उत्कृष्ट खिलाडि़यों को वजीफा क्यों नहीं?

भूपिंदर सिंह

राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक

भारतीय खेल प्राधिकरण अपने यहां चुनिंदा प्रतिभावान खिलाडि़यों पर सालाना औसतन दो लाख रुपए प्रति खिलाड़ी खर्च करता है। खेल छात्रवासों के अधिकतर खिलाड़ी हिमाचल को राष्ट्रीय स्तर पर पदक देने की बात तो दूर रही मगर वे अपना नाम राज्य की पदक तालिका में नहीं लिख पाते हैं, मगर कुछ खिलाड़ी ऐसे भी हैं जो खेल छात्रवासों से बाहर रहकर अपने दम पर अपना प्रशिक्षण जारी रखे हुए हैं और उन्हें आर्थिक सहायता करने वाला कोई नहीं होता है। फिर भी वे अपने दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतते रहे हैं, मगर सरकार उन्हें कोई भी सहायता उनके प्रशिक्षण में नहीं दे पा रही है…

हिमाचल प्रदेश के खिलाडि़यों में खेल संस्कृति और सुविधाओं का अभाव  देखा जा सकता है। इस सबके बावजूद अगर कोई खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पदक हिमाचल के लिए जीतता है तो यह राज्य के लिए गर्व की बात होती है। हिमाचल प्रदेश में वैसे तो खिलाडि़यों की सुविधाओं के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण तथा राज्य खेल विभाग के खेल छात्रावास राज्य के प्रतिभावान खिलाड़ियों को प्रशिक्षण सुविधाएं दे रहे हैं मगर वे जब राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने में नाकाम होते हैं और कोई खिलाड़ी अपने दम पर बिना खेल छात्रावासों की सुविधा के हिमाचल के लिए राष्ट्रीय पदक जीतता है तो उसे क्या खेल छात्रावासों में वर्षों से रह रहे खिलाडि़यों के बराबर प्रतिवर्ष खर्च होने वाली धनराशि के बराबर धनराशि का वजीफा नहीं दिया जा सकता है। भारतीय खेल प्राधिकरण अपने यहां चुनिंदा प्रतिभावान खिलाडि़यों पर सालाना औसतन दो लाख रुपए प्रति खिलाड़ी खर्च करता है खेल छात्रवासों के अधिकतर खिलाड़ी हिमाचल को राष्ट्रीय स्तर पर पदक देने की बात तो दूर रही मगर वे अपना नाम राज्य की पदक तालिका में नहीं लिख पाते हैं, मगर कुछ खिलाड़ी ऐसे भी हैं जो खेल छात्रवासों से बाहर रहकर अपने दम पर अपना प्रशिक्षण जारी रखे हुए हैं और उन्हें आर्थिक सहायता करने वाला कोई नहीं होता है। फिर भी वे अपने दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतते रहे हैं, मगर सरकार उन्हें कोई भी सहायता उनके प्रशिक्षण में नहीं दे पा रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर कई हिमाचली खिलाडि़यों ने हिमाचल का नाम पदक तालिका में चमकाया है मगर भविष्य के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए पर्याप्त धन के अभाव में वे गुमनामी के अंधेरे में खो गए जिस तरह आज केंद्र सरकार ओलंपिक पोडियम खेल योजनाओं के अंतर्गत भविष्य के प्रस्तावित खिलाडि़यों के लिए  40 लाख तक सालाना वजीफा दे रही है, उसी तरह हिमाचल को राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने के लिए खिलाडि़यों को आयु के हिसाब से 2 लाख से लेकर 10 लाख तक सालाना वजीफा देना चाहिए ताकि वर्षों तक लगातार चलने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम को गति मिल सके। खेल प्रशिक्षण लगातार चलने वाली क्रिया है। इसमें खिलाडि़यों को वर्षों तक लगातार प्रतिदिन अच्छी खुराक, खेल सामान अच्छी खेल के लिए बेहतरीन प्लेफील्ड के साथ-साथ प्रतिभावान प्रशिक्षक भी चाहिए होता है। इतना सब होने के बाद खिलाड़ी को महीने में लगभग 30,000 का विशेष फूड सप्लीमेंट खाने को चाहिए होता है। खेल परिणामों के लिए बेहद जरूरी होता है जरा सी गलत फूड सप्लीमेंट खाने से खिलाड़ी डोप टेस्ट में फेल होकर अपना खेल करियर चौपट कर सकता है। 2012 में पूरी की पूरी 400 महिलाओं की रिले टीम जो राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक विजेता रही थी गलत फूड सप्लीमेंट के कारण 2 वर्षों के लिए प्रतिबंधित हो चुकी है। आज जब राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में स्कूली स्तर से डोप टेस्ट हो रहा है तो खिलाड़ियों को भी सोच समझ कर खाना पड़ता है।

जब खेल ढांचे पर सरकार 20 लाख खर्च कर सकती है तो क्या राष्ट्रीय स्तर पर राज्य को पदक दिलाने वाले खिलाडि़यों को सम्मानजनक वजीफा सरकार नहीं दे सकती है। अब समय आ गया है जब खिलाडि़यों को वजीफा मिलना चाहिए ताकि और अधिक खिलाड़ी राज्य से पलायन न करें, धन व सुविधाओं का अभाव में किसी भी अच्छे खिलाड़ी को हिमाचल में आने से रोकता रहा है। यही कारण है कि ओलंपिक तक में देश को पदक दिलाने वाले हिमाचली खिलाड़ी हिमाचल में आने से डरते हैं। पिछले 10 सालों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी है। उन्होंने अखिल भारतीय अंतर विश्वविद्यालय, कनिष्ठ व वरिष्ठ राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में अपनी सीमित संसाधनों में हिमाचल के लिए पदक जीते हैं। खेल प्रशिक्षण लगातार चार से दस वर्ष तक चलने वाला कार्यक्रम होता है। तभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक दे सकते हैं। इतने लंबे समय में आकर खिलाड़ी को आर्थिक सहायता नहीं मिल पाती है, तो वे बेवक्त ही खेल को अलविदा कह देते हैं। खेल विभाग को चाहिए कि भविष्य में प्रतिभावान खिलाड़ी जो राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते हैं और वे किसी भी खेल छात्रावास या किसी सरकारी योजना में नहीं आते हैं, उन्हें इसी वर्ष से वजीफा दे देना चाहिए।

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हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।                                              

-संपादक

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