सितारों के उस पार एक संसार

By: Sep 13th, 2019 12:07 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

नेहरू ने साराभाई, सतीश धवन और भटनागर जैसे कई वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित किया और बढ़ावा दिया, जिन्होंने आगे जा कर विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधान के अलावा अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की। अंतरिक्ष अनुसंधान का विस्तार सरकार के सहयोग और समर्थन से हुआ। पहले उपग्रह आर्यभट्ट को इसी केंद्र द्वारा लांच किया गया था। रोहिणी लांच होने वाला पहला भारतीय निर्मित उपग्रह बना। यह 80 के दशक का वह समय था जब अंतरिक्ष अनुसंधान का उच्च लक्ष्यों के साथ विस्तार हो रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के शौकीन हैं जिन्होंने अपना पूरा सहयोग और पूर्ण वित्तीय सहायता प्रदान की…

उर्दू के विख्यात कवि अल्लामा मुहम्मद इकबाल ने लिखा था ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तान हमारा’। और इसके साथ है एक खूबसूरत गजल ‘सितारों से आगे जहां और भी है, अभी इश्क का इम्तिहां और भी है’। इन शब्दों के पार अभी प्यार के और भी परीक्षण हैं। ये शब्द आजकल उन सभी लोगों के होठों पर हैं जो चांद और चंद्रयान से प्यार करते हैं। भारत का महत्त्वाकांशी चंद्रयान मिशन अमरीका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष अनुसंधान में चौथे स्थान पर आ सकता था। साइंस और प्रौद्योगिकी के पीछे पंडित जवाहरलाल नेहरू जो कि एक व्यक्ति के रूप में आधुनिक विज्ञान में गहरी रुचि रखते थे, उन्होंने न केवल आईआईटी और आईआईएम स्थापित किए, बल्कि इनके साथ-साथ विक्रम साराभाई अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र भी स्थापित किया। नेहरू ने साराभाई, सतीश धवन और भटनागर जैसे कई वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित किया और बढ़ावा दिया, जिन्होंने आगे जा कर विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधान के अलावा अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की। अंतरिक्ष अनुसंधान का विस्तार सरकार के सहयोग और समर्थन से हुआ। पहले उपग्रह आर्यभट्ट को इसी केंद्र द्वारा लांच किया गया था। रोहिणी लांच होने वाला पहला भारतीय निर्मित उपग्रह बना। यह 80 के दशक का वह समय था जब अंतरिक्ष अनुसंधान का उच्च लक्ष्यों के साथ विस्तार हो रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के शौकीन हैं जिन्होंने अपना पूरा सहयोग और पूर्ण वित्तीय सहायता प्रदान की। वह व्यक्तिगत रूप से रुचि रखते हैं और वैज्ञानिकों के लिए एक महान प्रेरक हैं।

वास्तव में वह सभी पेशों का आदर करते हैं चाहे वह साइंस हो, सेना हो या कोई और क्षेत्र। नतीजतन विज्ञान प्रौद्योगिकी में तेजी से विकास आज के दिनों का क्रम बन गया है। चंद्रयान का उद्देश्य वैज्ञानिक प्रगति में मानव रहित वाहन के साथ चंद्रमा तक पहुंचने के लिए एक बेहतरीन परियोजना है। यह परिक्रमा में सात साल से अधिक समय तक चंद्रमा का चक्कर लगाता रहेगा, जबकि दो सप्ताह के जीवनकाल वाले लैंडर को चंद्रमा की सतह पर पार्क किया जाना था। लैंडर सॉफ्ट लैंडिंग करने में विफल रहा और हार्ड लैंडिंग की वजह से दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिससे लैंडर के साथ संचार व संपर्क खो गया है।  मेरे लिए वो क्षण बेहद दुखद था और देश के किसी भी नागरिक से अधिक निराशा उस समय इसरो के निदेशक के. सिवन महसूस कर रहे थे। वह प्रधानमंत्री के कंधे से लगकर रो रहे थे जो इस महान घटना के गवाह बने। हमने योजना का शत-प्रतिशत हासिल नहीं किया, क्योंकि लिंक और संचार के टूटने से हमने इसमें विफलता पाई। जब लैंडर को स्पॉट किया गया था तब वह योजना के मुताबिक सॉफ्ट लैंडिंग के बजाय झुका हुआ कठोर सतह पर उतरा था। लिंक को पुनर्जीवित करने के लिए सभी प्रयास किए जा रहे हैं। यदि लिंक स्थापित हो जाता है तो हम अभी भी आने वाले पखवाड़े तक उम्मीद कर सकते हैं। विक्रम लैंडर के चंद्रमा पर उतरने की शुरुआत से कहानी का संपूर्ण एपिसोड उत्साह से भरा है। इसरो के इस अत्यंत कठिन प्रयास में वह हारा नहीं है, बल्कि इसने बहुत कुछ हासिल किया है। लैंडिंग के चौथे चरण को छोड़ कर हमने शुरुआत से लेकर चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग के सभी चरणों को अच्छे से कवर किया। सभी निराशा और संकट तब दूर हो गए, जब ऑर्बिटर गोल चक्कर काट रहा था तथा संचार लिंक के खोने से लैंडर चंद्रमा की सतह पर लैंड करने वाला था। संपूर्ण वैज्ञानिक समुदाय और देश बहुत खुश हुआ जैसे कि हमने अचानक अपने खोये हुए बच्चे का पता लगा लिया।

