से की थी।

लेकिन सबसे बड़ा आश्चर्य तो तब हुआ जब तथाकथित भारतीय विद्वानों ने इस यूरोपीय सिद्धांत को बिना बहस और प्रमाण के स्वीकार ही नहीं कर लिया बल्कि नाच- नाच कर इसे गाने भी लगे। लोकमान्य तिलक तक धोखा खा गए। कारण शायद यही था कि हम में अपने बारे में इतनी हीन भावना घर कर गई थी कि हम यूरोप की मिट्टी को भी सोना मानने लगे थे। आखिर यह सिद्धांत यूरोप के विद्वानों ने प्रचारित किया था इसलिए भारतीय विद्वानों ने इसे माथे पर तिलक के समान स्वीकार किया। रोमिला थापर, आर एस शर्मा, डी एन झा, विपिन चंद्र सूद इत्यादि की पूरी  फौज, अपने जमाने में कालेजों, यूनिवर्सिटियों में भारत की युवा पीढ़ी को यही पढ़ाती रही कि आर्य इस देश में विदेशी हमलावर थे। अकादमिक क्षेत्र में यूरोप की इस गुंडागर्दी को सबसे पहले बाबा साहिब भीमराव रामजी अंबेडकर ने ललकारा।

उन्होंने प्रमाण देकर यूरोपीय विद्वानों की इन गप्पों को चुनौती दी और सिद्ध किया कि आर्य न तो बाहर से आए थे और न ही उन्होंने कोई हमला कर किसी को मारा था। अंबेडकर ने यह भी कहा कि आर्य किसी रेस या प्रजाति का नाम नहीं था बल्कि वह एक भाषा समूह था। तब लगता था कि यूरोप की श्रेष्ठता के मायाजाल में फंसे तथाकथित भारतीय विद्वान अब इससे मुक्त हो जाएंगे और भीमराव अंबेडकर के रास्ते पर चल पड़ेंगे। लेकिन उन्होंने तब भी भीमराव का रास्ता न पकड़ कर यूरोप का रास्ता ही श्रेयस्कर समझा। यूरोप का रास्ता अपमानजनक व काल्पनिक तो था ही, अवैज्ञानिक भी था। बसंत शिंदे के नेतृत्व में भारतीय पुरातत्ववेताओं एवं हावर्ड मेडिकल सेंटरों के डीएनए विशेषज्ञों ने तीन साल के परिश्रम के बाद अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने हरियाणा में राखीगढ़ी से प्राप्त नरकंकालों के डीएनए का मिलान देश के विभिन्न भागों में रह रहे लोगों के डीएनए से किया। निष्कर्ष यह था कि आदिम सभ्यता के प्रथम चरण, शिकारी युग से लेकर आज के आधुनिक युग तक, दक्षिण एशिया के लोगों में एक बायोलॉजिकल निरंतरता विद्यमान है। आर्य आगमन या आर्य हमले का  कोई प्रमाण नहीं मिलता है। इस अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि ईरान से होते हुए यूरोप के लोगों ने भारत पर हमला किया था और यहां के मूल निवासी जो द्रविड़ थे, उनको दक्षिण भारत में धकेल दिया था, यह पश्चिमी सिद्धांत मिथ्या था। भारत समेत दक्षिण एशिया का अद्यतन विकास यहीं के लोगों ने किया था और उनमें एक निरंतरता विद्यमान है। विकास शिंदे और उनके साथियों के इस अध्ययन से वह आधार ही ध्वस्त हो जाता है जिस पर भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की रचना की।

पश्चिमी तकनीक से लिखे गए इस इतिहास में भारत कम और पश्चिम की दृष्टि ज्यादा झांकती है। पंजाब के जाने माने विद्वान प्रो. पूरण सिंह ने किसी और प्रसंग में लिखा था कि जो इतिहासकार भारत का इतिहास पश्चिमी शैली और उपकरणों से लिख रहे हैं, वे भारत के इतिहास की बात तो दूर भारत की आत्मा को भी पकड़ नहीं पाते। लेकिन दुख इस बात का है कि हमारे इतिहासकार नवीन शोध को अपनाने व स्वीकार करने की बजाए, प्राणिमात्र से उसका विरोध करने में जुट जाते हैं। क्योंकि नवीन को स्वीकारने से उनकी अपनी स्थिति पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। उनका बनाया महल जब ध्वस्त होने लगता है तो वे मोह के कारण उसमें से बाहर नहीं निकलना चाहते। ऐसे में उनके वहीं दफन हो जाने का खतरा मंडराने लगता है। इस स्थिति में एक ही रास्ता बचता है कि महल को ही गिरने न दिया जाए। खतरा इस बात का है कि कालेजों से रिटायर हो चुके ये इतिहासकार अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए पुरानी स्थिति ही बहाल रखने में जोर लगाएं। इनके लिए सिंधु सरस्वती घाटी का वही नरकंकाल प्रासंगिक है, जिसे देख कर पश्चिमी नृविज्ञानियों ने कहा था, कि बाहरी आर्यों ने इसकी हत्या कर दी थी। यही वामपंथी इतिहासकारों का व्यक्तिगत संकट है, जिसे वे अकादमिक संकट में तबदील कर रहे हैं।

ईमेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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