लम्हों की खता, सदियों को सजा

Oct 19th, 2019 12:06 am

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

जम्मू-कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मोहम्मद शफी कुरैशी 1963 में ही कह रहे थे कि अनुच्छेद 370 को हटाए जाने से इस राज्य में एक प्रभावशाली लोकतंत्रात्मक विरोधी दल के निर्माण में सहायता मिलेगी। अक्तूबर 1963 को नेशनल कॉन्फ्रेंस का एक प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस अध्यक्ष संजीवैय्या से मिला और अनुच्छेद 370 को हटाए जाने की मांग की। प्रतिनिधि मंडल ने कुछ लोगों द्वारा किए जाने वाले इस प्रचार की निंदा की कि यदि अनुच्छेद 370 निकाल दिया गया तो इस राज्य में मुसलमानों को जो बहुमत है वह अल्पमत में बदल जाएगा…

प्रायः कहा जाता है कि जम्मू-कश्मीर के लोग, खासकर कश्मीर घाटी के लोग प्रदेश में अनुच्छेद 370 को बनाए रखने के पक्ष में थे, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। इसका सबसे ज्यादा विरोध जम्मू-कश्मीर के भीतर ही हो रहा था। जम्मू-कश्मीर की नेशनल कान्फें्रस के अध्यक्ष मोहम्मद शफी कुरैशी 1963 में ही कह रहे थे कि अनुच्छेद 370 को हटाए जाने से इस राज्य में एक प्रभावशाली लोकतंत्रात्मक विरोधी दल के निर्माण में सहायता मिलेगी। अक्तूबर 1963 को नेशनल कान्फ्रेंस का एक प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस अध्यक्ष संजीवैय्या से मिला और अनुच्छेद 370 को हटाए जाने की मांग की। प्रतिनिधि मंडल ने कुछ लोगों द्वारा किए जाने वाले इस प्रचार की निंदा की कि यदि अनुच्छेद 370 निकाल दिया गया तो इस राज्य में मुसलमानों को जो बहुमत है वह अल्पमत में बदल जाएगा। उसने जनता को आश्वासन दिया कि ऐसे भय का कोई कारण नहीं है कि इस अनुच्छेद के निकलने से कश्मीर की सारी भूमि गैर कश्मीरियों द्वारा खरीद ली जाएगी।

गुलाम मोहम्मद सादिक जो लंबे अरसे तक जम्मू-कश्मीर मंत्रिमंडल के सदस्य रहे और बाद में मुख्यमंत्री भी बने, उन्होंने 26 नवंबर 1963 को गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा से मिल कर अनुच्छेद 370 के निराकरण की मांग की थी। नेशनल कान्फ्रेंस के उपाध्यक्ष गुलाम मोहम्मद सादिक ने 28 नवंबर 1963 को अपने भाषण में केंद्र सरकार से मांग की कि कश्मीर राज्य में कानून तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस धारा 370 का तुरंत हटना बहुत जरूरी है। कुछ महीने बाद ही जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री (उस समय इस प्रदेश के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था) गुलाम मोहम्मद सादिक ने कांग्रेस सदस्यों के सामने भाषण करते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 का तुरंत निराकरण होना चाहिए, क्योंकि यह अनुच्छेद राज्य की प्रगति में बाधक सिद्ध हो रहा है।

स्पष्ट है कि कश्मीर घाटी के लोग लंबे अरसे से अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग कर रहे थे। जम्मू और लद्दाख संभाग के लोगों ने तो 1949 से ही इसके खिलाफ  आंदोलन छेड़ा हुआ था। कांग्रेस के भीतर भी इस अनुच्छेद का व्यापक विरोध था, लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अर्थात पंडित जवाहर लाल नेहरू न जाने क्यों इसे हटाने से हिचकिचा रहे थे। नेहरू इसे हटाने की बजाय पाकिस्तान के साथ मिल कर जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का समाधान तलाशने के ज्यादा उत्सुक थे।  उनके मन में क्या था, यह तो वही जानते होंगे, लेकिन उन्होंने इस विषय पर बातचीत करने के लिए शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को पाकिस्तान भेजा। उन्होंने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को अपना दूत बना कर अयूब खान से बातचीत करने के लिए पाकिस्तान भेजा। क्या इसे संयोग ही कहा जाए कि 1949 में भी नेहरू ने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को ही अपना प्रतिनिधि बना कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भेजा था, लेकिन इस बार नेहरू के प्रतिनिधि बन कर पाकिस्तान गए शेख अब्दुल्ला के उद्देश्य को लेकर कोई भ्रम नहीं था।

चर्चा गर्म थी कि शेख यह प्रस्ताव लेकर गए थे कि जम्मू- कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में था, वह पाकिस्तान के पास ही रहने दिया जाए और पाकिस्तान शेष जम्मू-कश्मीर पर अपना दावा छोड़ दे। भारत के लिए यह पराजय और अपमान का प्रस्ताव था, लेकिन यह प्रस्ताव सिरे चढ़ता इससे पहले ही 27 मई 1964 को पंडित नेहरू का देहांत हो गया। लाल बहादुर शास्त्री देश के नए प्रधानमंत्री बने। सभी को आशा थी कि अब कांग्रेस की कश्मीर नीति बदलेगी, अनुच्छेद 370 हटा दिया जाएगा और राज्य के निवासियों को भी वही अधिकार मिलेंगे जो देश के बाकी नागरिकों को मिले हुए थे। तिब्बत को लेकर भारत सरकार का रुख बदला था और पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधि तिब्बत के पक्ष में बोला था और माना था कि चीन ने उस पर कब्जा किया हुआ था।

इस नई परिस्थिति में लोकसभा सदस्य प्रकाशवीर शास्त्री ने संविधान में से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए 11 सितंबर 1964 में लोकसभा में बिल प्रस्तुत किया। इस बिल पर कई दिनों तक लंबी बहस हुई। इसमें सभी राजनीतिक दलों के पच्चीस सदस्यों ने भाग लिया। आश्चर्य की बात थी कि किसी एक भी सदस्य ने यह नहीं कहा कि अनुच्छेद 370 बना रहना चाहिए। सभी पार्टियों ने एक स्वर से कहा कि देश की राष्ट्रीय एकता के लिए यह अनुच्छेद घातक है। अनुच्छेद को हटाए जाने के सबसे बड़े पक्षधर तो जम्मू-कश्मीर के सांसद थे। सभी सदस्यों ने बिल का समर्थन किया और अनुच्छेद को निरस्त करने की बात कही। जम्मू-कश्मीर से सांसद इंद्र मल्होत्रा ने तो यहां तक कहा कि सरकार शेख मोहम्मद अब्दुल्ला से राज्य के बारे में बात किस आधार पर करती है? अब्दुल्ला की हैसियत क्या है?

जब भी सरकार अब्दुल्ला से बात करती है तो राज्य के लोगों के मन में भविष्य को लेकर अनिश्चितता का भाव पैदा होता है। इसलिए यह बातचीत बंद करनी चाहिए। यदि सरकार को प्रकाशवीर शास्त्री के बिल को स्वीकार करने में दिक्कत है तो अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए सरकार को बिल लाना चाहिए।

ईमेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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