फरक्का का तांडव 

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

फरक्का बराज के माध्यम से सरकार ने गंगा के आधे पानी को हुगली में डालने का कार्य किया और आधा पानी बांग्लादेश को पद्मा के माध्यम से जाता रहा। एक विशाल नहर से पानी को फरक्का से ले जाकर हुगली में डाला गया। यह नहर लगभग 40 किलोमीटर लंबी है। इस नहर में पानी डालने के लिए फरक्का बराज बनाई गई। इस बराज की ऊंचाई 10 मीटर की गई जिससे कि गंगा का पानी नहर में प्रवेश कर सके। ऐसा करने से हुगली में पानी बढ़ा है, हुगली पुनर्जीवित हुई है, कोलकाता का सौंदर्य बढ़ा है और कोलकाता तक जहाजों का आवागमन होने लगा, लेकिन बराज का एक दुष्परिणाम हुआ। 10 मीटर ऊंची बराज बनाने से फरक्का के पीछे लगभग 80 किलोमीटर तक एक विशाल तालाब बन गया…

बिहार में आ रही बाढ़ के मूल में दो प्राकृतिक परिवर्तन हैं। पहला यह कि बंगाल का हुगली नदी का क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से ऊपर उठ रहा है जिसके कारण गंगा का पानी जो पूर्व में हुगली के माध्यम से गंगासागर तक जाता था, उसने पूर्व में हुगली को बहना कम कर दिया था। गंगा का पानी बांग्लादेश ज्यादा बहने लगा था। दूसरा प्राकृतिक परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती के तापमान में वृद्धि का है। इस कारण अपने देश में वर्षा का पैटर्न बदल गया है। पूर्व में वर्षा तीन महीने में धीरे-धीरे गिरा करती थी जिससे अधिक मात्रा में पानी भूगर्भ में रिसता था और नदी में एकाएक अधिक पानी नहीं आता था। अब ग्लोबल वार्मिंग के चलते उतनी ही वर्षा कम दिनों में गिर रही है। जैसे, जो वर्षा 90 दिन में होती थी अब उतना ही पानी मात्र 15 दिन में गिर रहा है। इस कारण वर्षा के समय एकाएक पानी की मात्रा बढ़ जाती है और नदियों की इतनी क्षमता नहीं है कि इस अधिक पानी को वह बहाकर समुद्र तक ले जा सके, भूगर्भीय उठान से लगभग 100 वर्ष पूर्व हुगली अकसर सूख जाती थी। गंगा का पानी सुंदरवन की तरफ  न जाने से हमारे समुद्र में गंगा की गाद नहीं पहुंचती थी। समुद्र की प्राकृतिक भूख होती है। वह गाद चाहता है। जब समुद्र को गंगा से गाद कम मिलना शुरू हुई तब समुद्र ने सुंदरवन को काटना चालू कर दिया, हुगली के सूखने की समस्या से कोलकाता एवं हल्दिया के बंदरगाहों पर जहाजों का आना-जाना बाधित हो गया। कोलकाता का सौंदर्य जाता रहा और वहां पीने के पानी की समस्या पैदा होने लगी। इन समस्याओं का हल ढूंढने के लिए सरकार ने फरक्का बराज का निर्माण किया।

फरक्का बराज के माध्यम से सरकार ने गंगा के आधे पानी को हुगली में डालने का कार्य किया और आधा पानी बांग्लादेश को पद्मा के माध्यम से जाता रहा। एक विशाल नहर से पानी को फरक्का से ले जाकर हुगली में डाला गया। यह नहर लगभग 40 किलोमीटर लंबी है। इस नहर में पानी डालने के लिए फरक्का बराज बनाई गई। इस बराज की ऊंचाई 10 मीटर की गई जिससे कि गंगा का पानी नहर में प्रवेश कर सके। ऐसा करने से हुगली में पानी बढ़ा है, हुगली पुनर्जीवित हुई है, कोलकाता का सौंदर्य बढ़ा है और कोलकाता तक जहाजों का आवागमन होने लगा, लेकिन बराज का एक दुष्परिणाम हुआ। 10 मीटर ऊंची बराज बनाने से फरक्का के पीछे लगभग 80 किलोमीटर तक एक विशाल तालाब बन गया। इस तालाब में गंगा के पानी का वेग न्यून हो गया क्योंकि पानी संकरे क्षेत्र में तेज बहता है और जहां फैलकर बहता है वहां उसका वेग धीमा हो जाता है।