मिशन के निदेशक द्वारा बहाए गए आंसू व्यर्थ नहीं गए और उनके प्रयास को प्रधानमंत्री के द्वारा बहुत ही सहानुभूतिपूर्ण प्रतिक्रिया के साथ पुरस्कृत किया गया। विक्रम लैंडर से संपर्क टूटने के बाद के. सिवन प्रधानमंत्री के कंधे से जुड़कर रोने लगे, किंतु मोदी ने एक प्रेरक नेता के तौर पर उन्हें ढाढस बंधाया और उनका हौसला भी बढ़ाया। इस परिदृश्य को पूरे देश ने देखा। लैंडिंग ऑपरेशन के अंतिम एक-चौथाई चरण को छोड़कर पूरी परियोजना को सावधानीपूर्वक अंजाम दिया गया। दो चीजें जिसकी देश द्वारा सराहना की गई, वह यह कि परियोजना पूर्ण रूप से स्वदेशी है और चंद्रयान को भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा डिजाइन और निष्पादित किया गया।  कोई आश्चर्य नहीं है कि नासा ने भी इसकी सराहना की और भविष्य में सौर परियोजना में हमारे सहयोग के साथ नई दुनिया की खोज करने की पेशकश की। दूसरी बात यह कि चंद्रयान मानव रहित है और प्रक्षेपण की अंतिम विफलता को छोड़कर इसके सभी चरणों ने योजना पर सटीक काम किया। हमें अपने वैज्ञानिकों के दिमाग और देश की प्रतिभा को सलाम करना चाहिए और याद रखना चाहिए कि ‘सितारों से आगे जहां और भी है, अभी इश्क का इम्तिहां और भी है’। यह बात आशा जगाती है कि खो गया विक्रम लैंडर फिर से ढूंढ लिया गया है और उससे संपर्क करने की कोशिशें जारी हैं। वैसे भी चंद्रयान का प्रक्षेपण 95 फीसदी सफल रहा है। यह भी सुकून की बात है कि विक्रम लैंडर को खोज लिया गया है और वह सुरक्षित रूप से चंद्रमा पर ही है। अगर उससे संपर्क स्थापित हो गया तो कोई आश्चर्य नहीं कि यह अभियान पूर्ण रूप से सफल माना जाएगा। आओ हम भारतीय ईश्वर से प्रार्थना करें कि विक्रम लैंडर से जल्द से जल्द संपर्क स्थापित हो जाए। विक्रम लैंडर को छोड़कर इस अभियान के बाकी हिस्सों से जो डाटा हमें मिल रहा है, उसका अध्ययन किया जा रहा है। इस अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि कहां पर खामी रही। अगर खामियों का पता लगा लिया जाता है तो आने वाले समय में चंद्रयान की फिर से उड़ान के लिए रास्ता काफी हद तक साफ  हो जाएगा।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com

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