साहित्य में सियासत क्यों

Oct 25th, 2019 12:07 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

शांता कुमार जैसे व्यक्ति, जो राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और अपने आप में एक प्रसिद्ध लेखक हैं, पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। बाद में उन्होंने अपने एक बयान में इस बात की निंदा की कि एक साहित्यिक आयोजन को निहित स्वार्थों के लिए राजनीतिक बना दिया गया और पंथनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ। इसमें कोई शक नहीं कि खुशवंत सिंह, जिनकी स्मृति में उनके बेटे द्वारा यह समारोह आयोजित किया जाता है, एक प्रसिद्ध लेखक रहे हैं। उनकी किताब ‘टे्रन टू पाकिस्तान’ को दोनों देशों में लेखकों से प्रशंसा मिली थी, लेकिन इसी थीम पर सआदत हुसैन मिंटो की टोबा टेक सिंह विभाजन के समय की कहानी को रोचकता के साथ कहती है…

हाल ही में एक साहित्यिक उत्सव स्वास्थ्यकर मौसम में हिमाचल प्रदेश के कसौली में संपन्न हुआ। जयपुर के सबसे प्रसिद्ध ऐसे उत्सव, जिसने सलमान रश्दी को प्रवेश से वंचित कर दिया था जब उनकी प्रतिमा की तुलना में छोटे लेखकों ने उत्सव की कार्यप्रणाली पर कब्जा कर लिया था। उत्सवों में उन साहित्यकारों व कलाकारों को इकट्ठा किया जाता है, जो कलात्मक कार्यों को करने में रुचि रखते हैं। दुखद यह है कि इस तरह के साहित्यिक समारोह आजकल राजनीतिक विवादों को जन्म दे रहे हैं। रश्दी विवाद ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था क्योंकि उनके द्वारा लिखी गई दो किताबों मिडनाइट चिल्ड्रन के साथ-साथ सेटेनिक वर्सेज ने मुल्लाओं को क्रोध दिला दिया था।

खुमैनी ने उन्हें अपराधी घोषित किया था और उनके खिलाफ  फतवा जारी किया था। रश्दी छिपता रहा, लेकिन जब उसे भारत में आमंत्रित किया गया तो उसने कुछ साहस दिखाया था। उनकी पुस्तकों को भारत में भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। भारत पहुंचने से पहले उसे निकालने के लिए तैयारियों की रपटें आने लगी थीं। उसे डर था कि सरकार उसे सुरक्षा देने में विफल रहेगी और उसे दोषी ठहराया जाएगा। उसे यह भी डर था कि उसे मार दिया जाएगा। सरकार ने उसे रोकने के लिए इस तरह की किसी भी साजिश या किसी लिखित आदेश से इनकार किया, लेकिन इस विवाद ने अंतरराष्ट्रीय स्थान ले लिया और भारत सरकार को इसे स्पष्ट करना पड़ा और इस तरह की रिपोर्ट को अस्वीकार करना पड़ा। तब राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मामले को स्पष्ट करने के लिए पी. चिदंबरम से मुलाकात की। उत्सव में साहित्यिक कुछ भी नहीं था, लेकिन उनकी अनुपस्थिति या निमंत्रण विवाद का विषय बन गया। जब वह आया तो उसने सरकार के खिलाफ  अपने बयान में आरोप लगाए कि उनके हत्यारे संदिग्ध रूप से घूम रहे थे। कसौली में हाल ही में संपन्न समारोह साहित्यिक उत्सव नहीं, बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक उत्सव था। लेखकों ने एक-एक करके सत्ताधारी सरकार को घेरा और केवल एक लेखक तवलीन सिंह ने स्वतंत्र राह को चुना। मोदी या उनकी सरकार के खिलाफ  तीखा हमला करना साहित्यिक उत्सव का उद्देश्य नहीं हो सकता, बल्कि राजनीति पर शुद्ध प्रचार के बजाय जीवन को लेखन में उतारा जाना चाहिए। हम इसे ‘मोदी विरोधी आयोजन या राजनीतिक सम्मेलन’ की संज्ञा दे सकते हैं। इस प्रकार का एक उत्सव जिसे साहित्यिक कहा जाता है, अभी तक विशुद्ध रूप से राजनीतिक क्यों है? क्या हम राजनीतिक उद्देश्य के लिए कला का उपयोग करने के मकसद से परंपरागत वामपंथी दृष्टिकोण का पालन कर रहे थे और कला को केवल वैचारिक प्रदर्शनवाद तक सीमित कर रहे थे? इस तरह के उत्सव का एक अन्य महत्त्वपूर्ण आयाम स्थानीयता तथा स्थानीय संस्कृति है जहां समारोह आयोजित किया जा रहा है। यह आशा की जाती है कि इस तरह के उत्सव को स्थानीय संस्कृति को प्रतिबिंबित करना चाहिए और राज्य के लेखकों को जगह देनी चाहिए जहां यह आयोजित होता है, लेकिन कसौली उत्सव ने इसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

शांता कुमार जैसे व्यक्ति, जो राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और अपने आप में एक प्रसिद्ध लेखक हैं, पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। बाद में उन्होंने अपने एक बयान में इस बात की निंदा की कि एक साहित्यिक आयोजन को निहित स्वार्थों के लिए राजनीतिक बना दिया गया और पंथनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ। इसमें कोई शक नहीं कि खुशवंत सिंह, जिनकी स्मृति में उनके बेटे द्वारा यह समारोह आयोजित किया जाता है, एक प्रसिद्ध लेखक रहे हैं। उनकी किताब ‘टे्रन टू पाकिस्तान’ को दोनों देशों में लेखकों से प्रशंसा मिली थी, लेकिन इसी थीम पर सआदत हुसैन मिंटो की टोबा टेक सिंह विभाजन के समय की कहानी को रोचकता के साथ कहती है। कोई यह इच्छा कर सकता है कि वह जिंदा रहें तथा भाजपा की निंदा करते रहें, लेकिन उन्होंने ऐसा करने में कुछ समझदारी दिखाई होती। राजनीति में उनका आकलन या धार्मिक मामलों में उनकी भविष्यवाणी बहुत स्थिर नहीं थी। फिर भी उन्होंने साहित्यिक विचारधारा को आगे बढ़ाया। उत्सव में राजनीति का मजाक यह था कि पूरे उत्सव को भाजपा की विचारधारा को समझने के लिए संबोधित किया गया था, लेकिन भाजपा नेताओं ने इसे नहीं समझा और इसकी प्रशंसा की। इसके कारण सोलन में फसाद हुआ, जहां हिंदू संगठनों की भीड़ ने भाजपा नेताओं द्वारा उत्सव की प्रशंसा के बजाय हिंसक विरोध किया। ज्यादातर प्रशंसा विषय और भ्रम को समझने में नेताओं की अक्षमता के कारण हुई। यह हिमाचल के लेखकों और कलाकारों की इच्छा है और अन्य सभी राज्यों के लिए उस साहित्यिक उत्सव को प्रतिबिंबित करना चाहिए, जिसमें राज्य की प्रतिभा को सम्मान दिया गया हो तथा राज्य के कलाकारों-लेखकों के लिए अधिक से अधिक अवसरों को बढ़ावा दिया गया हो। उत्सव में राजनीति से ज्यादा साहित्य होना चाहिए, न कि ज्यादा राजनीति और कम साहित्य।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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