स्प्रिंटर पुष्पा ठाकुर से बबीता ठाकुर तक

भूपिंदर सिंह

राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक

हिमाचल के धावकों व धाविकाओं ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबी व मध्य दूरी की दौड़ों में काफी नाम कमाया है, मगर तेज गति की दौड़ों में हिमाचल को काफी पिछड़ा माना जाता था। कई बार तो प्रशिक्षक कहते थे हिमाचल में स्प्रिंटर नहीं हो सकते हैं…

एथलेटिक्स सभी खेलों की जननी है। विश्व में कोई भी खेल ऐसा नहीं है, जो एथलेटिक्स के मूल स्वरूप मानव विस्थापन की सामान्य क्रियाओं चलना, दौड़ना, कूदना व फेंकने के बगैर खेला जा सके। संसार के सबसे बड़े खेल आयोजन ओलंपिक में एथलेटिक्स स्पर्धाओं का सबसे अधिक आकर्षक होता है। इसमें 100 मीटर से लेकर 400 मीटर के दौड़ें आती हैं। हिमाचल के धावकों व धाविकाओं ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबी व मध्य दूरी की दौड़ों में काफी नाम कमाया है, मगर तेज गति की दौड़ों में हिमाचल को काफी पिछड़ा माना जाता था। कई बार तो प्रशिक्षक कहते थे हिमाचल में स्प्रिंटर नहीं हो सकते हैं, मगर इस मिथक को पुष्पा ठाकुर ने 90 के दशक में उस समय तोड़ दिया, जब उसने जयपुर में आयोजित अखिल भारतीय अंतर विश्वविद्यालय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींच कर 1998 एशियाई खेलों के लिए लगे लंबी अवधि के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में अपना नाम 400 मीटर की धाविकाओं में पाया था।

इसी समय भिवानी में आयोजित राष्ट्रीय महिला खेलों में पुष्पा ठाकुर ने 400 मीटर स्पर्धा में रजत पदक प्रदेश के लिए जीता था। इसके बाद वह 2004 ओलंपिक खेलों की तैयारी में जुट गई और ओलंपिक से पूर्व हुई राष्ट्रीय एथलेटिक प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतकर राष्ट्रीय कोचिंग कैंप में चयनित हुई। 2010 तक पुष्पा ठाकुर ने राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल का प्रतिनिधित्व करते हुए विभिन्न राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में दो स्वर्ण, छह रजत, पांच कांस्य पदक जीते हैं। 1995 में जयपुर में आयोजित अखिल भारतीय अंतर विश्वविद्यालय एथलेटिक्स में पुराने रिकार्ड बराबर या तोड़ने वाले धावकों व धाविकाओं को सीआरपीएफ ने मैदान में ही नियुक्ति पत्र दे दिया था। आज इस नौकरी को प्राप्त करने वाले धावक व धाविकाएं कमांडेंट पद से भी पदोन्नत होकर कई डीआईजी बन गए हैं, मगर पुष्पा ठाकुर ने उस नौकरी को अधिमान न देकर अपने राज्य में रहना पसंद किया था।

तब तत्कालीन मुख्यमंत्री राजा वीरभद्र सिंह ने पुष्पा ठाकुर को प्रशिक्षण के लिए आर्थिक सहायता तथा हमीरपुर के जिलाधीश कार्यालय में लिपिक की नौकरी दी थी। हमीरपुर में आयोजित हुई राष्ट्रीय महिला खेल 2008 में पुष्पा ठाकुर ने 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीता था, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने पदक विजेता खिलाडि़यों को एक पदोन्नति आउट ऑफ टर्न दी। पुष्पा ठाकुर को भी इसका लाभ  हुआ आज पुष्पा ठाकुर उपायुक्त कार्यालय हमीरपुर में अधीक्षक राजस्व के पद पर कार्यरत है। सिंथेटिक ट्रैक की सुविधा बड़े-बड़े राज्यों के पास उपलब्ध नहीं  है। हिमाचल में अंतरराष्ट्रीय स्तर के लाल सिंथेटिक ट्रैक पुष्पा ठाकुर के 20 वर्षों तक मिट्टी में प्रशिक्षण प्राप्त कर राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल द्वारा बिछवाए गए थे। 2004 में जब से पुष्पा ठाकुर सिंथेटिक पर अभ्यास न होने कारण ओलंपिक में प्रतिनिधित्व से चूक गई थी तो उस समय धूमल साहब ने वादा किया था कि कोई भी हिमाचली खिलाड़ी प्ले फील्ड के कारण मामूली अंतर से नहीं पिछड़ेगा।