गंगा के पानी का वेग कम होने से उसने गाद को इस विशाल तालाब में जमा करना शुरू कर दिया। फलस्वरूप, फरक्का के पीछे के तालाब का पेटा ऊंचा होता जा रहा है। गंगा के पानी को ले जाने की क्षमता उसी अनुपात में कम होती जा रही है जैसे एक थाली और भगोने में पानी के स्वरूप का अंतर होता है। पहले फरक्का पर गंगा का स्वरूप भगोने जैसा था तो अब वह थाली जैसा हो गया है। आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर राजीव सिन्हा ने बिहार सरकार के आग्रह पर फरक्का का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि फरक्का के तालाब में गाद जमा हो रही है, लेकिन वह दिख नहीं रही है क्योंकि वह अधिकतर समय डूबी रहती है, लेकिन इस गाद के जमा होने से गंगा के पानी को वहन करने की क्षमता कम हो गई है। गंगा का पानी फैलने लगा है और अगल- बगल के मालदा जैसे क्षेत्रों को काटने लगा है जिसके कारण वहां बाढ़ का तांडव बढ़ गया है। गाद के फरक्का बराज के तालाब में जमा होने से दूसरा प्रभाव सुंदरवन पर पड़ा। फरक्का के तालाब में ऊपरी स्तर पर गाद की मात्रा कम होती है और यह हल्का पानी नहर के माध्यम से हुगली को और इसके आगे सुंदरवन को भेजा जा रहा है। यद्यपि भारत और बांग्लादेश में पानी का बंटवारा आधा-आधा हो रहा है, लेकिन गाद 80 प्रतिशत बांग्लादेश को और 20 प्रतिशत भारत को जा रही है ऐसा मेरा अनुमान है। गाद के इस असंतुलन का बांग्लादेश और सुंदरवन दोनों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। बांग्लादेश में गाद ज्यादा पहुंचने से उसका जमाव हो रहा है और बाढ़ का प्रकोप बढ़ रहा है जबकि सुंदरवन में गाद के न पहुंचने से समुद्र द्वारा कटान अधिक हो रहा है। इस परिस्थिति में हमें फरक्का बराज के आकार में परिवर्तन करने पर विचार करना चाहिए।

सुझाव है कि बांग्लादेश की सरहद के पहले जहां गंगा से पुरानी हुगली नदी निकलती थी यानी मोहम्मदपुर में वहां पर अंडरस्लूस लगा कर पानी को भागीरथी में भेजा जाए। अंडरस्लूस से एक लोहे के गेट को ऊंचा करके पानी को वांछित दिशा में धकेला जाता है। इसके विपरीत फरक्का बराज में तालाब के माध्यम से ऊपर और नीचे अलग-अलग पानी का वितरण होता है। अंडरस्लूस में नीचे से गेट आने से गाद का वितरण बांग्लादेश और भारत के बीच बराबर होगा। यदि अंडरस्लूस उठा कर हमने 50 प्रतिशत पानी को हुगली में डाला तो 50 प्रतिशत गाद भी हुगली में आएगी। बांग्लादेश को जो अधिक गाद मिल रही है वह मिलना बंद हो जाएगी और वहां बाढ़ कम हो जाएगी जबकि सुंदरवन को जो कम गाद मिल रही है वह अधिक मिलना शुरू हो जाएगी और जो कटाव हो रहा है वह बंद हो जाएगा। साथ-साथ वर्तमान में जो फरक्का के पीछे 80 किलोमीटर का तालाब बना है वह तालाब समाप्त हो जाएगा और बिहार में बाढ़ का तांडव समाप्त हो जाएगा। गंगा की ग्लोबल वार्मिंग के चलते तेज आने वाली बरसात के पानी को समुद्र तक पहुंचाने की क्षमता बनी रहेगी क्योंकि फरक्का बराज का अवरोध समाप्त हो जाएगा। केंद्र सरकार को और विशेषकर बिहार सरकार को फरक्का बराज के आकार के परिवर्तन पर विचार करना चाहिए। इस कार्य में बिहार सरकार की अहम भूमिका है क्योंकि फरक्का से आने वाली बाढ़ की प्रमुख समस्या बिहार की ही है।

ई-मेलः bharatjj@gmail.com

You might also like