इसलिए एक नहीं दो ट्रैक धर्मशाला व हमीरपुर में बिछाए गए थे। पुष्पा ठाकुर के बाद हिमाचल को राष्ट्रीय स्तर पर राजकीय महाविद्यालय हमीरपुर की तत्कालीन धाविका प्रोमिल ने राष्ट्रीय महिला खेलों में 100 मीटर में रजत तथा 200 मीटर में कांस्य पदक के साथ-साथ अंतर विश्वविद्यालय एथलेटिक्स में 200 मीटर में रजत पदक जीतकर 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के कैंप में अपना नाम लिखा लिया था। ज्योति ने राष्ट्रीय महिला खेल जो अब अंडर 25 वर्ष के लिए हो गए थे, इसमें 2012 में रजत पदक जीता उसकी सहयोगी रिशु ठाकुर, सोनिका शर्मा तथा रजनीश ने 4*400 मीटर दौड़ में ज्योति की स्पीड से हिमाचल को कांस्य पदक दिलाया था। 2013-14 की अंतर विश्वविद्यालय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में ज्योति ने 400 मीटर में कांस्य पदक जीता तथा महिला खेलों में रिशु ठाकुर चौथी रही थी।

2015 जम्मू में हुई महिला  खेलों में धर्मशाला खेल छात्रावास की रिचा ने 200 मीटर में रजत पदक प्राप्त किया था। उसके बाद अब 2019 में राष्ट्रीय स्तर पर तो नहीं, मगर उत्तर भारत  की कनिष्ठ एथलेटिक प्रतियोगिता जो संगरूर में पिछले सप्ताह आयोजित हुई उसमें हमीरपुर में बबीता ठाकुर ने 100 मीटर की दौड़ अंडर 16 वर्ष में कांस्य पदक जीता है। हमीरपुर जिला की टौणीदेवी तहसील के कलोह गांव में पिता सत्येंदर व माता मधु के घर जन्मी बबीता इस समय डीएवी स्कूल हमीरपुर में शिक्षा ग्रहण कर रही है। पिछले वर्ष जिला एथलेटिक्स प्रतियोगिता में सामने आई यह धाविका डीएवी नेशनल व सीबीएसई नेशनल में 100 मीटर व 200 मीटर में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर इस वर्ष तो सर्वश्रेष्ठ धाविका भी घोषित हुई है।

स्कूल के शारीरिक शिक्षक तरपरिष्ट ठाकुर के प्रशिक्षण में यह धाविका प्रतिदिन अणु सिंथेटिक ट्रैक पर देखी जा सकती है।  धावक के लिए बहुत उत्तम आहार व श्रेष्ठ साजो सामान चाहिए होता है। हजारों रुपए के जूते और स्पाइक्स एक वर्ष में खत्म हो जाते हैं। खेल छात्रावास इस तरह के खिलाड़ी पर लगभग पांच लाख रुपए सालाना खर्च करता है। साधारण मां-बाप के लिए यह बहुत बड़ी राशि है। डीएवी प्रशासन व अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं को चाहिए कि वे इस उभरती हुई धाविका के लिए आर्थिक सहयोग दें। परशुराम अवार्डी पुष्पा ठाकुर ने तेज गति के खुले आसमां में जो राह हिमाचली धावकों व धाविकाओं को दिखाई है, उसमें बबीता ठाकुर की उड़ान एशियाई व ओलंपिक खेलों तक हो यही कामना करते हैं।

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